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योर सिक्स, माई नाइन

 

तब के अभिनेता और अब के साबुन–मंजन के सबसे बड़े विक्रय प्रतिनिधि अमिताभ बच्चन की बहुत साल पहले एक फ़िल्म आई थी। जिसका नाम था ‘सुहाग’। इस फ़िल्म का लंबू हीरो अपनी कोल्हापुरी चप्पल सामने वाले को चप्पल उल्टी दिखाता है और फिर पूछता है कि “ये चप्पल कितने नंबर की है?” सामने वाला उल्टी चप्पल को देखकर कहता है कि 6 नम्बर की है। यह सुनते ही फ़िल्मी नायक चप्पल को सीधा करके दिखाता है और कहता है कि चप्पल 6 नहीं बल्कि 9 नम्बर की है। यह कहते हुए नायक सामने वाले को चप्पल के नम्बरों के खेल में बेवुक़ूफ़ बनाते हुए उसे चप्पलों से पीटने लगता है। यानी किसी का सिक्स किसी का नाइन भी हो सकता है।

यही हाल भारत में हाल ही में हुए एआई समिट में हुआ। दुनिया भर की निगाहें इस समिट पर लगी हुई थीं। और इस समिट में भारतीय घरों में बोली जाने वाली कुछ कहावतें चरितार्थ हो गयीं। जिसमें पहली बात तो ये थी कि “नक़ल के लिए भी अक़्ल” होनी चाहिए। क्योंकि समिट में “ओरियन” नामक जिस कृतिम मेधा वाले डॉग को एक निजी यूनिवर्सिटी की प्रतिनिधि ने अपने संस्थान का “प्रोडक्ट” बता कर हवा-हवाई दावे कर रही थीं उस पर तब भी चीन की कंपनी का लेबल लगा हुआ था जिसे मैडम शायद हटाना भूल गयी थीं।

इसी बात पर थुक्का-फजीहत शुरू हुई। विवाद बढ़ा तो उस पे चीन वालों की नज़र पड़ गई। चीन की कंपनियाँ इस बात से बहुत नाराज़ हो गईं कि दुनिया भर की कंपनियों से थीम चुराकर और उसकी नये सिरे से पैकेजिंग करके दुनिया को अपना प्रोडक्ट बता कर बेच देते हैं चीनी लोग। इसीलिए चीनी माल पर गारंटी की कोई अवधि नहीं होती क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं पता होता। काहे कि दूसरे के बनाये माल को अपना बताकर बेचेंगे तो उन्हें कैसे पता होगा कि ये माल कब तक चलेगा? इसीलिए चायनीज़ माल के बारे में कहा जाता है कि “चल गया तो चाँद तक, नहीं तो फिर शाम तक।” सो दूसरों के माल को अपना बना कर बेचने वाले चाइना के लोगों को जब पता लगा कि भारत में हो रही एआई समिट में उनके माल को किसीने अपना विकसित प्रोडक्ट कहा है तो उन्होंने आसमां सर पे उठा लिया। क्योंकि ये तो “चोर पे मोर” नामक कहावत चरितार्थ हो गयी। अब जिस निजी यूनिवर्सिटी ने यह किया था उसे “बड़े बेआबरू” करके भारत मंडपम से निकाला गया बिजली काट कर। लोग तो इंटरनेट पर यहाँ तक कहते हैं कि इस संस्थान में बच्चों को पढ़ाने पर माता-पिता के कपड़े तक बिक सकते हैं क्योंकि इतना ज़्यादा फ़ीस चार्ज करते हैं।

350 करोड़ एआई में इंवेस्ट करने का दावा करने वाली यूनिवर्सिटी डेढ़-दो लाख के चीनी रोबोट कुत्ते को अपना बता रही है उसके बारे में कुछ मुख़्तलिफ़ मालूमात हैं। उस देश में जहाँ के 97 परसेंट परिवारों की लोगों की मासिक आय पचास हज़ार रुपये से कम है। तो इससे सुंदर और सस्ती यूनिवर्सिटी तो इस देश में नहीं हो सकती।

काहे कि ये मात्र 1,64,000 में इंजीनियर बना रहे हैं।

बस 20,000 परीक्षा फ़ीस और देनी पड़ती है।

और सावधानी शुल्क के नाम पर 20,000 रुपये भी लेते हैं, चिंता मत करें ख़ाली वनटाइम में देना है।

और आईकार्ड के 1000 रुपये भी देने हैं।

और अगर हॉस्टल में रह रहे हो तो 1,71,000 अलग से देने हैं। सनद रहे कि ये सबसे बेसिक दर्जे का चार्ज है। अच्छी सुविधा के अच्छे चार्ज देने होंगे।

एक कैम्पस से दूसरे कैंपस तक जाने के लिए बस की सेवा उपलब्ध है पर ज़्यादा नहीं उसके सिर्फ़ दस हज़ार रुपये अलग से देने पड़ते हैं। 

और ये सब एक साल का है जबकि इंजीनियरिंग के लिए आपको 4 साल लगने हैं। यानी आपको फ़ीस देने के समय सिर्फ़ सिक्स के आकार की फ़ीस बतायी जायेगी मगर एक बार यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के बाद आपको फ़ीस नाइन के आकर देनी पड़ेगी।

यानी अब यूनिवर्सिटी का ध्येय वाक्य “योर सिक्स कैन बी माई नाइन” लोगों को समझ में आया कि क्या कहते हैं और क्या देना है? 

यानी मात्र 14 लाख 65 हज़ार 600 रुपये की इनवेस्टमेंट और आपका होनहार बच्चा यूनिवर्सिटी के शानदार कैंपस में 2 लाख के चीनी कुत्ते के साथ खेलने का मौक़ा पा सकता है! है ना ये दिलफ़रेब ऑफ़र? 

ज्ञात हो कि हॉस्टल फ़ीस में मेस का भोजन के साथ-साथ जिम, स्क्वाश, फ़ुटबॉल, टेबल-टेनिस, लूडो, गिल्ली-डंडा, कंचे, छुपनछुपाई, पुगमपुगाई, फूसबॉल, बास्केट बॉल, रोबोट की बॉल आदि खेलने की सुविधायें भी उपलब्ध हैं।

इसके सालाना जलसे में फ़िल्म स्टार और यूटूबर आते हैं अब बोलो! अब तो लोगे ना एडमिशन!

इतना ही नहीं और सुनो . . . संस्थान हर बच्चे को 100% जॉब प्लेसमेंट दे रहा है। अब भी मन नहीं माना हो तो बता दूँ कि प्लेसमेंट होगा ज़रूर भले ही आपको बीटेक करके आपको कैफ़े कॉफ़ीडे में नौकरी दिला दें पर प्लेसमेंट की पक्की गारंटी है।

कैम्पस में फ़िल्म प्रमोशन भी किया जाता है, अक्षय कुमार, रणबीर कपूर और इमरान हाशमी भी संस्थान में आकर ठुमके मारकर गए हैं। मल्लब आगे चलकर बच्चा फ़िल्मों में जाना चाहे, तो यहाँ से रास्ते खुल सकते हैं।

कितनी अच्छी बात है कि 50-60% मार्क्स पर भी टॉप के कोर्स में एडमिशन दे रहे हैं? बताइये इतनी दयालु यूनिवर्सिटी मिलेगी कहीं?

अब तो कभी-कभार ऐसा लगता है कि स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर के टाइगर, आलिया और वरुण भी इसी यूनिवर्सिटी से पास आउट हुए होंगे।

इतनी सब इंक्वारी के बाद जब सोशल मीडिया पर निजी यूनिवर्सिटी की लानत-मलानत क़ायदे से हुई तब निजी यूनिवर्सिटी की तरफ़ से एक चुटीली तंज भरी पोस्ट की गई है कि:
“एक बार एक आदमी मुझे अंबुजा सीमेंट की कमियाँ बता रहा था, बाद में पता चला कि वो बांगर सीमेंट का दलाल है। जो इस संस्थान की बुराई करते नहीं थक रहे हैं, देखना पक्का वो लोग एक कमरे वाली यूनिवर्सिटी के डिप्लोमा-धारी निकलेंगे”।

यह पढ़कर निजी यूनिवर्सिटी के समर्थक एक तुकबंद प्रेमी कवि ने फ़ेसबुक पर यूनिवर्सिटी के समर्थन में एक कविता पोस्ट की है:

“हावर्ड के बच्चे सुधारे ये संस्थान, 
ऑक्सफ़ोर्ड को भी पछाड़े संस्थान, 
डीयू-जेएनयू में हो सकता है भेदभाव, 
मगर सबको अपना बना ले ये संस्थान।”

जिस-जिस के खाते में 15 लाख आ चुके हैं, कम से कम वो लोग तो कंजूसी न करें, आज ही 14 लाख 65 हज़ार देकर अपने या अपने बच्चों की इस नामी संस्थान में सीट कन्फ़र्म करें।

नेपथ्य में कोई “बिगबास” का पुराना एपीसोड देख रहा है जिसमें आवाज़ आ रही है “त्वाडा कुत्ता टामी, साडा कुत्ता, कुत्ता”। 

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