चूहों के अस्पताल
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी सुदर्शन कुमार सोनी1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
इस समय सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों की आवाजाही कम, चूहों की ज़्यादा दिख रही है। मरीज़ को पर्ची कटवा लाईन में आना पड़ता है पर चूहा बिना पर्ची, बिन लाईन के सीधे प्रवेश कर जाता है। चूहे ‘शायद अस्पताल को ओपन ज़ू समझ रहे हैं जहाँ इंसान पिंजरे में व वे आज़ाद हैं।’ स्मार्ट हो चले चूहे अब जनरल वार्ड में कम, आईसीयू में ज़्यादा समय रह रहे हैं। आईसीयू में जब चूहा दौड़ता है तो मॉनीटर की बीप बदल जाती है। डॉक्टर को लगता है कि मरीज़ की हालत बिगड़ रही है पर असल में व्यवस्था की हालत बिगड़ गई होती है। रात में चूहा जब मशीनों के तार पर दौड़ता तो मरीज़ की साँस धौंकनी की तरह चलने लगती है। आत्मनिर्भर भारत के आत्मनिर्भर चूहों की संख्या व उनका आत्मविश्वास देखकर लग रहा कि चूहे स्थायी कर्मचारी व डॉक्टर नर्स संविदा पर हैं। अस्पताल के चूहे मस्त व तंदुरुस्त परन्तु मरीज़ पस्त व कमज़ोर दिखते हैं। यानी चूहे बैख़ौफ़ व मरीज़ व व्यवस्था ख़ौफ़ में। लगता है चूहों ने अस्पतालों के आईसीयू को अपना वीआईपी गेस्ट हाउस समझ लिया है। अब कोई भी मरीज़ अस्पताल में अकेलापन नहीं महसूस करता। कम से कम एक दो चूहों के साथ की पैकेज में गारंटी।
शवगृह में मुर्दे का डॉक्टर के पोस्टमार्टम के बाद चूहे दूसरा पोस्ट मार्टम अपने हुनर के अनुसार अलग से कर रहे। कोई आँख को तो कोई नाक को तो कोई बाँह को कुतर कर, कर डालता है। अस्पताल में रेबीज़ इंजेक्शन, ऑक्सीजन व ज़रूरी दवाओं का स्टॉक ख़त्म हो जाता है परन्तु चूहों का भरपूर है। अस्पताल प्रशासन नाक-कान कुतर जाने के बाद ही सामने आ कहता है कि स्थिति नियंत्रण में है। हाँ, नियंत्रण में है पर चूहों के; क्योंकि वे तय करते हैं कि नाक कुतरना है कि कान कि आँख। चूहों की आईसीयू व नवजात गहन चिकित्सा वार्ड तक में उपस्थिति प्रमाण है अव्यवस्था की व्यवस्था का। अस्पताल में चूहे यानी व्यवस्था वेंटीलेटर पर। मरीज़ सोचता है कि कौन-सा चूहा ज़्यादा ख़तरनाक है? . . . रात चार पैरों वाला जो उसके दो पैरों के ऊपर से निकल गया या दिन का दो पैर वाला जो उसके हक़ का महँगा इंजेक्शन स्टोर से निकलवा कालाबाज़ार में बेच आया।
वैसे चार पैरों वाले चूहों के बनिस्बत ये दो पैर वाले व्यवस्था के चूहों की कुतरने की क्षमता ज़्यादा होती है। इनका कुतरना कई प्रकार का होता है जैसे कि सड़क का डामर, पुल/तालाब का लोहा/सीमेंट कुतर डालना। इन वाले चूहों का पूरा एक पदसोपान होता है। कुतरन की कतरन ईमानदारी से बडे़ चूहों तक पहुँचाते हैं। बडे़ चूहों में एक ख़ास बात होती है कि वे अपने छोटों को कुतरने की पूरी छूट देते हैं।
व्यवस्था दिखावे के लिए चूहों को नियंत्रित करने बिल्लियाँ पालती है। पर वे कालांतर में चूहों से संगाबित्ती कर लेती हैं। अस्पताल के भूखे चूहों पर इतना हंगामा बरपा जा रहा है। जबकि व्यवस्था के पाले-पोसे मुश्तण्डे चूहे तो फ़ाईल कुतर जाते हैं। बजट चबा जाते हैं। जवाबदेही को निगल जाते हैं। योजनाओं में छेद कर निजी एटीएम बना, जब ज़रूरत अपने हिस्से की निकासी करते रहते हैं। दोनों प्रकार के चूहों में अंतर केवल इतना है वो बिल में रहते हैं—ये वातानुकूलित कमरों में। अस्पताल में दवा न हो तो बजट का रोना रोया जाता है, पर व्यवस्था के चूहों के लिए बजट की समस्या कभी नहीं होती। व्यवस्था के बडे़ चूहे छोटे चूहों का एक ऐसा उड़न दस्ता भी तैयार रखते हैं जो कि इशारा मिलते ही बड़ी-बड़ी हस्तियों के काले कारनामों की नस्तियों को चिंदी-चिंदी कर देती है। चार पैर वाले चूहे को तो ज़हर देकर मारा जा सकता है पर दो पैर वाले चूहों की दवा राजनैतिक इच्छाशक्ति ज़हर से ज़्यादा दुर्लभ है।
उसके वाले चूहों की धमाचौकड़ी का ज़्यादा हल्ला मचने पर व्यवस्था कहती है कि हम सुधार कर रहे हैं। पिंजरा व बिल्ली दोनों की ख़रीदी के लिए नस्ती बढ़ा दी है। उड़न दस्ते के चूहे इस नस्ती को भी मुक़ाम तक पहुँचने के पहले ही कुतर कर नीति का प्रारूप ही बदल डालते हैं। उधर वीआईपी कार्यालयों में घुसपैठ किए मोटे पारदर्शिता के हिमायती चूहे मीडिया में आने के पहले गोपनीय पत्र को सोशल मीडिया पर भेज गोपनीयता को कुतरने का कार्य करते रहते हैं।
अस्पताल हो या कार्यालय चूहा दौड़ रहा यानी सिस्टम सो रहा। यह व्यवस्था की असली ऑडिट रिपोर्ट है। इसके बाद किसी और ऑडिट की ज़रूरत नहीं। बल्कि ऑडिट फ़ीस का भुगतान तो इन चूहों को करना चाहिए।
अंत में सवाल यह नहीं है कि अस्पताल में चूहे क्यों कुतरन में लगे हैं? असली सवाल तो यह है कि जब व्यवस्था को चलाने वाले ही जगह-जगह से उसे कुतर रहे तो फिर बिलों के चूहों का काहे का दोष। अस्पतालों के चार पैर वाले चूहे तभी हटेंगे जब व्यवस्था के दौ पैर वाले चूहे हटें। पर उनको हटाना नामुमकिन सा क्योंकि वे हटाने वालों के रिश्तेदार हैं।
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