आपदा
कथा साहित्य | कहानी दीपक शर्मा15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
“हैप्पी बर्थडे,” सुबह सात बजे बहन ने मुझे मोबाइल किया था, “अपने स्कूल से मैं सीधे तुम्हारे पास पहुँच रही हूँ। दोपहर का खाना भी बनाऊँगी और शाम को पकौड़ी और हलवा भी . . .”
“हैप्पी बर्थडे टू यू टू,” उस के संग अपनी नाराज़गी भुला कर मैंने कहा था, “हम सभी तुम्हारे इंतज़ार में रहेंगे . . .”
बहन और मैं जुड़वाँ थे।
अभी पिछले ही महीने बहन ने अपने सहकर्मी अशोक से अपनी शादी रचाई थी। अंगरेज़ी भाषा पर उस के अधिकार पर वह विशेष रूप से मोहित रही थी।
माँ और मेरे विरोध के बावजूद।
“नौकरी शुरू किए तुम्हें कुल जमा एक साल ही हुआ है,” माँ ने कहा था, “और फिर अभी तेरी उम्र ही क्या है? आजकल तो लड़कियाँ पच्चीस से पहले शादी का नाम तक सुनना पसंद नहीं करती . . .”
“अशोक को तुम से ज़्यादा तुम्हारी तनख़्वाह प्यारी है,” मैंने कहा था, “शादी वह इसलिए जल्दी चाहता है, उसे आगे अपनी तीन बहनें ब्याहनी हैं . . .”
“दोनों स्वार्थवश ऐसा कह रहे हैं, बाबूजी,” बहन ने झट बाबूजी को हमारे सामने आन खड़ा किया था, “माँ को अपनी सेवा-टहल चाहिए और दुर्गेश को अपनी अर्ज़ियाँ भेजने की मुझ से फ़ीस . . .”
दो साल पहले माँ के बाएँ भाग पर फ़ालिज गिर पड़ा था और उनकी देखभाल के प्रति निश्चिंतता बरतनी असंभव जान पड़ती थी और इंजीनियरिंग के अपने इस चौथे साल में मैं किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में दाख़िला पाने के लिए इच्छुक रहा भी।
“गुणवती और पुण्यवती हमारी उषा का कोई भी निर्णय ग़लत नहीं हो सकता,” बाबूजी ने हम दोनों का विरोध मिटा डाला था, “उसकी छठी इन्द्रिय इलाही है और उस की पसंद मानो इलाही मुहर। याद नहीं उस बार दसवीं के इम्तिहान में उस के बताए वे सवाल छोटे के पर्चों में कैसे आन टपके थे?”
उस समय बाबूजी के सामने केवल पिछले साल का वह संयोग रहा जब छोटा भाई बाबूजी और बहन से गणित के अपने मुश्किल सवालों के हल निकलवा रहा था कि बीच में बहन कहीं से कुछ सवाल उठा लाई थी, “आज सवेरे अपने सपने में देखा यही कुछ सवाल तुम्हारे पर्चे में आए हैं।” मैंने उन सवालों को परे हटाना चाहा था लेकिन बाबूजी ने बहन के हाथ वाले सवाल मुझे हटाने न दिए थे। और जब वही सवाल आगामी दिनों के दौरान छोटे के पर्चे में हू-ब-हू उन्हीं रक़मों के साथ आन प्रकट हुए थे तो बाबूजी ने हम दोनों की पीठों पर हल्के धौल जमाते हुए कहा था, “इलाही अपनी इस बहन को अपनी रखवाल-दूत मान कर चलना सीखो। इसे ख़ुश रखोगे तो ज़िन्दगी भी तुम्हें ख़ुशी बख्शेगी . . .”
लेकिन भविष्य की दूरबीन न उनके पास रही न बहन के पास।
नहीं जानते रहे जीवन में गणितीय समीकरण नहीं होता।
नहीं जानते रहे बहन उनके इस कथन को ब्रह्मवाक्य मान कर अशोक के मामले में स्वयं के अचूक होने का भ्रम पाल लेगी।
नहीं जानते रहे इलाही शक्तियों से अपने को सम्पन्न मान कर बहन उस धरातल पर खड़ी होने जा रही थी, जिस का धँसना अवश्यंभावी था।
नहीं जानते रहे सामाजिक मान्यतायों की पकड़ के बिना संकुचित उन का दृष्टिकोण बहन को एक ऐसे अतिविश्वास से भर रहा था जिस की दीवार ढह जाने वाली थी।
♦ ♦
“उषा अभी तक नहीं आई,” अढ़ाई बजे के क़रीब माँ रोने लगीं, “कहीं कोई अनहोनी न हो गई हो। इस बार यहाँ से जाते समय हमें लेकर अशोक से अपने मनमुटाव की बात तो मुझे बताए थी। क्या मालूम उसीने उसे इधर आने से रोक दिया हो! मेरी मानो, छोटे के संग मिठाई देने के बहाने उषा का पता करके आओ . . .”
बहन के ससुराल के प्रति सद्भाव प्रकट करने हेतु माँ ने बाबूजी के हाथ मिठाई का एक डिब्बा पहले से ही मँगवा रखा था।
माँ को मैंने नहीं बताया इस बीच बहन को मैं कई बार मोबाइल कर चुका था परन्तु वह स्विच ऑफ़ मोड पर रहा था।
“साइकिल निकालो, छोटे,” मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज चले जाने से मेरी साइकिल उसकी मल्कियत बन चुकी है।
“साइकिल मैं चलाऊँगा,” बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा छोटा हर किसी के काम आने को आतुर रहता है। बहन की कमी उस ने माँ को महसूस नहीं होने दी है। समय पर माँ को अपनी चाय, अपना नाश्ता, अपना भोजन और अपनी दवा उसी नियमितता से उसी के सहयोग से उपलब्ध हो जाती है, जिस नियमितता का अभ्यास बहन ने शुरू कर रखा था।
बहन की ससुराल से पहले छत पर फैलीं मुझे वे चादरें दिखाई दीं जिन्हें मैं अच्छी तरह पहचानता था। अपने दहेज़ का अधिकांश सामान बहन ने हम भाइयों के संग ख़रीदा था। केवल ज़ेवर ही बाबूजी की संगति में लिए गए थे।
बहन की ससुराल जिस बँगले के पिछवाड़े किराए के चार कमरों में डेरा डाले हैं, वे अजीब ऊट-पटाँग ढाँचा रखे हैं। पहले दो कमरे बँगले की मोटर गैराज से संलग्न ऊपर छत की ओर जा रही सीढ़ियों की ओट में खड़े हैं तो दूसरे दो सीढ़ियों की दिलहेबंदी ख़त्म होते ही अकस्मात् प्रकट हो लेते हैं। एक बाएँ हाथ और दूसरा एकदम सामने। दाएँ हाथ छत खुलती है।
बहन का कमरा ऊपर बाएँ हाथ वाला था।
हमने अपने क़दम इसीलिए सीढ़ियों की तरफ़ ही बढ़ाए।
सीढ़ियाँ धुल रहीं थीं।
बहन की बड़ी ननद बाल्टी और मग लिए थी और मँझली झाड़ू।
दिसंबर की उस सर्द दोपहर में दोनों के पैर नंगे थे।
“तुम्हारा जन्मदिन भी आज ही है?” मँझली ने अपने हाथ का झाड़ू छोड़कर मेरे हाथ से मिठाई का डिब्बा ले लेना चाहा।
“ज़रूर होगा,” बड़ी ने भी हाथ की बाल्टी नीचे रख दी, “तुम भी उषा के साथ पैदा हुए थे?”
“उषा ऊपर है?” जवाब देने की बजाए मैंने पूछा। अपना रास्ता रुका हुआ पा कर मिठाई के डिब्बे पर मेरे हाथों ने अपनी पकड़ बढ़ा दी।
“तुम भी आज अपने पच्चीसवें साल में दाख़िल हुए?” जवाब न देने की बारी बड़ी ने अपने ऊपर ले ली।
“नहीं,” छोटे ने मेरी तरफ़ से उत्तर दिया, “आज ये दोनों चौबीस के पूरे हुए।”
“उषा ऊपर है?” मैंने अगला पैर सीढ़ियों पर धर दिया।
सीढ़ियों पर जगह-जगह ख़ून के धब्बे मेरी निगाह में उतर लिए।
“नहीं,” मँझली ने उत्तर दिया, “उषा भाभी का हाथ कट गया है। भैया उसे अस्पताल ले कर गए हैं।”
“सीढ़ियों पर ये धब्बे उषा के ख़ून के हैं?” मेरे होश उड़ चले।
“ख़ून? कैसा ख़ून?” बड़ी ने मग एक तरफ़ हटा कर पानी की पूरी बाल्टी सीढ़ियों पर उँडेल दी।
पानी के कई छींटे हमारे पास आ पहुँचे।
“कौन से अस्पताल ले कर गए हैं?” मैंने पूछा।
“हमें नहीं मालूम,” मँझली की हँसी में शरारत साफ़ झलक आई।
“आप बताइए,” मैंने बड़ी से पूछा।
“नहीं मालूम,” ख़ाली बाल्टी लिए लिए वह सीढ़ियाँ उतर ली।
उनका ग़ुसलख़ाना नीचे रहा। सीढ़ियों के ऐन नीचे। छाजन के लिए सीढ़ियों को ग्रहण करता हुआ।
“बाबूजी से बात करते हैं,” गेेट से बाहर निकलते ही मैंने छोटे से कहा।
लेकिन उन का फ़ोन हमें मिला नहीं।
न चाहते हुए भी फिर मैंने अशोक का नंबर मिलाया। मगर उस ने उठाया नहीं।
“बाबूजी के पास चलते हैं,” अपने अंदर जमा हो रही चिंता को मैं छोटे पर प्रकट नहीं करना चाहता था।
“इतनी दूर?”
बाबूजी जिस सार्वजनिक पुस्तकालय में सुबह के आठ बजे से शाम के छह बजे तक डिप्टी लाइब्रेरियन की हैसियत से काम करते हैं वह बहन की ससुराल से आठ किलोमीटर की दूरी पर तो रहा ही था।
“साइकल इस बार मैं चलाऊँगा,” मैंने छोटे से कहा, “मिठाई का डिब्बा तुम पकड़ लो . . .”
“मिठाई उन्हें दी नहीं?”
“मिठाई उषा के लिए थी . . .”
रास्ते भर मैं सोचता रहा ‘है’ की बजाए मैं ‘थी’ क्यों बोल उठा था?
♦ ♦
बाबूजी अपने पुस्तकालय में न थे।
“अभी एक घंटा पहले अस्पताल से आपके जीजा का उन्हें फ़ोन आया था। आप की बहन एमरजेंसी में हैं,” लाइब्रेरियन से हमारी जान-पहचान अच्छी थी।
“कौन से अस्पताल?” एक तीखी झुरझुरी मेरी समूची काया को कँपा-कँपा गई।
“शायद सिविल में . . . हाँ, सिविल ही में . . .”
♦ ♦
सिविल अस्पताल पहुँचने पर हमने बाबूजी को कई लोगों से घिरे हुए पाया।
घेरने वाली भीड़ में डॉक्टरों के एप्रेनों के साथ पुलिस की कुछ वर्दियाँ भी रहीं।
“सौरी, यंग मैन,” हम भाइयों को देखते ही अशोक मेरी ओर बढ़ आया, “तुम्हें मैं आज ‘विश’ नहीं कर सकता, मैनी हैप्पी रिटर्नज़ औव द डे, (यह दिन बार-बार आए) . . .”
“उषा कहाँ है?” मैंने पूछा।
“अ चांस एक्सीडेंट, (एक सांयोगिक दुर्घटना), अ शीयर एक्सीडेंट, (एक विशुद्ध दुर्घटना), अ ट्रैजिक एक्सीडेंट, (एक अनर्थकारी दुर्घटना),” अशोक ने अपने हाथ मेरे कंधों पर टिकाने चाहे, “दोपहर में सब्ज़ी काटते समय उस के हाथ की छुरी उस की अपनी ही कलाई पर चल गई और वह . . .”
“वह क्या?” अशोक के हाथ मैंने अपने कंधों से नीचे झटक दिए।
“द वर्सट हैपन्ड, (बदतरीन हो गुज़रा) . . .”
अशोक की गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मैंने दे मारा।
हकबका कर अशोक बाबूजी की दिशा में बढ़ लिया।
“इधर आओ, दुर्गेश,” कुछ ही देर में भीड़ चीर कर बाबूजी हम भाइयों को एक कोने में ले गए, “अशोक ने मुझे धमकी दी है, कि उषा के मामले को अगर हम पुलिस केस बनाएँगे तो वह तुम्हारे विदेश जाने पर रोक लगवा देगा। तुम्हारा पासपोर्ट जारी नहीं होने देगा। अपना मुजरिम क़रार कर देगा तुम्हें . . .”
वहीं उसी कोने में पालथी मार कर मैं फूट-फूट कर रोने लगा।
“यह समय हौसला बाँधने का है,” बाबूजी मुझे ज़मीन से ऊपर उठा दिए, “यह समय बैठने का नहीं। रोने का नहीं। छोटे को हिम्मत दिलाने का है। उसे रोने देने का नहीं। उसके साथ तुम घर पहुँचो। मैं जो यहाँ रुका हूँ। यहीं रुकूँगा। सब देख रहा हूँ। आगे भी देखूँगा। तुुम घर पहुँचो। जल्दी। राजलक्ष्मी उधर अकेली है . . .”
“माँ को क्या बताएँगे?” मेरी रुलाई दुगुनी तेज़ हो ली, “उषा हमें छोड़ गई है?”
“तुम्हें रोना बिल्कुल नहीं,” बाबूजी ने मेरे कंधे थपथपाए, “छोटे की ख़ातिर, राजलक्ष्मी की ख़ातिर, मेरी ख़ातिर . . .”
मैंने अपने आँसू पोंछ लिए।
“राजलक्ष्मी से अभी ख़ुलासा हाल नहीं कहना,” बाबूजी का गला भर आया, “उसे कुछ बताने से पहले हमें अपने डॉक्टर चंद्रा की सलाह लेनी होगी . . .”
♦ ♦
“उषा ने बताया नहीं अपने स्कूल से वह यहाँ क्यों नहीं आई,” घर पर माँ बहुत अधीर रहीं।
“अशोक ने उसे आने नहीं दिया,” मैंने कहा।
“आप की चाय बना लाऊँ?” छोटे ने माँ से पूछा, “शाम की अपनी दवा आपको अभी खानी होगी . . .”
“बना लाओ, जाओ,” मैंने छोटे से कहा।
“तुम्हारे लिए उषा ने ज़रूर कोई महँगी गिफ़्ट ख़रीदी होगी और अशोक ने उधर कोई बखेड़ा खड़ा कर दिया होगा,” माँ ने कहा।
“क्या मालूम?”
“और वह मिठाई का डिब्बा? उषा ही के हाथ में दिया न?”
“हाँ,” मैंने सिर हिला दिया और छोटे के संग माँ के कमरे से बाहर चला आया।
छोटे के हाथ से मिठाई का वह डिब्बा कब और कहाँ अलग हुआ था, मुझे ध्यान न रहा था।
लेखिका: दीपक शर्मा
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