कुंती का खेल
कथा साहित्य | कहानी दीपक शर्मा1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
कुंती को वह खेल अकस्मात् ही सूझा था।
टंडन मेम साहब उस समय अपने ग्राहकों के साथ गोल कमरे बनाम अपनी आर्ट गैलेरी में रहीं और कुंती गोल कमरे के उपकक्ष में।
दिन में दीर्घावधि के लिए जब भी बेबी सोती, टंडन मेम साहब कुंती को अपने गोल कमरे के उपकक्ष में बुला लेतीं। अपनी आर्ट गैलेरी के कच्चे माल को उसके हाथों चमकाने-दमकाने।
गोल कमरे में जब भी ग्राहक रहते, कुंती स्वछंद महसूस करती। उन कुछेक पलों के लिए टंडन मेम साहब कुंती पर अपना अंकुश ढीला छोड़ देतीं और कुंती का आकाश और काल कुंती के पास लौट आता।
अवधि एक समान न रह कर घटती-बढ़ती रहती क्योंकि अपने ग्राहकों के साथ टंडन मेम साहब का हिसाब अजीब जमा-माफ़ी का रहा करता।
अपनी पुराकालीन कलाकृतियों की कालावधि व कौतुक-क्षमता टंडन मेमसाहब अपने ग्राहकों की समृद्धि व बुद्धि के अनुपात से निर्धारित करतीं। एक ही चीज़ के दाम एक ग्राहक को तीन सौ रुपए बतातीं तो दूसरे ग्राहक को तीन हज़ार। एक ही प्रश्न का उत्तर एक ग्राहक को संक्षिप्त मिलता तो दूसरे को विस्तृत।
गोल कमरा यदि टंडन मेम साहब की आर्ट गैलेरी थी तो यह उपकक्ष उसकी नेपथ्यशाला।
गोल कमरे में प्रदर्शित वस्तुओं की चिकनाई-रगड़ाई तो इस उपकक्ष में सम्पादित होती ही, साथ-ही-साथ नए आए अंगड़-बंगड़ की काया भी यहीं पलटी जाती।
किसी बेडौल टूम-छल्ले को रेती से काट कर टंडन मेम साहब इधर चिपकातीं तो दूसरे मटियाले ठीकरे को पोत कर उधर नाथतीं।
तरह-तरह की छोटी-बड़ी, गोल-चौकोर चीज़ों को अपने हाथ के छल-बल से, अलग-अलग ढंग से, टंडन मेम साहब सजातीं-सँवारती और चीज़ें बदल-बदल जातीं।
कुंती उस दिन एक हलाकू फूलदान पर पूरी दोपहर काम करती रही थी।
फूलदान टोंटीदार था और टोंटियों के रूप में उन दो घोड़ों की आकृति घनी रगड़ के बाद ही स्पष्ट हुई थी।
घोड़ों को देखते ही कुंती अपनी हलाकानी भूल कर विस्मय से भर गई।
घोड़े बहुत सुंदर थे। फूलदान के फलक पर कंचाए गए दूसरे नक़्क़ाशीदार घोड़ों से ये घोड़े मेल ज़रूर खाते थे परन्तु ये घोड़े फूलदान का अंश नहीं थे। अपना अलग अस्तित्व रखते थे।
कुंती ने घोड़े समीप से निहारने चाहे। घोड़े अपने बल पर फूलदान को कुंती की पकड़ में रोके रखने में असमर्थ रहे और फूलदान उन से विलग हो कर नीचे कालीन पर गिर गया।
कुंती ने लपक कर हानि आँकी।
हानि मरम्मत के अयोग्य न थी।
मज़बूत गोंद ने अपनी कारीगरी दिखाई और घोड़े पहले की तरह फूलदान के संग जा चिपके।
कुंती को वह खेल उसी पल सूझा। उसके हाथों में उस खुजली का सूत्रपात उसी पल हुआ, जिस के अंतर्गत उसे गोल कमरे में रखी सभी वस्तुओं को खंडित कर छितराना, और फिर उन्हें पुनर्स्थापित करना अत्यावश्यक लगने लगा।
उपकक्ष में रखे सभी औज़ार, सभी चूरे व सभी घोल कुंती के देखे और जाने रहे।
उन्हीं को साम्य रख कुंती गोल कमरे से अपना अहेर उपकक्ष में खिसका लाती और सही अवसर मिलते ही उसके अंगों को उसके मुख्य साँचे से पृथक कर ख़ूब हँसती। फिर जब वह संतुष्ट हो जाती तो उन्हें पुनर्गठित कर संतोषजनक अवस्था में गोल कमरे में वापस पहुँचा आती।
♦ ♦
“हमारी बेटी बहुत होशियार है, मेम साहब,” दो वर्ष पहले कुंती जब अपने गाँव के घर में अपनी माँ व तीन छोटी बहनों को तथा अपने गाँव के स्कूल में अपनी छठी कक्षा की किताबों व सहेलियों को हमेशा के लिए छोड़ कर इस शहर में इस नौकरी के लिए लिवाई गई थी, तो उसके चपरासी बप्पा ने इन्हीं शब्दों के साथ कुंती को टंडन मेमसाहब से मिलाया था, “यह बेबी का काम सँभाल लेगी, मेम साहब। उधर गाँव में इस का बहुत नाम रहा। स्कूल की हर कक्षा में इसे हमेशा पूरे-पूरे नंबर ही मिले, कभी आधा नंबर भी कम नहीं रहा . . .”
“तुम्हारा नाम क्या है?” उसकी ओर देखकर टंडन मेमसाहब किसी परी की मानिंद मंद-मंद मुस्करायीं थीं।
“शकुंंतला। मगर आप मुझे कुंती के नाम से पुकार सकती हैं। शकुंतला मेरा स्कूल-नेम था . . .”
“तुम बहुत होशियार हो, शकुंतला,” टंडन मेमसाहब ठठा कर हँस दी थीं, “मैं तुम्हें कुंती नहीं कहूँगी। तुम्हें तुम्हारे स्कूल-नेम, शकुंतला के नाम ही से पुकारूगीं . . .”
“मैं पानी पीना चाहती हूँ, मेम साहब।”
“तुम्हें तो भूख भी लगी होगी, शकुंतला।”
कुंती ने स्वीकृति में सिर हिलाया था। उसके गाँव से यह शहर बहुत दूर रहा था और अम्मा ने पूरी-भाजी की जो पोटली उसके संग रखी थी, वह रास्ते में ही चुक गई थी।
“बावर्ची इस समय डॉक्टर साहब का खाना बना रहा है, शकुंतला। तुम्हें खाने के लिए अभी इंतज़ार करना पड़ेगा। यहाँ सब लोग डॉक्टर साहब के खा लेने के बाद ही अपना खाना खाते हैं। सामने रसोई है। तुम बावर्ची से कहना, मैंने तुम्हें भेजा है। तुम्हें तुम्हारे पानी के लिए।”
टंडन साहब उन दिनों सरकारी अस्पताल के हड्डी विभाग के मुख्य थे। और दोपहर का खाना घर पर खाते थे।
पानी पी कर कुंती टंडन मेमसाहब के पास लौटी ही थी कि उन्होंने एक बदरंग थाली एक कटे हुए नींबू के साथ उसे थमा दी थी।
“बेबी इस समय सो रही है,” टंडन मेमसाहब का चेहरा रूखा हो आया था, “तब तक तुम इसे नींबू से रगड़ कर ख़ूब चमकाओ। देखें तुम्हारा काम कैसा है?”
कुंती ने अनिच्छा से थाली पर नींबू रगड़ना शुरू कर दिया था। टंडन मेमसाहब एक किताब पकड़कर कुंती के काम का निरीक्षण करती रहीं थीं।
थोड़ी देर बाद बेबी वहाँ आ पहुँची थी। उस समय वह दो-अढ़ाई साल की रही होगी।
बेबी के हाथ में एक टूटी गुड़िया थी जिससे उस ने आते ही टंडन मेमसाहब के सिर पर वार किया था।
“क्या हुआ, बेबी?” अस्त-व्यस्त हो आए अपने बाल टंडन मेम साहब ने सँवारे थे।
“ऊ . . . ऊ . . . ऊ,” बेबी ने अपना प्रहार दोहराया था।
“क्या है?” ताव खाकर टंडन मेमसाहब ने बेबी को एक ज़ोरदार चपत लगायी थी।
बेबी ने गुड़िया ज़मीन पर पटकी थी और हू-हू-हू के साथ ज़मीन पर लोटने लगी थी।
इतने में बाहर एक घंटी बजी थी और बावर्ची रसोई से निकल कर बाहर की ओर लपक लिया था।
आगंतुक टंडन साहब थे। बेबी के रोने की आवाज़ उन तक पहुँच ली थी और वह सीधे वहीं चले आए थे।
उन्हें देखते ही टंडन मेम साहब बेबी को मनाने लगीं थीं, “बेबी, मेरी लाड़ली बेबी। तुम्हें आज ही तुम्हारे पपा नई गुड़िया दिला देंगे।”
“आज क्या हुआ?” उन के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट थी।
“इस की पुरानी गुड़िया ने आज इसे बहुत सताया है,” टंडन मेमसाहब ने हँसी छोड़ी थी।
“शट अप। बहुत शर्म की बात है। यह मेरे खाने का समय है और तुम एक बच्ची को नहीं सँभाल सकती . . .”
“आप सही कह रहे हैं, बेबी का इस समय रोना ग़लत है। बेवक़्त है। आए एम सौरी,” आँखों में आ रहे आँसू टंडन मेमसाहब ने पीछे धकेल दिए थे, “वैरी सौरी। मगर आज आप जल्दी कैसे आ गए? क्या तीन बजे फिर कोई मीटिंग है?”
“मेरी मीटिंग मेरा हैड-एक है। तुम अपने काम से मतलब रखो। मैं अपना काम निपटाना जानता हूँ।”
“आप खाना खाइए,” अपनी झेंप मिटाने के लिए टंडन मेम साहब फिर हँस दी थीं, “मैं अभी बेबी के पास रहूँगी . . .”
♦ ♦
कुंती की नौकरी के उसी पहले दिन से टंडन मेमसाहब ने बेबी की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ उसे गोल कमरे के विविध काम भी सौंप दिए थे। जिन्हें निरंतर सँभालना-थामना उसके बूते के बाहर रहा था।
अब बेबी का रिबन खुलता अथवा बेबी के खेलने वाले भवन-समूह की कोई दीवार अथवा खिड़की गुम होती, उसकी गुड़िया की फ़्राक या बालों की चमक मलिन पड़ती अथवा उसके हाथों से कोई चीज़ छूट कर गिरती या टूटती तो बेबी उद्वेलित हो कर उपद्रव करती सो करती ही, साथ में टंडन मेमसाहब भी कुंती को डाँटने-डपटने लगतीं थीं। बेतरह।
तिस पर गोल कमरे के सामान को टंडन मेमसाहब की मनभावन दशा में लाने हेतु कुंती उनकी प्रत्येक तरंग, प्रत्येक मौज व प्रत्येक सनक को पूरी करने में अपनी पूरी ताक़त लगा कर ग्रहण करने का प्रयास करती भी, तो भी टंडन मेमसाहब कहीं न कहीं उसकी चूक पकड़ कर अपनी तुनकमिज़ाजी का ताज़ा उदाहरण उसे देना कभी न भूलतीं।
“मैं यहाँ नहीं रहना चाहती,” कुंती अपने बप्पा से कई बार कहती रही थी, “मुझे यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं लगता। मुझे गाँव छोड़ आइए। मैं गाँव में रहूँगी।”
“गाँव में क्या धरा है?” कुंती के बप्पा उसे हर बार डाँट देते थे, “दो-चार साल यहाँ और काम कर लेगी तो तेरे ब्याह का अच्छा जुगाड़ बन जाएगा। इधर साहब लोग कुछ मदद कर देंगे और उधर लड़का भी सही व कमाऊ मिल जाएगा।”
♦ ♦
कुंती का रोग-संचार जबड़े से शुरू हुआ।
ऐसा जकड़ा गया मानो वहाँ कोई ताला पड़ गया था।
मांसपेशियों में जो आकस्मिक जकड़न आ बैठी थी, सो अलग। और साँस थी कि लगता था, अभी उखड़ी कि उखड़ी।
हिम्मत बाँध कर कुंती ने पलंग पर सो रही बेबी को जगाया।
साधारण परिस्थिति रही होती तो बेबी को नींद के आवाह-क्षेत्र से बाहर आने में काफ़ी समय लग जाता, परन्तु जब बेबी ने कुंती के शरीर को तेज़ हिचकोलों से ऐंठते व मुड़ते देखा तो वह तत्क्षण माँ को लिवा लाई।
टंडन मेमसाहब ने आते ही पिछले बरामदे की घंटी दबाई।
घंटी बँगले के सर्वेंट क्वार्टर में सो रहे कुंती के बप्पा को तत्काल जगाने में सक्षम रही।
“इसे अस्पताल ले चलिए,” कुंती की दुर्दशा उसके बप्पा से देखी न गई, “इसे यों काँपते हुए हमने पहले कभी नहीं देखा। इसे कुछ हो गया तो इसकी माँ और बहनें रो-रो कर प्राण दे देंगी . . .”
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए टंडन मेमसाहब पति को वहीं बुलवा लीं।
“यह टेटनस का केस मालूम देता है,” सधे हुए हाथों से कुंती का निरीक्षण करने के बाद वह बोले, “बुखार बहुत तेज़ है और हाथ में अँगूठे के पास एक पंक्चर वूंड है। खरोंच गहरी है और छिलन संगीन। काँटे जैसी कोई नुुकीली चीज़ धँस कर अंदर टूट गई है। बचाने के लिए क्यूरेर व औक्सीजन भी चाहिए। अस्पताल ले जाना होगा . . .”
♦ ♦
अस्पताल में कुंती के पहुँचते ही उसे क्यूरेर का इंजेक्शन दिया गया, जिस ने शैनः-शैनः कुंती की मांसपेशियों की सिकुड़न, ऐंठन व थरथराहट रोक दी। उसीके चलते वेंटिलेटर की पौज़िटिव प्रैशर मशीन उसके फेफड़ों में लगातार हवा भी पहुँचाने लगी और कुंती के हाथ के घाव वाले स्थान पर चीर दिया गया।
चीर के बाद जो टुकड़े एकत्रित हुए वे हरे एनैमल व लोहे के थे।
टुकड़ों को देखकर टंडन मेमसाहब की चिंता बौखलाहट में बदल गई और वह तुरंत घर लौट आईं।
गोल कमरे में हरे एनैमल का सबसे क़ीमती पात्र एक पोर्सिलेन जग का था। फ्रांसिसी क्लौएजौं प्रणाली से बने उस जग पर कछुए के खपड़ों की आकृति के खाँचों पर हरा एनैमल जड़ा था। उसकी विभाजक दीवारें मोड़ कर टांकी गई लोहे की पतली पट्टियों की थीं।
टंडन मेमसाहब ने सब से पहले वही जग टटोला। जग के मूठ वाले भाग की मीनाकारी व टंकाई बराबर न रह कर ऊबड़-खाबड़ थी।
जग की मूठ चिपचिपा रही थी।
चिपकाव ताज़ा था।
कुशल हाथों से टंडन मेमसाहब ने उसे शीघ्र ही निष्प्रभाव कर दिया।
मूठ उनके हाथ में लपक ली।
उन्होंने झुक कर जग के उस फलक को पटका व पिछोरा जहाँ से मूठ पृथक हुई थी। वहाँ की सतह तेज़ रगड़ के कारण हिचर-मिचर गई थी।
शायद उसी को निर्बाध बनाते समय कुंती के हाथ में एनेमल और लोहे के लव-लेश धसक कर बिखरे थे।
टंडन मेमसाहब की दहल उन्हें गोल कमरे के फूलदानों, लैम्पों, जगों, फालों, दीपाधारों व बुतों के पास विषय-क्रम से ले गई।
सभी चीज़ों को टंडन मेमसाहब ने बड़े ध्यान से जाँचा व परखा।
जग के मूठ वाली गंधेली चिपचिपाहट का वितान सब ओर व्याप्त था: कहीं मंद व शिथिल तो कहीं तिक्त व उग्र।
निस्संदेह कुंती का यह वृहदाकार हस्तक्षेप सांयोगिक आपात नहीं था। अपितु आयोजित आक्रमण था।
♦ ♦
“कुछ दिनों के लिए मैं ममा के पास रहूँगी,” प्रकृतिस्थ होकर टंडन मेमसाहब ने पति का फ़ोन मिलाया, “हांगकांग से जीजी ने माँ के यहाँ मेरी आर्ट गैलेरी के लिए कुछ चुनिंदा सामान भेजा है।”
“अभी कुछ दिन रुक जाओ,” टंडन साहब ने कहा, “तुम शहर में नहीं रहोगी तो लोग समझेंगे कुंती के स्वास्थ्य-लाभ में तुम्हारी रुचि ख़त्म हो गई है। कुंती के इलाज में व्यवधान आया तो वह बचेगी नहीं . . .”
“बेेबी के साथ आज निकल लूँगी तो अच्छा रहेगा। संयोग से प्लेेन की दो टिकटें भी डिस्काउंट पर उपलब्ध हैं। और फिर फ़ोन पर आप से कुंती का हाल-चाल तो लेती ही रहूँगी। आप के वहाँ रहते कुंती के इलाज का उपेक्षित रहना असंभव है . . .”
“मगर इधर मेरी व्यस्तता बढ़ने वाली है। स्वास्थ्य मंत्रालय से हमारे अस्पताल का निरीक्षण करने राजधानी से कुछ लोग आ रहे हैं और मुझे तो अपना दम लेने की फ़ुर्सत न मिलेगी . . .”
“मेरा जाना बहुत ज़रूरी है। और मैं जानती हूँ, आप सब सँभाल लेंगे। बहुत अच्छी तरह। पूरी तरह . . .”
टंडन मेमसाहब ने पति से कुंती के छल के विषय में कुछ न कहा। ताव खा कर जो वह कुंती के पिता पर गरजते-बरसते तो गोल कमरे की हज़ारों रुपयों की दुर्दशा-प्राप्त वह सज्जा-सामग्री फिर चाय के दाम भी चलाए न चलायी जा सकती।
♦ ♦
पति से कुंती की मृत्यु की सूचना टंडन मेमसाहब को तीसरे दिन मिली, “उस का शव उसके गाँव ले जाया जाएगा। उस का दाह-संस्कार अपने लोग में वहीं करेंगे . . .”
“यह तो बहुत बुरा हुआ . . .”
“मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया था, तुम्हारा शहर में रहना ज़रूरी था . . .”
“आए एम सौरी। वेरी सौरी . . .”
“कब आओगी?” टंडन साहब पत्नी के खेद-निवेदन से प्रभावित हो कर अपना ग़ुस्सा टाल गए। यों भी उसकी अनुपस्थिति में रसोई चौपट हुई जा रही थी।
“कल आ जाऊँ, स्वीटहार्ट?” टंडन मेमसाहब ने एक चोंचलेबाज़ स्त्री की तरह इश्क़बाज़ी प्रदर्शित की। बेबी के लिए एक घरेलू आया ढूँढ़ने की भी उन्हें जल्दी थी।
स्त्रियोचित माया का उन्हें अच्छा अभ्यास था और स्थिति के अनुकूल उसे पारित करने में वह पारंगत रहीं।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
कहानी
- अकड़-भौं
- अच्छे हाथों में
- अटूट घेरों में
- अदृष्ट
- अरक्षित
- अहेर
- आँख की पुतली
- आँख-मिचौनी
- आख़िरी मील
- आडंबर
- आतिशी शीशा
- आधी रोटी
- आँधी-पानी में
- आपदा
- आब-दाना
- इन गुड फ़ेथ
- ईंधन की कोठरी
- उथल-पुथल
- ऊँची बोली
- ऊँट की करवट
- ऊँट की पीठ
- ऊपर उठी हुई नाक
- एक तवे की रोटी
- कबीर मुक्त द्वार सँकरा . . .
- क़ब्ज़े पर
- कलेजे का टुकड़ा
- कलोल
- कान की ठेंठी
- कार्टून
- काष्ठ प्रकृति
- किशोरीलाल की खाँसी
- कुंजी
- कुंती का खेल
- कुनबेवाला
- कुन्ती बेचारी नहीं
- कृपाकांक्षी
- कृपाकांक्षी—नई निगाह
- क्वार्टर नम्बर तेईस
- खटका
- ख़मीर
- ख़ुराक
- खुली हवा में
- खेमा
- गिर्दागिर्द
- गीदड़-गश्त
- गेम-चेन्जर
- घातिनी
- घुमड़ी
- घोड़ा एक पैर
- चकरी गिरह
- चचेरी
- चम्पा का मोबाइल
- चिकोटी
- चिराग़-गुल
- चिलक
- चीते की सवारी
- छठी
- छल-बल
- जमा-मनफ़ी
- जीवट
- जुगाली
- ज्वार
- झँकवैया
- टाऊनहाल
- टेढ़ा पाहुना
- ठौर-बेठौ
- डाकखाने में
- डॉग शो
- ढलवाँ लोहा
- तक़दीर की खोटी
- तल-घर
- ताई की बुनाई
- तीन-तेरह
- त्रिविध ताप
- दमबाज़
- दर्ज़ी की सूई
- दशरथ
- दुलारा
- दुहाई-तहाई
- दूर-घर
- दूसरा पता
- दूसरे दौर में
- देनदार
- दो मुँह हँसी
- दोहरा लेखा
- नष्टचित्त
- नाट्य नौका
- निगूढ़ी
- निगोड़ी
- नून-तेल
- नौ तेरह बाईस
- पंखा
- परजीवी
- पहुनाई
- पारगमन
- पिछली घास
- पितृशोक
- पुराना पता
- पुरानी तोप
- पुरानी फाँक
- पुराने पन्ने
- पेंच
- पैदल सेना
- प्रबोध
- प्राणांत
- प्रेत-छाया
- फेर बदल
- बग़ावती
- बत्तखें
- बंद इंजन
- बंद घोड़ागाड़ी
- बंधक
- बँधी हुई मुट्ठी
- बसेरा
- बाँकी
- बाजा-बजन्तर
- बापवाली!
- बाबूजी की ज़मीन
- बाल हठ
- बालिश्तिया
- बिगुल
- बिछोह
- बिटर पिल
- बुरा उदाहरण
- बैड फ़ेथ
- भद्र-लोक
- भनक
- भाईबन्द
- भुलावा
- भूख की ताब
- भूत-बाधा
- मंगत पहलवान
- मंत्रणा
- मंथरा
- माँ का उन्माद
- माँ का दमा
- माँ की सिलाई मशीन
- मार्ग-श्रान्त
- मिरगी
- मुमूर्षु
- मुर्दा दिल
- मुलायम चारा
- मुहल्लेदार
- मेंढकी
- रंग मंडप
- रण-नाद
- रम्भा
- रवानगी
- राई-भर मरहम
- रेडियो वाली मेज़
- लमछड़ी
- विजित पोत
- वृक्षराज
- शेष-निःशेष
- सख़्तजान
- सन् 1931 में . . .
- सर्प-पेटी
- सवारी
- सिटकिनी
- सिद्धपुरुष
- सिर माथे
- सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर
- सीटी
- सुनहरा बटुआ
- सुस्त पाँव
- सौ हाथ का कलेजा
- सौग़ात
- स्पर्श रेखाएँ
- हक़दारी
- हम्मिंग बर्ड्ज़
- हिचर-मिचर
- होड़
रचना समीक्षा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं