उर्वरता
काव्य साहित्य | कविता महेश कुमार केशरी15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
ये रोपन का सीज़न है
अषाढ़ बीत चुका है
और हुई है एक स्त्री रजस्वला!
ये गर्भ धारण का समय है
धरती का
रजस्वला स्री हुई है गर्भवती
सावन का इस तरह हरा होना
दरअसल रजस्वला होना है प्रकृति का!
रिमझिम फुहार का होना दरअसल
मादकता भरना है प्रकृति में
धसक रहा है सावन
हँस रही हैं स्त्रियाँ
गा रही हैं गीत एक-दूसरे को छेड़ते
धान के बीचड़े जा रहे हैं रोपे
ये रजस्वला स्री का रज है जो
फूटेगा धान बनकर, बनेगा जाकर कहीं गेहूँ
तब यही रज गायों के थान में
उतरेगा बछड़ों के लिए दूध
बनकर
ये वही रज है
जो शिशु के होंठों से लगेगा
माँ का दूध बनकर
ये वही रज होगा जिसको काटेंगे
किसान पूस माघ में धान और गेहूँ, बोलकर
तब शिशु के मुँह में होगा
पहली बारिश की मिट्टी का स्वाद!
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