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आसान नहीं है घास पर कविता लिखना 

 

घास पर कविता कौन लिखता है 
ऐसा सोचते हैं लोग 
घास जिसे बूटों से रौंद दिया जाता है 
बूटों से केवल घास ही नहीं रौंदी जाती 
रौंद दिए जाते हैंं 
स्त्रियाँ, दलित और अल्पसंख्यक 
 
ये भी सोचते होंगे लोग कि जो आदमी 
घास पर कविता लिखता होगा 
वो निहायत ही देहाती या 
घंसगढ़वा क़िस्म का आदमी होगा 
जिस तरह सौंदर्यबोध कि कविता 
लिखी जाती है और लोग 
उसे पढ़कर वाह-वाह करते है़ं 
क्या उसी तरह पढ़ी जाएगी ये कविता
जो घास स्त्रियों, दलितों और
अल्पसंख्यकों पर मैं लिख रहा हूँ 
  
लेकिन सबसे बड़ी बात इन लोगों पर
कविता लिख तो रहा हूँ लेकिन ये सोच भी रहा हूँ 
कि कौन पढ़ता है आज के दौर में घास, स्त्रियों 
और दलितों के ऊपर लिखी कविताएँ 
 
फिर भी मैं कविता लिखना चाहता हूँ
स्त्रियों, दलितों और अल्पसंख्यकों 
पर 
घास, स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों 
पर कविता लिखना आसान नहीं है 
प्रायः इन चीज़ों पर कविता लिखने से बचना चाहते हैं लोग 
बचने वाले लोग वैसे लोग हैं 
जो दरबारी भाँड़ हैं
घास जैसी चीज़ या दक्खिन टोले की बात 
आते ही जिनके नथूनें बदबू से भर जाते हैं 
घास, स्त्रियों, दलितों की बात आते ही सत्ता 
के कान खड़े हो जाते हैं।

तत्काल ही 
घास पर कविता लिखने वाला आदमी 
उनको बागी दिखाई देने लगता है 
लोकतंत्र में जो सत्ता चला रहे हैं 
वो डर जाते हैं अदना सी 
घास पर लिखी कविता से 
सत्ता में बैठे लोगों को बदबू आती है 
घास छीलने वाले लोगों से 
सचमुच घास के ऊपर कविता लिखना आसान काम नहीं है
फिर भी मैं लिख रहा हूँ 
घास पर कविता! 

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