अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

चाबी वाले खिलौने

 बचपन में हम सभी ने चाबी वाला खिलौना ख़ूब खेला है चाहे वो कार रही हो या जीप या मोटरसायकल या कोई अन्य इसकी ख़ासियत इतनी ही है कि यह उतनी देर ही चलायमान रहता है जितनी देर इसकी चाबी भरी रहती है। अगली बार चलाने के लिये इसमें फिर से घर्र-घर्र कर चाबी भरनी पड़ती है। बच्चा भी ख़ुशी-ख़ुशी इसके आगे पीछे भागता रहता है और बंद हो जाने पर इसमें बार-बार चाबी भरता रहता है।

गंगू आज नज़र दौडा़ता है तो सब ओर चाबी वाले खिलौने दौड़ते नज़र आते हैं। जितनी देर जैसी चाबी भरी जाती है उतनी देर वे चलते रहते हैं दौड़ते रहते हैं! जो बेटा माँ-बाप की आँख का तारा था वह शादी के बाद अपनी पत्नी को सितारा समझने लगता है समझना भी चाहिये सात फेरे व वचन जो लिये हैं उसको निभाना तो ज़रूरी है! शादी के बाद बहुधा वह चाबी वाला खिलौना हो जाता है, यदि संयुक्त परिवार है तो यह चाबी बार-बार भरने की ज़रूरत पड़ती है अपनी बॉबी के इस चाबी भरने के कारण ही भाई-भाई से लड़ने तैयार हो जाता है बेटा माँ-बाप को आँख दिखाने की हिमाक़त करने लगता है।

इडियट बाक्स की हर चैनल में चल रहे पारिवारिक सीरियलो में तो हम ऐसे चाबी वाले खिलौनों की भरमार देखते हैं यह माँ-बाप, भाई-भाभी के लिये भरमार बंदूक का काम कर रहे हैं!

राजनैतिक दलों में भी यह सिद्धांत लागू होता है जितनी चाबी आला-कमान द्वारा भरी जाती है उतना ही प्रवक्ता बोलता है एक ही विषय पर वह एक ही दिन में दो तरह के वक्तव्य बडी़ सफ़ाई से दे सकता है; यदि उसकी चाबी दो बार भरी गई है! संसद विधान सभा में भी तो हम देखते हैं कि सत्ता पक्ष या विपक्ष दोनो नों प्रमुख लोग चाबी वाले खिलौने की तरह पेश आते है जितनी चाबी उतनी मात्रा में लॉबी। यदि चाबी साँप की बाँबी में हाथ डालने समान किसी मुद्दे के लिये भरी गयी हो तो बाँबी में भी हाथ डालने से परहेज़ नहीं होने वाला।

फ़िल्म इंडस्ट्री में भी डायरेक्टर हीरो हीरोईन को चाबी वाला खिलौना बनाने की कोशिश करता है। कई बार इसी बात पर तक़रार हो जाती है यदि हीरोईन कहानी की माँग के सिद्वांत के आधार पर कपडे़ उतारने के लिये तैयार नहीं होती है तो फिर उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कारण वही चाबी वाला है कि निर्माता निंर्देशक की चाबी पर हीरोईन रूपी खिलौना चक्कर लगाने तैयार नहीं है। वकील भी केस लड़ते समय अपने मुविक्कल को चाबी वाले खिलौने की तरह पेश आने को कहता है कि उसने जितना कहा और समझाया है वैसा ही गीता पर क़सम खाकर झूठ बोलना नहीं तो सच के चक्कर में तुम्हे अगर उम्र क़ैद हो गई तो मै कुछ नहीं कर पाऊँगा!

रिटेल में इनक्यावन प्रतिशत निवेश की अनुमति होने व डीज़ल के दाम बढ़ने पर आपकी पार्टी क्या सर्मथन वापिस ले लेगी यह पत्रकार से पूछने पर प्रवक्ता कहेगा कि यह निर्णय तो पार्टी के श्रीमान या श्रीमती पार्टी की बैठक में लेंगे! पत्रकार कितना भी पूछे चाबी के हिसाब से ही हर बार जबाब आयेगा!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'हैप्पी बर्थ डे'
|

"बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का …

60 साल का नौजवान
|

रामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…

 (ब)जट : यमला पगला दीवाना
|

प्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…

 एनजीओ का शौक़
|

इस समय दीन-दुनिया में एक शौक़ चल रहा है,…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

आत्मकथा

लघुकथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं