चिट्ठियों की ख़्वाहिश
काव्य साहित्य | कविता महेश कुमार केशरी15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
आज सालों बाद खुला संदूक
तो उसमें मिली कुछ चिठ्ठियाँ,
चिट्ठियों के दिन पूरे हो चुके थे
पीले पड़ गए पुराने पृष्ठ
जगह-जगह से टूटते . . .
चिठ्ठियाँ बच्चों की तरह थीं ज़ोर
से खुलने लायक़ नहीं बल्कि
धीरे-धीरे सँभालकर!
चिठ्ठियाँ उछलकर बैठ गईं
मेरी गोद में
मनुहार करने लगीं पढ़ो मुझे
मैंनें झिड़क दिया चिट्ठियों को
कहा उतरो मेरी गोद से
मैं अभी बहुत व्यस्त हूँ
तुम्हें पढ़ने का वक़्त नहीं है, मेरे पास!
चिठ्ठियाँ अनुनय करने लगीं
सुबकने लगीं
उनकी पीठ छुआ तो वे रोने भी लगीं
बताया अपना दुःख कि उनको लोग
अब पढ़ते-लिखते नहीं
कहा मैं अब संदूकचे में नहीं
रहना चाहतीं
वहाँ अँधेरा होता है, हमेशा
कोई बोलने बतियाने वाला
नहीं होता है वहाँ
मैं रहना चाहती हूँ तुम्हारे
सिरहाने ताकि तुम जब तब
समय निकालकर पढ़ो
मुझे
चिट्ठियों को खोलते वक़्त
शब्द झर रहे थे
संवेदनाएँ गिर-गिर पड़ती थीं
आड़े-तिरछे अक्षरों का जाल
जिससे भाव पता चलता था
अगर चिट्ठियों ने ये अनुरोध
ना किया होता
तो मैं उन्हें मोड़कर वापस रख देता
अभी रात का समय था मैंनें
बड़ी वाली बत्ती जलाई और
पढ़ने लगा चिठ्ठियाँ
बरसों की यादें ताज़ा होने लगीं
शब्द वही पुराने थे
लेकिन मैं भीगने लगा संवेदनाओं
की नदी में
मैं बार-बार पढ़ने लगा चिट्ठियों को
और पकड़ने की चेष्टा करने लगा
शब्दों में छूटे हुए अर्थ!
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