अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

तू अनंत, तेरी कथा अनंता

 

“नज़र का तीर जिगर में लगे तो अच्छी बात होती है, 
घर की बात घर में ही रहे तो अच्छी बात होती है।”

उस्ताद शायर मरहूम जिगर मुरादाबादी ने जब ये मशहूर शेर कहा था तब उन्हें गुमान भी नहीं हुआ होगा कि भविष्य में यह शेर आशिक़ों और माशुकाओं को कवर फ़ायर देगा। उस दौर में इश्क़ चिट्ठी-पत्री से हुआ करता था। पकड़े जाने पर दोनों पीटे जाते थे, अपनी-अपनी सफ़ाइयाँ देते थे मगर राइटिंग गवाही दे देती थी। सो पकड़े जाते थे। बाद में टेलीफ़ोन आया, जिसकी घंटी इतनी तेज़ बजती थी कि प्रेमी-प्रेमिकाओं को गोपनीयता के लाले पड़ जाते थे।

वक़्त आगे बढ़ा तो मोबाइल आया जो कि नितांत निजी और गोपनीय हुआ करता था। लेकिन इश्क़ कि राह और बेवफ़ाई की डाह से मोबाइल भी महफ़ूज़ नहीं रह पाया। काल रिकार्डिंग, स्क्रीन शॉट जैसे रोड़े इश्क़ की राह में थे। रो-रो कर आशिक़ों ने इश्क़ के हसीं सितम सहे। काल रिकार्डिंग और स्क्रीन शॉट की रुसवाई सही। फिर आया वव्हाट्अप। 
इस कमाल की सर्विस ने ना सिर्फ़ देश-विदेश के इश्क़ की सरहदों की बंदिश को दूर किया, क्योंकि इसमें क़रीब-क़रीब सब कुछ मुफ़्त था बल्कि किसी स्तर पर रिकार्डिंग वाली कोई बात नहीं थी। यानी इश्क़ के लुत्फ़ ही लुत्फ़ और रुसवाई वाली फ़ज़ीहत नदारद। यह सेवा चोरी-छिपे इश्क़ करने वालों को वरदान बन कर आयी।

वैसे तो व्हाट्सअप चलाते सब हैं पर तनिक इसकी महिमामंडन का भी मुजायरा कर लेते हैं।

सुप्रसिद्ध हरि भजन की एक लाइन है:

“हरि अनंत, हरि कथा अनन्ता।”

व्हाट्सअप का भी ना कोई आदि है और ना ही अंत है। अर्थात्‌ व्हाट्स अप पर कोई मैसेज या सूचना कहाँ से जन्मी है और उस मैसेज की फ़ॉर्वर्डिंग का अंत कब होगा यह कोई नहीं बता सकता है। यानी कि कोई बालक अगर कुंभ के इस मेले में गुम हो गया तो हो सकता उसकी फोटो और हुलिया वाला मैसेज अगले 12 वर्ष तक फ़ॉरवर्ड होता रहे और अगले कुंभ मेले तक वह बालक बाल-बच्चेदार हो जाये।

यानी व्हाट्सअप एक ऐसा महाकुंभ है जिसका शुरूआत और अंत नहीं है, ऐसे संदेशों के प्रसारकर्ता और फ़ॉरवर्ड किए गए ज्ञान से भरे हुए कुंड वाला व्हाट्अप का ब्रह्मांड सर्वथा नमन के योग्य है।

पुराने ज़माने में किसी के ज्ञान के आकलन हेतु शास्त्रार्थ आदि का सहारा लिया जाता था तब उसे विद्वान या अल्पज्ञानी घोषित किया जाता था लेकिन अब व्हाट्सअप एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जो ज्ञान मापने के काम आती है। मगर अपना नहीं बल्कि सामने वाले का। व्हाट्सअप चलाने वाला बड़ी आसानी से दूसरे के बारे में सर्टिफ़िकेट जारी कर देता है कि “तुम व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के पढ़े–लिखे हो।” व्हाट्स अप विश्वविद्यालय के कुलपति और जगत के आदि संदेशदाता, हाथ में वीणा लिए तथा निरंतर जानकारी की बौछार करने वाले आभासी जगत के नारद मुनि सर्वथा नमन के योग्य हैं।

वव्हाट्अप सिर्फ़ उधार के ज्ञान का भंडार ही नहीं है अपितु उदारता एवं समानता का झंडाबरदार भी है। यहाँ पर आपको प्रेमचंद के नाम की ऐसी कविताएँ मिल जायेंगी जो उन्होंने कभी लिखी ही नहीं। व्हाट्सअप पर हर शेर ग़ालिब का ही होता है भले ही वह तुकबंदी किसी ट्रक के पीछे लिखी इबारत से टीप कर चेप दी गयी हो।

व्हाट्सअप सदा कट-पेस्ट और फ़ॉरवर्ड के रास्ते पर चलता है इसमें जो “सामने आया वही परम सत्य है” ही माना जाता है। सबसे पहले मैसेज फ़ॉरवर्ड करने वाला ही विजेता मान लिया जाता है। स्कूल–कालेज का कभी भी मुँह ना देखने वाले और व्हाट्सअप पर ही पढ़े ग्रंथों का सार जानने वाला व्हाट्स अप सेवी सर्वथा नमन के योग्य है।

अब तो “पाताल लोक” वेब सीरीज़ में इंस्पेक्टर हाथी राम चौधरी, पत्रकार को धर्मराज युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा का वर्णन करने के बाद टीवी के एंकर से कहता है कि “वैसे तो यह सब शास्त्रों में लिखा है लेकिन मैंने इसे व्हाट्सअप पर पढ़ा था।”

यहाँ न ग्रंथ की ज़रूरत है, न परीक्षा, न समय और न प्रमाण। केवल ‘फ़ॉरवर्ड’ करने से ही यहाँ विद्वान की पदवी सहज ही प्राप्त हो जाया करती है।

व्हाट्सअप सेवी को अपनी व्हाट्स अप की सूचना पर इतना मान होता है कि हर सूचना को पहले वह अपनी ‘एक्सक्लूसिव’ कह कर दावा करता है। उसकी सूचना या वक्तव्य पर अगर कोई उँगली उठाये तो ‘मेरा मित्र इसका विषय विशेषज्ञ है’ ऐसा कहकर अपनी बात का बचाव करता है। यदि कहीं उसके तथ्य झुठला दिये जाएँ तो ‘मुझे भी ये मैसेज व्हाट्सअप पर मिला था, मैंने तो सिर्फ़ फ़ॉरवर्ड किया था’ ये कहते हुए पल्ला झाड़ लेता है। यानी वाह-वाही मिले तो सब कुछ अपना और अगर झूठ पकड़े जाने पर आलोचना हो तो “सानू की।”

ये तो वही मिसाल हो गयी कि:

“चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा मेरे बाप का।”

व्हाट्सअप का मैसेज “वन स्टॉप शाप” जैसा होता है जहाँ पर एक ही लेख में आपको लोक-परलोक सबके बारे में जानकारी मिल जाती है जहाँ पर बात शुरू तो शेयर बाज़ार के नुस्ख़े से होती है और अंत शिव पुराण के अध्यात्म से होती है।

धर्म का मर्म भी व्हाट्सप् बख़ूबी सिखाता है कि जीवन क्षणभंगुर है अर्थात्‌ जिनसे रात-रात भर बात करके मुदित होता है वह किसी भी पल ब्लॉक करके जा सकता है। और ख़ास बात यह है कि अब ब्लू टिक के देखे जाने को परम सत्य नहीं माना जा सकता। हो सकता है ब्लू टिक ना आये और मैसेज देख लिया गया हो, यही है व्हाट्सअप के इस मायावी संसार की माया।

व्हाट्सअप की आभासी एवं मायावी दुनिया का मर्म एवं सार ये है कि यहाँ पर पढ़ा हुआ सदैव सत्य नहीं होता और सदैव झूठ भी नहीं होता। यानी यहाँ का मामला फ़िफ़्टी–फ़िफ़्टी टाइप ही होता है। यहाँ देखा हुआ सब प्रमाणिक नहीं होता है। जो विवेक का दीपक जलाए रखता है, सदैव तटस्थ, मौन एवं संतुलित रहता है। वही सही मार्ग देख पाता है। 
व्हाट्सअप के मायावी संसार में अनुभवी सेवियों को म्यूट करने की शक्ति प्राप्त होती है और आर्काइव करने का ज्ञान मिलता है। ब्लू टिक का भय उसे नहीं रहता, वह मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। ग़ालिबन लब्बोलुबाब यह कि जो व्हाट्सअप के मायावी मोह भरी दुनिया में जो फ़ॉरवर्ड, कट–पेस्ट के मोहरूपी दोष से मुक्त हो जाता है और ‘शेयर करो’ को त्याग देता है, वह होशियार कहलाता है और उसको ही चित्त की शान्ति प्राप्त होती है।

एक व्हाट्सअप का निःस्वार्थ सेवी व्हाट्सअप का महिमामंडन करते हुए उसे संबोधित करते हुए गा रहा है:

“तू अनंत, तेरी कथा अनंता।” 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

कविता

कहानी

स्मृति लेख

लघुकथा

बाल साहित्य कविता

सिनेमा चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं