अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

वंश

 

सरकारी अस्पताल के बरामदे में क़रीब साठ-पैंसठ साल की एक बुढ़िया बड़ी ही बेचैनी से टहल रही थी, पर उसका सारा ध्यान प्रसव गृह के दरवाज़े की तरफ़ ही था। भीतर से जब भी प्रसूता की चीख़ सुनाई देती तो वह बुढ़िया बड़बड़ाने लगती। 

तभी प्रसव गृह का दरवाज़ा खुला। एक नर्स बाहर आई। मुस्कुराते हुए बोली, “दादी जी बधाई हो, लड़की हुई है।”

“लड़की हुई है” . . .कहते हुए बुढ़िया का चेहरा उतर गया। बुढ़िया पास में पड़ी बेंच पर बैठ गई। तभी उसका लड़का आ गया, जो बाज़ार गया था, कुछ ज़रूरी सामान लेने। 

अपनी माँ को मायूस बैठा देख वह समझ गया कि इस बार भी लड़की हुई है। तभी बुढ़िया बुदबुदायी, “बेटा इस बार भी वंश आगे न बढ़ पाया। यह चौथी कलमुँही पैदा हो गई . . .” 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अकथित दर्द
|

दोपहर प्रिया जब कॉलेज से घर आयी तो ननद सास…

अकेलेपन का बोझ
|

“हैलो मेनका! बिज़ी तो नहीं? कहीं मैं…

अगर तुम मिल जाओ 
|

अख़बार में छपा यह समाचार हृदय विदाकर था।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

कविता

नज़्म

बाल साहित्य कविता

किशोर साहित्य कविता

हास्य-व्यंग्य कविता

कविता - हाइकु

चिन्तन

काम की बात

यात्रा वृत्तांत

ऐतिहासिक

कविता-मुक्तक

सांस्कृतिक आलेख

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं