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रोशनी अभी बाक़ी है

 

कमरे में नीली रोशनी पसरी हुई थी। सामने टेबल पर एक छोटा-सा दीपक जल रहा था। उसकी नन्ही-सी लौ मानो अँधेरे को चुनौती दे रही थी।

वैदेही सिर झुकाए चुपचाप बैठी थी। आज फिर वह परीक्षा में केवल दो अंकों से रह गई थी। महीनों की मेहनत, रातों की नींद और आँखों में पलते सपने—सब कुछ जैसे उन दो अंकों के सामने हार गए थे।

मन में निराशा इतनी गहरी थी कि उसे लगा, अब सब समाप्त कर देना ही बेहतर है। लेकिन तभी उसकी नज़र उस छोटे-से दीपक पर पड़ी। वह लगातार जल रहा था। हवा के हल्के झोंके उसे डगमगाते ज़रूर थे, मगर बुझा नहीं पा रहे थे।

वैदेही कुछ देर तक उस लौ को देखती रही।

अचानक उसके भीतर एक प्रश्न उठा—“मैं हार कैसे मान सकती हूँ?”

क्या केवल दो अंक कम आ जाने से जीवन समाप्त हो जाता है? परीक्षा में असफल होना क्या जीवन में असफल होना है? लोग क्या कहेंगे—क्या यही सोचकर वह अपने माता-पिता का विश्वास तोड़ दे?

उसे याद आया—माँ के लिए वह आज भी वही नन्ही-सी गुड़िया है और पिता के लिए उनकी उम्मीद। उनके प्रेम के सामने परीक्षा के अंक कितने छोटे हैं!

उसने आँखें पोंछीं और गहरी साँस ली।

“इस बार नहीं हुआ तो क्या हुआ? अगले वर्ष फिर प्रयास करूँगी। इस बार और अधिक लगन से पढ़ूँगी। मुझे हारना नहीं है।”

सामने जलती हुई लौ अब उसे केवल दीपक की रोशनी नहीं लग रही थी। वह जैसे उसके भीतर भी एक नया उजाला जगा रही थी।

वैदेही उठी, किताबें समेटीं और मेज़ पर रख दीं।

उसे समझ आँ गया था—

अँधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी-सी लौ भी रास्ता दिखाने के लिए काफ़ी होती है।

और उस रात वैदेही ने जाना—परीक्षा में दो अंक कम हो सकते हैं, लेकिन जीवन में उम्मीद एक भी अंक कम नहीं होनी चाहिए।

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