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बोथ कथा

एक माँ अपने एक बच्चे को लेकर राम कृष्ण परमहंस जी के गई और कहा, “महात्मा जी, मेरे इस बेटे को समझाइए कि अत्यधिक गुड़ का सेवन स्वास्थ्य के लिए अहितकर है,” परमहंस जी उनकी बात ध्यानपूर्वक सुनी और दूसरे दिन फिर आने को कहा। 

जब वह दूसरे दिन फिर गई तो परमहंस जी मुस्कुराते हुए कहा, “बेटी कल फिर आना, बच्चे को लेकर।”

तीसरे दिन बच्चे को लेकर वह गई और बोली, “महात्मा जी, कुछ सलाह दीजिए ताकि अत्यधिक गुड़ खाने की लत से बेटे को मुक्ति मिले।”

परमहंस जी ने बच्चे को दुलारा और कहा, “बाबू, ज़्यादा गुड़ खाना स्वास्थ्य के लिए बहुत अहितकर है। तुम्हारी माँ जितना गुड़ तुम्हें दे, उतना ही खाना। ज़्यादा गुड़ के लिए ज़िद नहीं करना।”

बच्चे ने हामी भरी। 

एक सप्ताह बाद बच्चे की माँ फिर आई और परमहंस जी को प्रणाम किया और कहा, “महात्मा जी, आपकी सलाह से बच्चा सुधर गया है। लेकिन मेरे मन में एक प्रश्न है।”

“क्या प्रश्न है?” 

“आपने जो सलाह दी वह तीसरे दिन क्यों दी। यह सलाह आप पहला दिन ही दे सकते थे।”

“क्योंकि तीसरे दिन के पहले तक मैं ख़ुद ही अत्यधिक गुड़ अत्यधिक सेवन करता था। किसी को ज्ञान देने के पहले ख़ुद उस पर आचरण करना चाहिए नहीं तो ज्ञान अप्रभावी हो जाता है,” राम कृष्ण परमहंस जी ने कहा। 

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