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तिलिस्म

 

तुम पहाड़ों पर जाओ
तुम जंगलों में जाओ
जाओ समुन्द्र किनारे
ये प्रकृति शृंगार करना चाहती है तुम्हारा
कभी कभी शाम ढले छत पर चढ़ आया करो
सूरज को बहाना दो सुबह फिर से उग आने का
कभी कभी टक्कर दो चाँद को, 
कभी सितारों के बीच जगमगाओ तुम
अँधेरी रात में किसी का दीपक बन जाओ
दुपहरिया होते ही बादल सा छा जाओ तुम
तुम में निहित है अनंत संभावनाएँ ख़ुशियों की
कभी मुस्कुराओ, किसी का इलाज बन जाओ तुम
तुम स्वाति नक्षत्र के वर्षा की बूँद
मैं चातक सा प्यासा, बेचैन
 
कभी बरस जाओ, मेरी प्यास बुझाओ तुम। 

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