सन् 1931 में . . .
कथा साहित्य | कहानी दीपक शर्मा1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
[मेरी मौसी की क़लम से उनकी यह बीती सुनिए]
असली मेरी जाई कटखनी थीं। बदनसीब थीं। बावली थीं।
यह मैंने अपने परिवार में हुए एक बवाल के बीच जाना।
वह ऊपर वाली मंज़िल पर रहती थीं और उन्हें पागलपन की वजह से ताले के पीछे रखा जाता था। ताले की चाभी हमारी नौकरानी, मेहरां, के पास रहती थी जो ऊपर उन के पास रात में सोती थी ही, दिन में भी उन के खाने-पीने और डॉक्टर के इंजेक्शन की व्यवस्था करने में लगी रहती।
भाभी जी (उन दिनों माँ को भाभी जी व पिता को भाई जी पुकारा जाता था) इतवार के इतवार मोहरां को नीचे अपनी मदद के लिए ज़रूर बुलवा लिया करतीं। सबसे ज़्यादा मदद उन्हें मेरे बाल धुलाने में चाहिए होती। बाल मेरे लंबे बहुत थे। तिस पर ख़ूब घने भी। और उन की धुलाई व कंघी-पट्टी वाक़ई एक जल-परीक्षा।
“मैं आज बाल न धोऊँगी,” उस इतवार के दिन मैंने अपने बाल धुलाने को टाल जाना चाहा। सन उन्नीस सौ इकतीस के उन दिनों मैं ग्यारह-बारह की थी।
“इसके बाल कटवा दीजिए,” मोहरां हँसी, “एन्नी बीसेंट की तरह।”
हमारे भाई जी की एक तस्वीर में एन्नी बीसेंट भी साथ में खड़ी थीं। जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष चुनीं गईं थीं, सन उन्नीस सौ सोलह में। तब से पन्द्रह साल पहले। भाई जी हमारे देश की राजनैतिक गतिविधियों में तब सक्रिय रहा करते।
“बाल काटने ही होते तो पहले ऊपर वाली के न काट देते जिसके बाल इस से भी दुगुने लंबे और भारी हैं?” मोहरां की बात पर भाभी जी बोलीं थीं।
“और जो नहाते समय इस से भी दुगुना हल्ला करती हैं?” मोहरां फिर हँस पड़ी।
ऊपर वाली को बुद्ध के बुद्ध नहलाया जाता था। सुमित्रा को और मुुझे भी साथ लिवा कर। एक मुहिम में भाग लेने की तरह। भाभी जी और मोहरां मिल कर पहले उन का मुँह बाँधतीं। हाथ बाँधतीं। पैर बाँधतीं। और फिर हम चार जनी मिल कर उन्हें साबुन लगातीं। रगड़तीं। माँजतीं। तेल लगातीं। और चमका देतीं। प्रतिक्रियास्वरूप यदि वह अपने अंग अकड़ा लेतीं या झटक देतीं तो उनका स्नान रोक कर हम थोड़ी देर के लिए कुछ दूरी पर जा खड़ी होतीं। पशुवत ज़ोर उनमें बला का रहा। बँधे मुँह ही से गाली-गलौज और बँधे हाथ-पैर ही से उठा-पटक ऐसी उग्रता से विस्फोटित करतीं कि उनका स्वर उतारने में और हाथ-पैर क़ाबू में लाने में डॉक्टर का बताया हुआ मौरफ़ीन इंजेक्शन ही फिर काम में लाया जाता।
“आज मैं बाल कटवा ही लूँगी,” मैंने कहा और दालान पार कर भाई जी की बैठक में जा दाख़िल हुई।
सड़क की तरफ़ से बैठक का दरवाज़ा बंद था और केसर चाचा के साथ भाई जी उसी साल रिलीज़ हुई हिंदी की पहली टौकी फ़िल्म ‘आलम आरा’ का एक गाना गुनगुना रहे थे: रूठा है आसमान . . .
“मेरे बाल काट दीजिए भाई जी,” उन की कुर्सी पर उनकी गुनगुनाहट धीमे पड़ते ही मैं पहुँच ली।
“बच्ची ठीक कह रही है,” केसर चाचा उत्साह से भर लिए, “अपने देशवासियों की ग़ुलामी मिटानी हमारे वश में हो न हो, इस बच्ची को तो इस की बेड़ियों से आज़ाद किया ही जा सकता है . . .”
चार-चार शाखाओं में बाँधी गई अपने बालों की दोनों वेणियों के रिबन खोल कर उस समय मैं उन्हें अपनी बाँहों में अपनी बेड़ियों की तरह ही लपेटे खड़ी थी।
“हाँ, चाचा जी, इन्हें स्नान कराने में मेरा बहुत-सा समय बरबाद हो जाता है,” मैंने मुँह बिसूरा।
अपने को आज़ाद-ख़्याल दिखलाने का भाई जी को एक सनक की हद तक शौक़ रहा।
डींग-डींग में उन्होंने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी कैंची निकाली और मेरी दोनों वेणियाँ सिरे से काट डालीं।
मेरा सिर पंख की तरह हल्का महसूस करने लगा।
दोनों वेणियों को हाथों में घुमाती हुई मैं दालान में लौटी तो मोहरां की चीख़ निकल ली।
“सिर मुणीए,” भाभी जी चिल्ला उठीं, “क्या कुफ़्र तोल कर आयी है?”
उन दिनों साधारणजन के परिवारों में स्त्रियों के बालों पर कैंची नहीं चलाई जाती थी। बल्कि गाली में भी किसी लड़की को ‘सिरमुणी’ कहने से हमेशा बचा जाता था। केवल विधवाओं ही के बाल मूंडे जाते थे। और वह भी जबरन।
भाभी जी मुझे मारने दौड़ीं तो भाई जी की बैठक में मैं उसी पैर लौट आयी, “भाभी जी मुझे पीटने जा रही हैं . . .”
भाई जी ने मुझे अपनी गोदी में उठा लिया और दालान में आ पहुँचे, “ख़बरदार जो मेरी बेटी को ज़रा भी झिड़का या डपटा। उस के बाल मैंने काटे हैं। जो कहना है मुझे कहो . . .”
“ऊपर जाकर इसकी माँ के बाल भी काट आओ,” ग़ुस्से में भरी भाभी जी उबल पड़ीं।
“क्या बोली तू?” मेरे भाई जी ने मुझे गोदी से उतारा और भाभी जी के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा दे मारा, “क्या बोली?”
भाभी जी की बोलती बंद हो गई।
“इसे अब नहला दो, मोहरां,” मेरे भाई जी ने आदेश दिया और बैठक की ओर अपने डग बढ़ा ले गए।
नहाते समय मैंने मोहरां से पूछा, “ऊपर वाली मौसी मेरी माँ कैसे हुई?”
तो उसका जवाब मिला, “हम कुछ नहीं जानतीं। अपने भाई जी से पूछना . . .”
शाम को भाई जी घर के अंदर आए तो मैंने उनसे भी जा पूछ देखा, “ऊपर वाली मौसी मेरी माँ कैसे हुईं?”
तो उन्होंने भी मुझे टाल दिया, “तेरी माँ तेरी भाभी जी ही हैं। ग़ुस्से में वह ऐसे ही अंट-शंट बकने लगती है। तू देखना, सुमित्रा पर ग़ुस्सा होगी तो मेहरां को उसकी माँ बना देगी . . .”
भाभी जी से तो मैंने कुछ नहीं पूछा लेकिन जब बुद्ध आया और ऊपर वाली मौसी को नहलाने हम ऊपर पहुँचीं तो बहाने-बहाने से मैंने उनके मुँह की पट्टी खोल डाली, “आप मेरी माँ हो?”
जवाब में उन्होंने मेरे लिए, भाभी जी के लिए, भाई जी के लिए इतनी गाली बकी कि तत्काल उन का मुँह बाँधना ज़रूरी हो गया। इंजेक्शन देना ज़रूरी हो गया। यहाँ तक कि डॉक्टर को बुलाना ज़रूरी हो गया।
और उसके तीसरे दिन वह कूच भी कर गईं। लेकिन जब उन्हें सजाया गया तो सभी ने दाँतों तले अपनी उँगलियाँ दबाकर दबी आवाज़ में यही कहा, “बड़ी लड़की से इसकी सूरत ऐसी मिलती है मानो उस की माँ ही हो।”
एक वह दिन है और एक आज का दिन है। तभी से एक दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब मैंने उन्हें स्मरण न किया हो। नमन न किया हो। या फिर उन्होंने मुझे दर्शन न दिए हों। मुझे परेशान न किया हो। मुझे व्याकुल न किया हो . . .
बाद में मैं यह भी जाना भाभी जी की भाई जी से इस शर्त पर शादी हुई थी कि वह मुझे कभी पता नहीं लगने देंगी कि मैं एक पागल माँ की बेटी हूँ . . .।
लेकिन कुछेक सवाल ऐसे ज़रूर हैं जो मैंने भाई जी से हमेशा पूछने चाहे: भाई जी मेरी माँ कब पागल हुईं? कैसे पागल हुईं? उनकी ख़ुशियाँ भाभी जी के पल्ले में आपके बाँधने से पहले हुईं या बाद में? या फिर इसी ही वजह से वह पागल हो गईं?
लेकिन मेरे मन में भाई जी के लिए बहुत लिहाज़ था। और उसी लिहाज़दारी की ख़ातिर मैं उन्हें शर्मिंदगी से बचाना चाहती थी जो उन्हें मेरे सवाल उठाने पर हुई होती . . .
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