खुमाड़ की आख़िरी पुकार
कथा साहित्य | कहानी प्रदीप श्रीवास्तव15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
. . . हम जिसे छोड़ आते हैं, वह हमारा बेसब्री से इंतज़ार करता रहता है।
क़रीब बीस साल बाद अपने गाँव खुमाड़ लौट रहा था। जब कुछ बड़े सपने लिए अपने इस गाँव से दिल्ली की ओर निकला था, तब मेरे पास बस एक छोटा-सा बैग था, जिसमें कपड़ों का एक जोड़ा और जेब में किराए भर के पैसे थे। गाँव छोड़ने से पहले मैं ‘मनिला देवी’ के मंदिर गया था। देवी माँ के चरणों में सिर झुकाकर मन-ही-मन प्रण किया था, कि जब-तक कुछ बन नहीं जाऊँगा, वापस नहीं लौटूँगा . . . और जिस दिन लौटूँगा, सबसे पहले आपके दर्शन करूँगा।
दिल्ली ने मेरा स्वागत ट्रेन से उतरते ही तरह-तरह की मुसीबतों से किया था। जिस तरफ़ क़दम बढ़ाता उसी तरफ़ मुश्किलों के कठोर थपेड़े घायल करने लगते। कई महीनों तक दर-दर की ठोकरें खाईं। कभी किसी होटल में बरतन माँजे, कभी फ़ुटपाथ पर रातें काटीं। कई बार भूखे पेट भी सोया, पर भीतर की आग बुझी नहीं। हर कठिन घड़ी में ‘मनिला देवी’ को याद करता और फिर दोगुने उत्साह से सारी मुश्किलों से भिड़ जाता, कि यहाँ हारने नहीं जीतने आया हूँ, जीत कर ही रहूँगा, नहीं तो यहीं की मिट्टी में मिल जाऊँगा। हारकर ‘मनिला देवी’ के द्वार पर नहीं जाऊँगा। अपने घर वालों, गाँव को निराश, शर्मिन्दा नहीं करूँगा।
मेरी मेहनत, ज़िद को धीरे-धीरे क़िस्मत ने भी साथ देना शुरू कर दिया, स्थितियाँ बदलने लगीं। दूसरे के होटल में काम करते-करते एक दिन ख़ुद की छोटी-सी चाय की दुकान खोल ली। वही दुकान आगे चलकर मेरे सारे कारोबार का आधार बन गई। व्यापार बढ़ता गया, दुकानें बढ़ती गईं, पैसा बढ़ता गया, कारोबार में ही डूबता गया . . . और इसी के साथ अपनी जड़ें भूलता गया, अपना गाँव ‘खुमाड़’ मुझसे दूर होता चला गया।
ग़ज़ब तो यह कि अपनी आराध्य देवी ‘मनिला देवी’ को दिया वचन भी भूल गया। धन कमाने की अंधी दौड़ में ऐसा उलझा कि बाज्यू (बाबा) आमा (दादी) एक-एक कर संसार छोड़ गए। मैंने घर पैसे तो ख़ूब भेजे, पर उनके अंतिम दर्शन करने को भी एक दिन के लिए भी गाँव नहीं पहुँचा। उनके न रहने पर बाद में माँ-बाप, भाई-बहनों को भी दिल्ली बुला लिया।
खुमाड़ का पुश्तैनी घर बंद हो गया। जाते समय बसौली गाँव के एक रिश्तेदार को चाबी थमाकर इतना भर कहा गया था, “हमारे घर का ध्यान रखियेगा . . . कोई बात हो तो फोन कर दीजियेगा, हम लोग बीच-बीच में आते रहेंगे।”
लेकिन जाने के बाद कोई कभी नहीं लौटा। दिल्ली में बढ़ते कारोबार ने पूरे परिवार को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। दिन दूना, रात चौगुना कारोबार बढ़ता गया। धीरे-धीरे सबके मन से गाँव की स्मृतियाँ धुँधली पड़ने लगीं। बसौली से कभी-कभार फोन आता, “बहुत दिन हो गया कब आ रहे हो?” उत्तर में हर बार यही आश्वासन देता रहा कि आता हूँ जल्दी ही . . . और बात टाल देता।
पैसे की चकाचौंध, आरामदायक ज़िन्दगी के आगे जल्दी ही माँ-बाप भी घर भूलते गए, वापस लौटने की ज़िद भी भूल गए। मगर समय अपनी चाल नहीं भूला, चलता गया और फिर एक-एक कर हमारे माँ-बाप को भी इस संसार से विदा करा ले गया। इस बीच सभी भाई-बहनों की शादियाँ हो गईं, बच्चे हो गए, सबके अलग-अलग मकान बन गए। परिवार में सदस्यों की संख्या तीन गुनी हो गई, पर ‘खुमाड़’ . . . और ‘मनिला देवी’ . . . किसी को याद नहीं रहे। दरअसल हम लोग व्यापार से जुड़े नहीं बल्कि उसके बँधन में पूरी तरह जकड़ गए।
और बीस वर्षों बाद भी वापसी एक नई व्यापारिक योजना को पूरा करने के इरादे से हो रही थी, कोई आत्मा की पुकार पर नहीं। मन में ‘खुमाड़’ में एक रिज़ॉर्ट बनाने की योजना वापस लाई थी। क्योंकि हर तरह के मीडिया से बराबर मिलती जानकारियाँ मन में ये बात पक्की करती आ रही थीं कि उत्तराखंड के पहाड़ों में पर्यटन उद्योग का भविष्य बहुत बड़ा, बहुत लाभदायक होने जा रहा है। मैंने सोचा यह मेरे कारोबार को नई ऊँचाई दे सकता है।
अपनी इस योजना के साथ दिल्ली से चल कर जब हरिद्वार पहुँचा तो वहाँ का बदला हुआ स्वरूप देखकर चकित रह गया। मुझे लगा कि यहाँ होटल और रेस्टोरेंट के व्यवसाय की अपार संभावनाएँ हैं। दो दिन तक मैंने पूरा सर्वे किया और फिर सोचा कि देहरादून भी देख लिया जाए।
होटल से बाहर निकला तो सड़क पर दूर तक वाहनों की लंबी क़तार दिखी। पूरा रास्ता जाम था। सामने एक जनाज़ा गुज़र रहा था। सफ़ेद गोल जालीदार टोपियाँ पहने हज़ारों लोग उसमें शामिल थे। टैक्सी ड्राइवर हरि सिंह ने बताया कि इनके किसी मज़हबी शख़्स का जानाजा है। मैंने कहा, “जैसे हम लोगों के यहाँ अंतिम यात्रा रास्ते में एक किनारे होकर गुज़रती है, वैसे ही ये लोग भी तो किनारे-किनारे चल सकते हैं, पूरा रास्ता रोकने से लोगों को हो रही समस्या के बारे में भी सोचना चाहिए . . . लेकिन इतने लोग यहाँ आए कहाँ से?”
मेरे सवाल पर हरि सिंह ने मेरी ओर देखे बिना ही उत्तर देने के बजाए सवाल ही कर लिया, “लगता है साहब, आप बहुत साल बाद उत्तराखंड आए हैं?”
उसका सवाल मुझे कुछ चुभ गया। लेकिन फिर भी बात सँभालते हुए कहा, “ये सब छोड़ो . . . तुम्हें जो मालूम हो, वही बताओ।” तो उसने गंभीर स्वर में कहा, “पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में देवभूमि उत्तराखंड का रूप बहुत बदल गया है। रोहिंग्या और अन्य घुसपैठिये बड़ी संख्या में यहाँ आकर बस गए हैं। देश में अन्य जगहों की तरह उत्तराखंड से लेकर हिमाचल तक जगह-जगह इनकी बस्तियाँ खड़ी हो गई हैं। कुछ स्वार्थी राजनीतिक दलों ने वोट की राजनीति के लिए इनके आधार कार्ड, राशन कार्ड तक बनवा दिए हैं। अब हालत यह है कि ये लोग खुलेआम अपने अधिकारों की बातें करते फिरते हैं। . . . खुलेआम यह नारा लगाते हैं, ‘जो ज़मीन सरकारी है, वह ज़मीन हमारी है’ . . . जहाँ देखो, वहाँ रातों-रात मज़ारें और दरगाहें उग आती हैं। हरी चादर डालकर सरकारी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। धीरे-धीरे वही जगह पक्के निर्माणों में बदल जाती है, दुकानें, हर चौराहे, हर मोड़, हर नुक्कड़ पर यही खेल चल रहा है। आए दिन विवाद होते हैं, झगड़े होते हैं, पर सब-कुछ देखते हुए भी प्रॉब्लम को कंट्रोल करने के लिए जैसे कोई क़ायदे से कुछ करना ही नहीं चाहता। सोशल मीडिया पर तो आप यह मीम्स देखते ही होंगे कि स्पीड ब्रेकर ज़्यादा ऊँचा नहीं बनाओ, नहीं हरी चादर पड़ जाएगी या ज़मीन ऊँची हुई नहीं . . . ऐसे ही न जाने कितनी बातें होती रहती हैं लेकिन . . .”
मैंने हैरान होकर पूछा, “लेकिन सरकार? क्या वह यह सब रोकने की कोशिश नहीं करती?”
हरि सिंह ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “कोशिश तो होती है साहब, पर राजनीति सब पर भारी पड़ जाती है। एक दल की सरकार कुछ करती है तो उसके किए-धरे पर दूसरे दल पानी फेरने में लगे रहते हैं, इन घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए इन्हें हर तरह से संरक्षण देते हैं। अवैध घुसपैठियों के फ़र्ज़ी पेपर्स बनवा यहाँ की ज़मीन, व्यापार और व्यवस्था में उनके लिए जगह पक्की कराते हैं। आपको सच-सच बताऊँ जिस तेज़ी से इनकी संख्या बढ़ रही है, वह देखकर मुझे चिंता होती है, कहीं ऐसा न हो कि आने वाले कुछ वर्षों में ही उत्तराखंड और हिमाचल भी उसी राह पर चल पड़ें, जिस राह ने कश्मीर घाटी का स्वरूप बदल दिया, और वहाँ से . . .”
उसकी बातों ने मुझे हैरान कर दिया। वह कड़वा सच बोल रहा था, लेकिन मैंने और कुरेदने के लिए कहा, “तुम बहुत बढ़ा-चढ़ा कर बोल रहे हो अब ऐसा भी कुछ नहीं होने जा रहा है . . .”
“नहीं साहब, मैं वही कह रहा हूँ जो अपनी आँखों से कई सालों से देखता आ रहा हूँ। यहाँ के लोग रोज़गार, ज़्यादा पैसे कमाने के चक्कर में दूसरे बड़े प्रदेशों में जा रहे हैं। यहाँ गाँव के गाँव ख़ाली होते जा रहे हैं। पीछे छूटे मकान, खेत, दुकानें सब धीरे-धीरे दूसरों के कब्ज़े में जाते देख रहा हूँ। आप रास्ते भर जितने होटल और रेस्टोरेंट देख रहे हैं, जिन पर ‘शिव’, ‘बालाजी’, ‘भोलेनाथ’ जैसे नाम लिखे हैं, उनमें से बहुत-से असल में उन्हीं लोगों के हैं। नाम हिंदुओं के रख लेते हैं ताकि कोई शक न करे। सोशल मीडिया पर यह सब न जाने कितना आता रहता है, लगता है आप सोशल मीडिया पर है ही नहीं . . .”
मैं उसकी बातें सुनता रहा। उसके शब्दों में ग़ुस्सा, खीझ और असहाय होने के भाव दिख रहे थे। बात आगे बढ़ाते हुए मैंने पूछा, “तुम यह सारी बातें इतने विश्वास से कैसे बता रहे हो, तुम्हें कहाँ से मालूम हुईं यह सब?”
वह हल्की मुस्कान के साथ बोला, “आठ साल से टैक्सी चला रहा हूँ साहब। उत्तराखंड और हिमाचल का चप्पा-चप्पा देखा, छाना हुआ है। हर सड़क, हर क़स्बा, हर बाज़ार। अभी आप आगे बढ़ेंगे तो ख़ुद देखेंगे, जहाँ कभी देवदार और मंदिरों की शान्ति थी, वहाँ अब जगह-जगह मज़ारें, दरगाहें और नई-नई बस्तियाँ दिखाई देंगी। अपने देश की इस पवित्र देवभूमि का चेहरा सेकुलर नेताओं, राजनीति के कारण तेज़ी से बदरंग, अपवित्र होता जा रहा है। सच कहूँ तो अब अपनी यह देवभूमि, देवभूमि रह ही नहीं गई है। इसके ज़िम्मेदार हम देवभूमिवासी ख़ुद ही हैं। अपनी ज़मीन, घर, सामान की रक्षा हम नहीं करेंगे तो चोर लुटरे घुसपैठिये हथियाएँगे ही . . .”
वह न जाने कितने दिनों का भरा बैठा था कि बोलता ही चला जा रहा था। उसकी बातों से एकदम साफ़ पता चल रहा था कि वह हर उस आदमी से बेहद क्रुद्ध था, बल्कि उससे घृणा करता था जो अपनी देवभूमि छोड़कर पैसे कमाने कहीं और चले गए थे, और पैसे की चकाचौंध में ऐसे लापरवाह हुए कि, अपनी जड़ अपनी भूमि की ओर मुड़ कर देखना ही भूल गए।
उसकी बातों को मैं जिस तरह से भी सोचता, हर तरह से मुझे यही लगता कि ये सीधे-सीधे मुझ पर ही हमला कर रहा है। उसकी बातें सुनते-सुनते अचानक मेरे भीतर एक अनजाना भय, आत्मग्लानि सी जाग उठी कि, सचमुच मैंने पैसे के पीछे अंधा होकर अपनी देवभूमि के साथ विश्वासघात किया, पीठ में छूरा भोंका। पैसे के साथ-साथ अपनी भूमि का भी तो ध्यान रख ही सकता था। मुझे अपना बंद पड़ा पुश्तैनी घर और गहरे याद आने लगा। वह घर, जिसके आँगन में मैंने बचपन बिताया था; वे खेत, पहाड़ियाँ जिनमें नंगे पाँव दौड़ा, खेला करता था। इतने वर्षों से वहाँ कोई गया तक नहीं। जिन रिश्तेदारों को देखभाल की ज़िम्मेदारी दी थी, उनके परिवार के लोग भी धीरे-धीरे गाँव छोड़ चुके थे।
हरि सिंह की बातों से मेरा मन घबरा उठा कि कहीं मेरे घर . . . खेतों पर भी किसी और की नज़र तो नहीं पड़ गई . . . यह विचार आते ही मन में एक अजीब-सी बेचैनी भर गई। क़रीब आधे घंटे बाद जनाज़ा आगे निकल गया और गाड़ियों की क़तार धीरे-धीरे सरकने लगी। हरि सिंह ने भी टैक्सी आगे बढ़ा दी।
मैं सड़क के दोनों ओर दुकानों पर टँगे साइनबोर्ड पढ़ने लगा। लोगों के चेहरे देखने लगा, और भीतर कहीं टीवी चैनलों की वे बहसें गूँजने लगी थीं, जिनमें नेता और प्रवक्ता चीख-चीखकर देश की बदलती डेमोग्राफी पर बहस किया करते हैं। उस समय वे बहसें मुझे अक्सर खोखली और अतिरंजित लगती थीं, पर वह सब देख-देख कर उन बहसों के शब्दों के अर्थ जैसे पहली बार मेरी समझ में उतरने लगे। मुझे विश्ववास होने लगा कि सच में राजनीति, स्वार्थ और लालच ने बाक़ी देश की तरह इस शांत देवभूमि को भी डस लिया है।
उस भूमि को जिसे तप, त्याग और आस्था की धरती कहा, माना जाता है, वहाँ अब ज़मीनों के सौदे, कब्ज़ों की घटनाएँ, आशंकाएँ और पहचान, अपनी संस्कृति के अस्तित्व की रक्षा के संघर्ष नई वास्तविकता बन गए हैं। अपने मकान और खेतों को लेकर मेरी चिंता हर क्षण बढ़ती ही जा रही थी। हरि सिंह की बातों ने मुझे ऐसा झकझोर दिया था, मानो कोई व्यक्ति गहरी नींद में सोया हो और किसी पहलवान ने उसे अचानक झिंझोड़कर बिस्तर से उठाकर सीधे ज़मीन पर खड़ा कर दिया हो।
वह बता रहा था कि पिछले कुछ वर्षों में ज़मीनों की क़ीमतें अचानक बहुत बढ़ गई हैं। लोग गाँवों में होम-स्टे, रिज़ॉर्ट और होटल खोल रहे हैं। पहाड़ अब केवल प्रकृति और श्रद्धा, तपस्या के स्थल नहीं रहे, वे धीरे-धीरे एक बड़े व्यापारिक बाज़ार में बदलते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ सड़क और पर्यटन की संभावनाएँ बढ़ रही हैं, वहाँ फ़ार्म हाउस, होम-स्टे, रिज़ॉर्ट और होटल बनाने की होड़ मची हुई है। बाहरी लोग धीरे-धीरे स्थानीय लोगों की ज़मीनें ख़रीद रहे हैं, कहीं दबाव से, कहीं लालच से और कहीं सीधे कब्ज़े के ज़रिए . . .
उसकी एक-एक बात मेरे भीतर अजीब-सी घबराहट भर रही थी। मन बार-बार कह रहा था . . . “जैसे भी हो, पहले खुमाड़ पहुँचकर अपना घर और खेत देखूँ।” मेरी बेचैनी ने पहले से तय मेरी योजना बदल दी। देहरादून जाने का विचार त्याग दिया। क्योंकि वह रास्ता अलग पड़ता था और मुझमें बेचैनी इतनी भर चुकी थी कि किसी और जगह जाने का धैर्य ही नहीं बचा था। मैंने तय किया कि पहले ‘खुमाड़’ देखूँगा, वहाँ की स्थिति समझूँगा, उसके बाद ही आगे की कोई योजना बनाऊँगा।
कई घंटों की लंबी और थकाऊ यात्रा के बाद आख़िरकार मैं अपने गाँव ‘खुमाड़’ पहुँचा। दिल्ली के धुएँ, शोर और भीड़-भाड़ से निकलकर यह पूरा क्षेत्र किसी स्वर्ग-लोक जैसा प्रतीत हो रहा था। चारों ओर फैली हरियाली, ऊँचे-ऊँचे पेड़, दूर तक पसरी पहाड़ियाँ और हवा में घुली शीतल निस्तब्धता सभी मन को अद्भुत शान्ति दे रहे थे . . .
गाड़ी मुख्य सड़क पर ही छोड़नी पड़ी, वहाँ से पैदल ही गाँव की ओर बढ़ चला। जैसे-जैसे भीतर पहुँचता गया, मन वैसे-वैसे हल्का होता चला गया, एक अनजाना भारी बोझ जो मुझे दबाए जा रहा था वह कम होता गया। जब गाँव छोड़कर गया था, तब वहाँ लगभग साठ मकान हुआ करते थे। आँगनों में बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं, शाम होते ही चूल्हों का धुआँ उठता था, और हर घर में जीवंतता की हलचल होती थी।
मगर गाँव पहुँच कर मैं सहम उठा, मेरा वाला ‘खुमाड़’ वहाँ था ही नहीं . . . वह ‘खुमाड़’ जैसे अपनों से मिली बेरुख़ी, धोखे से आहत दुखी होकर देवलोक चला गया था। सुनसान से गाँव में इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे। अधिकांश मकान टूटकर खंडहर बन चुके थे। कहीं छतें धँस गई थीं, कहीं दीवारों पर काई जम चुकी थी, कहीं बंद दरवाज़ों पर जंग लगे ताले लटक रहे थे। मैं अपने घर को खोजता हुआ आगे बढ़ता रहा, पर वह मुझे कहीं दिखाई नहीं दिया।
जहाँ मुझे याद था कि फ़लाँ जगह हमारा घर हुआ करता था, वहाँ अब एक नया-सा पक्का मकान खड़ा था, जिस पर ताला लटका हुआ था। क्षण भर को ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने मेरे प्राण ही खींच लिए हों। मैं घबराकर थोड़ी दूर पर बने उस घर की ओर गया, जहाँ कभी हमारे पड़ोसी रहा करते थे। उनका परिवार भी बड़ा था, यही कोई आठ-दस लोगों का।
दरवाज़े पर दाज्यू (बड़े भाई) बोज्यू (भाभी) को देखकर बड़ी ख़ुशी हुई। दोनों ही बहुत वृद्ध हो चुके थे। लाठी के सहारे मुश्किल से खड़े हो पा रहे थे। पहले तो वे मुझे पहचान ही नहीं पाए। जब मैंने अपना परिचय दिया तो उनकी धुँधली आँखों में अचानक पहचान की एक फीकी चमक उभरी। उन्होंने मुझे चारपाई पर बैठाया। धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई।
उन्होंने कहा, “अब इस गाँव में बचा ही कौन है बेटा? हमारे परिवार के लोग भी लखनऊ और नोएडा में जाकर बस गए हैं। हम दोनों बूढ़े ही ज़िद पकड़कर यहाँ रह गए हैं। पूरे गाँव में मुश्किल से चौदह-पंद्रह घर ही सही सलामत हैं, उनमें भी अधिकतर बूढ़े लोग ही बचे हैं।”
मैंने अपने घर के बारे में पूछा। बताया कि मैं उसे पहचान नहीं पा रहा हूँ, जहाँ हमारा घर था वहाँ कोई दूसरा घर दिखाई दे रहा है।
दाज्यू कुछ देर सोचने के बाद बोले, “तुम्हारे घर तक जाने के लिए थोड़ी चढ़ाई पड़ती है। अब उधर बहुत दिनों से जाना नहीं हुआ, इसलिए ठीक से बता नहीं सकता कि वहाँ क्या है।”
मैंने झिझकते हुए पूछा, “क्या यहाँ मकानों पर कब्ज़े भी होने लगे हैं?”
उन्होंने गहरी साँस लेकर बड़े भारी स्वर में कहा, “हाँ, ऐसा बहुत हो रहा है। बाहरी लोग आकर जगह-जगह बस रहे हैं। कहीं मज़ार बना दी जाती है, कहीं मस्जिद। विवाद होते रहते हैं। गाँव ख़ाली हो रहे हैं, और बाहरी लोग इसका फ़ायदा उठा रहे हैं।”
मैंने पूछा, “सरकार कुछ नहीं करती?”
यह सुनते ही उनके स्वर में हल्की नाराज़गी घुल गई। कसैले स्वर में बोले, “जब लोग ख़ुद ही अपने घर-गाँव छोड़ देंगे, तो सरकार कितने घरों की रखवाली करेगी? पुलिस और प्रशासन कार्यवायी करती है, अवैध निर्माण भी हटाए जाते हैं, पर जब गाँव ख़ाली पड़े हों तो समस्या फिर खड़ी हो जाती है। असली बात यह है कि हम लोग ही अपनी जड़ों से कट गए हैं। तुम ख़ुद बताओ, कितने साल बाद लौटे हो? परिवार में कई लोग हो बीच-बीच में ही आते रहते तो अपना घर तो पहचान लेते, ढूँढ़ना तो न पड़ता, यह घबराहट तो न होती कि कहीं किसी ने क़ब्ज़ा तो नहीं कर लिया . . .”
उनकी बात का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैं सिर झुकाए बैठा रहा। शायद वे इस बात से भी आहत थे कि जाते समय मेरे परिवार ने घर की चाबी उन्हें न देकर बसौली गाँव के किसी और परिचित को सौंप दी थी। मैं जल्दी निकलना चाहता था, पर दाज्यू बोज्यू ने चाय पिए बिना उठने ही नहीं दिया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उन काँपते हुए हाथों में वर्षों पुराना वही स्नेह, अपनापन अब भी जीवित था।
चाय पीकर मैं बसौली की ओर निकल पड़ा। वहाँ जो देखा, उसने मन को और भारी कर दिया। वहाँ का हाल भी ‘खुमाड़’ से अलग नहीं था। अधिकांश मकान बंद पड़े थे, कई टूट चुके थे, और हर तरफ़ एक उदास सन्नाटा पसरा था।
जिन लोगों के पास हमारे घर की चाबी छोड़ी गई थी, उनके घर पहुँचा तो वहाँ भी परिवार के केवल दो बुज़ुर्ग सदस्य ही मिले। वे भी मुझे पहचान नहीं पाए। जब मैंने अपना परिचय दिया, तो उनकी आँखें भर आईं। वे कुछ क्षण तक मुझे एकटक निहारते रहे, मानो बीते वर्षों का कोई खोया हुआ चेहरा अचानक उनके सामने आ खड़ा हुआ हो और वे उसे पहचानने का प्रयास कर रहे हों।
दोनों बूढ़े बाज्यू-बोज्यू कुछ देर तक मौन बैठे रहे। फिर भारी स्वर में बोले, “अब तो यह गाँव धीरे-धीरे समाप्त होने की ओर है बेटा। हम जैसे दो-चार बूढ़े लोग बचे हैं, जब तक साँस चल रही है तभी तक गाँव की साँस भी चल रही है। हालत तो यह हो गई है कि किसी घर में कोई बुज़ुर्ग मर जाए, तो उसे कंधा देने वाले चार आदमी भी मुश्किल से जुटते हैं . . .” उनकी बात सुनकर भीतर कहीं गहरी टीस उठी।
मुझे लगा जैसे पूरा पहाड़ अपने ख़ाली होते घरों और उजड़ते आँगनों के साथ धीरे-धीरे बूढ़ा हो गया है। मैंने अपने मकान की बात फिर छेड़ी तो कुछ याद करते हुए से अपने लड़कों का नाम लेते हुए बोले, “जब तक वो सब यहाँ रहते थे, कभी-कभी तुम्हारा घर भी देख आते थे। पर अब तो वे भी छह-सात महीने में कभी आते हैं। हम बूढ़ों से अब उतनी चढ़ाई नहीं चढ़ी जाती, इसलिए बहुत दिनों से उधर जाना नहीं हुआ . . .”
चाबी की बात पर उन्होंने असमर्थता जताई। उन्हें कुछ मालूम नहीं था। फिर वे मुझे साथ लेकर तीन-चार मकान छोड़कर एक दूसरे घर में पहुँचे। वहाँ भी हमारे पुराने परिचित ही रहते थे। पूरा मामला सुनकर वे गंभीर हो गए। उन्होंने कहा, “ऐसी घटनाएँ अब यहाँ रोज़ का क़िस्सा होती जा रही हैं . . . चलो, देखते हैं . . . वे हमें लेकर मेरे मकान की ओर चले।
घर के पास पहुँचते ही उन्होंने कहा, “एक-दो बार इस मकान के आस-पास कुछ लोगों को आते-जाते देखा था। मुझे लगा तुम लोगों ने ही किसी को देखभाल के लिए भेजा होगा, इसलिए मैंने ध्यान नहीं दिया। बाद में भी कभी-कभार दो-तीन आदमी आते हैं और फिर चले जाते हैं। हम समझे कि शायद तुम्हारे लोग ही होंगे। पर अब लगता है कि मामला कुछ और ही है . . .”
जब मैंने स्पष्ट कहा कि, हमने किसी को यहाँ नहीं भेजा, तो उनका चेहरा गंभीर हो उठा। वे बोले, “यही तो समस्या है बेटा। बाहरी लोग धीरे-धीरे यहाँ आकर बस रहे हैं। ख़ाली पड़े मकानों और उजड़े गाँवों का फ़ायदा उठाकर सब कुछ हड़पने में लगे हुए हैं। पूरे उत्तराखंड में ऐसी घटनाएँ सुनने को मिल रही हैं . . .”
अब-तक अँधेरा घिर आया था। उन्होंने आग्रह किया, “आज रात मेरे यहाँ रुक जाओ। कल दिन निकलने पर और लोगों को बुला कर ठीक से पता करेंगे कि मामला क्या है . . .”
अगले दिन जो सच सामने आया, वह मेरी कल्पना से भी अधिक भयावह था। ‘खुमाड़’ से थोड़ा आगे मुख्य सड़क पर एक छोटी-सी चाय की दुकान थी। उसके बग़ल में एक मज़ार बनी हुई थी। वहाँ ‘भोला चायवाला’ नाम का बोर्ड लगा था। जब हमारे साथ गए लोगों ने मकान के बारे में पूछताछ की, तो वह आदमी अचानक भड़क उठा। उसकी आँखों में आक्रामकता उतर आई और वह झगड़े पर उतारू हो गया।
कुछ ही मिनटों में उसके जैसी गोल टोपी लगाए कई लोग वहाँ इकट्ठा हो गए। वह सब मिनटों में ही अचानक ही आक्रामक हो मरने-मारने पर उतारू हो उठे। यह सब हमारे लिए स्तब्ध कर देने वाला अनुभव था।
हमारे साथ आए चाचा और अन्य लोगों ने तुरंत अपने परिचितों को फोन किया। थोड़ी ही देर में कुछ स्थानीय लोग तथा सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता भी वहाँ पहुँच गए। किसी ने थाने में सूचना दे दी, जिसके बाद पुलिस भी मौक़े पर आ गई। इसी बीच उन लोगों के कुछ प्रभावशाली संरक्षक और सफ़ेदपोश समर्थक भी पहुँच गए, जिससे उनका मनोबल और बढ़ गया।
पुलिस के सामने वे पूरी हेकड़ी के साथ पेश आने लगे और अलग-अलग कहानियाँ गढ़कर अपने दावों को सही ठहराने का प्रयास करने लगे। कभी कहते कि यह स्थान वर्षों पुरानी ‘झल्लाह शाह’ की मज़ार है, तो कभी दावा करते कि यह ज़मीन उनकी है और संबंधित मकान उन्होंने बहुत पहले ख़रीद लिया था। उनके समर्थन में आए कुछ तथाकथित सेक्यूलर सफ़ेदपोश यह आरोप लगाने लगे कि हम लोग और पुलिस अल्पसंख्यकों को परेशान कर रहे हैं, उनके अधिकारों का हनन कर रहे हैं।
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई, जब वे सब पुलिस पर हमलावर हो गए, तो पुलिस ने सख़्ती दिखाते हुए उनके संरक्षकों को धकियाते हुए दूर कर दिया। और सभी पक्षों से पहचान-पत्र और अन्य वैध दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को कहा। जाँच के दौरान वे कोई वैध दस्तावेज़ नहीं दिखा सके। उनकी सारी गतिविधियाँ और ज़्यादा संदिग्ध संदेहास्पद दिखने पर पुलिस एकदम सतर्क हो उठी, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उनके कब्ज़े और दावे ग़लत निकले।
आख़िर पुलिस उन्हें हिरासत में लेकर मेरे घर पहुँची, ताला खुलवाया। अंदर का दृश्य देखकर मैं क्या सभी अचम्भे में पड़ गए, घर में जो सामान उनके काम का था, वह सब वे लोग ले जा चुके थे। बाक़ी सामान टूटा-फूटा इधर-उधर फेंका पड़ा था। लेकिन सबसे भीतरी कोठरी खुलते ही पुलिस सहित सभी की ऑंखें खुली की खुली रह गईं, भूँसों कूड़ों के ढेर हटाते ही बड़ी-बड़ी तलवारों, छूरों, तमंचों का पूरा ज़ख़ीरा सामने आ गया। पुलिस ने और फ़ोर्स बुला कर सारे हथियार ज़ब्त किये, और उन सब को उठा ले गई। अगली कार्रवाई तक मेरा घर भी सील कर दिया। मुझे अगले आदेश तक गाँव में ही रहने को कहा गया। उन सब से पूछताछ के बाद पुलिस ने दो दिन में उनके और दर्जन भर साथियों को गिरफ़्तार कर लिया। एक पूरा बड़ा गैंग उनकी पकड़ में आ गया। जो लूटमार, हत्या, ज़मीन, मकान क़ब्ज़ाने, अवैध हथियारों के धंधे, और देशविरोधी गतिविधियों में संलिप्त था।
जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि वे लोग अल्मोड़ा के एक स्थानीय नेता के संरक्षण में यहाँ आकर बसे थे। पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर क्षेत्र से बांग्लादेशी घुसपैठियों के एक समूह के साथ उत्तराखंड पहुँचे थे और धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों में फैल गए थे। उसी नेता के संरक्षण से उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड तक बन गए थे। एक सूत्र दूसरे सूत्र से जुड़ता गया। पुलिस ने अगले दस दिनों के भीतर दर्जनभर से अधिक अवैध घुसपैठियों को गिरफ़्तार किया। पूछताछ में चोरी, लूटपाट, हत्या और कब्ज़े के कई मामलों का भी ख़ुलासा हुआ।
मैं दिल्ली से केवल तीन-चार दिन के लिए गाँव आया था, लेकिन पचीस दिन तक रुकना पड़ा। मैं कका (चाचा) के यहाँ से रोज़ अपने घर जाता, सामने एक ऊँचे से पत्थर पर बैठकर उसे निहारता, पुरानी यादों में खोया रहता, मुझे रह-रह कर लगता जैसे बरसों पहले वाला मेरा परिवार अपने-अपने कामों में जुटा हँस-बोल खेल-कूद रहा है, ईजा (अम्मा) बाज्यू (बाबू) काम-धाम में जुटे सबको कुछ न कुछ बोल रहे हैं।
ईजा (अम्मा) बाज्यू (बाबू) की याद आते ही दिल्ली में बार-बार कही गई उनकी बातें कानों में गूँजने लगीं, “नंदन, एक बेर गौं दिखै दे, हमैं उहीं छोड़ दे। सब देख लियौ, अब मन म एकै बात रै गै छह, आखिरी सास अपणा घरै, अपणा खुमाड़ म्यरै निकळि जाल चाही।” ('नंदन एक बार गाँव दिखा दे, हमें वहीं छोड़ दे, सब देख लिया, अब मन में एक ही बात है कि आख़िरी साँस अपने घरे, अपने खुमाड़ में ही निकले . . . ) लेकिन काम धंधे के आगे न उनकी यह बात सुनाई देती थी, न उनकी आँखों के आँसू दीखते थे, अपनी अंतिम इच्छा लिए-लिए ही वह दोनों लोग वहीं चल बसे . . . और अब मेरी आँखों से आँसू टपक रहे थे, जब-जब वो, उनकी आख़िरी बातें याद आएँगी ये तब-तब बहेंगे . . .
मैं रोज़ आस-पास घूमता, हालात जानता समझता रहा, सब-कुछ मुझे बदलता दिख रहा था, बाहर के संपन्न लोग बड़ी संख्या में ज़मीनें ख़रीद रहे थे। जगह-जगह होम-स्टे, रिज़ॉर्ट और फ़ार्म हाउस बन रहे थे। धीरे-धीरे ज़मीनों की क़ीमतें बढ़ती जा रही थीं।
मैं रोज़ फोन पर दिल्ली में अपने भाइयों और परिवारवालों को सारी बातें बताता रहता। पर हर बार बात करते हुए मेरे भीतर एक अजीब-सी ग्लानि उठती, कि जिस गाँव को हमने वर्षों तक भुलाए रखा, आज वही गाँव हमें पुकार रहा है; और जिस घर को हमने बंद करके छोड़ दिया था, वहाँ बाऊंड्री के बीच अवैध बना नया मकान मानो हमसे पूछ रहा था, ‘इतने वर्षों तक तुम लोग कहाँ थे?’ बॉउंड्री अब भी वही पुरानी थी, वह मानो आईना दिखा रही थी मुझे कि देखो तुम सब हमारे प्रति कितने निर्दयी कठोर हो चुके हो, यह दुर्दशा, हमारे, खुमाड़, हरी-भरी देवभूमि के अस्तित्व पर मँडराता ख़तरा, मेरे प्रति तुम्हारी क्रूरता, उपेक्षा धनलिप्सा का जीता-जागता उदाहरण है। अब भी तुम आए हो तो केवल इसलिए कि यहाँ से भी कैसे धन उगाही कर सको . . . अब भी समय है सँभल जाओ नहीं बहुत कुछ पाने के चक्कर में, सब कुछ खो बैठोगे यह सम्पत्ति, ज़मीन, पहाड़ सब-कुछ . . .’
असमंजस में उलझा मैं दिल्ली में अपने भाइयों और परिवार के अन्य लोगों को सारी घटनाएँ बताता रहता तो उधर से हर बार एक ही बात सुनने को मिलती, “अपना ध्यान रखना . . . सावधान रहना . . . अकेले कहीं मत जाना . . .”
उनकी आवाज़ों में चिंता होती थी, भय होता था और शायद एक अनकहा अपराधबोध भी, जो वर्षों तक अपनी मिट्टी से दूर रहने के कारण भीतर कहीं दबा पड़ा था।
आख़िर मैंने एक दिन सबसे पहले एक स्थानीय ठेकेदार को बुलाया और अपने पुश्तैनी मकान को फिर से बसाने का काम उसे सौंप दिया। पुलिस ने क़ानूनी कार्यवाई पूरी करने के बाद परमिशन दे दी थी।
खंडहर होती बाउंड्री को देखकर मन में बार-बार यही विचार उठता था कि यह केवल ईंट-पत्थरों का घर नहीं, बल्कि हमारी पीढ़ियों की स्मृतियों का अंतिम अवशेष है। यदि इसे भी यूँ ही टूटने दिया, तो शायद हमारे अस्तित्व का एक हिस्सा हमेशा के लिए मिट जाएगा।
क़रीब पचीस दिन बाद, दिल्ली लौटने से पहले, मैं तीसरी बार माँ ‘मनिला देवी’ के मंदिर पहुँचा। पहाड़ों की शांत हवा में मंदिर की घंटियों की आवाज़ दूर तक गूँज रही थीं। देवदारों के बीच स्थित वह प्राचीन मंदिर मुझे ऐसे दिख रहा था, मानो वर्षों बाद लौटे किसी अपराधी पुत्र की प्रतीक्षा कर रहा हो। मैंने देवी के चरणों में सिर रख दिया। मन भीतर से भारी था। धीरे-धीरे आँखें नम हो गईं।
मैंने काँपते स्वर में कहा, “माँ, मुझे क्षमा कर दो। मैं धन और व्यापार की अंधी दौड़ में इतना खो गया कि अपनी जन्मभूमि, अपने पुरखों का घर और आपको दिया हुआ वचन, सब भूल बैठा। मैंने अपनी मिट्टी को अकेला छोड़ दिया। अब ऐसा नहीं होगा।”
उस क्षण मुझे लगा मानो वर्षों से मन की गहराइयों में जमा कोई अदृश्य बोझ धीरे-धीरे पिघल रहा हो। आँखों के सामने केवल गाँव नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों, अपनी स्मृतियों और अपने अस्तित्व का वह अंश खड़ा था, जिसे समय और दूरी की धूल ने लगभग ढँक दिया था। मैंने माँ के चरणों में सिर झुकाकर मन ही मन संकल्प लिया, “माँ, अब चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हमारे परिवार का कोई-न-कोई सदस्य हर दूसरे-तीसरे माह अपने इस गाँव, मातृभूमि और आपके दरबार में अवश्य आएगा। हम अपनी जड़ों को यूँ अकेला छोड़कर फिर कभी नहीं भूलेंगे।”
मंदिर से लौटते समय मैं पूरे गाँव में घूमता रहा। एक-एक घर गया, लोगों से मिला, उनका हालचाल पूछा। बूढ़े चेहरों पर बरसों बाद लौटे अपनेपन की एक धुँधली-सी चमक तैर रही थी। उनकी आँखों में जैसे वर्षों की प्रतीक्षा ठहरी हुई थी। वे मुझे देख रहे थे, पर शायद मेरे भीतर अपने बिछड़े हुए लोगों की छवियाँ खोज रहे थे। मैंने सबके सामने केवल इतना कहा—“बहुत जल्दी फिर लौटूँगा।”
और लौटते-लौटते हर परिवार से विशेष आग्रह किया कि अपने उन सभी लोगों को संदेश दीजिए जो रोज़गार या जीवन की तलाश में गाँव छोड़कर बाहर चले गए हैं . . . उनसे कहिए कि समय मिलते ही अपने घर एक बार अवश्य लौटें। क्योंकि जब तक लोग लौटते रहेंगे, तब तक गाँव जीवित रहेंगे। वरना एक दिन ये टूटे मकान, सूने आँगन भी नहीं बचेंगे . . . और उन आँगनों में अपने लोगों की प्रतीक्षा करती हुई स्मृतियाँ, क्योंकि तब सब-कुछ छिन चुका होगा, तुम्हारा कुछ न रह जाएगा, तुम बेघर शरणार्थी बन चुके होगे . . . उस दिन धन, वैभव और आधुनिकता के बीच खड़े होकर भी हम भीतर से निर्धन होंगे, क्योंकि लौटने के लिए अपना कोई घर नहीं बचेगा। हम अपनी ही धरती पर एक बेघर शरणार्थी की तरह भटकेंगे।
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