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दायरे शक के रहा बस आइना इन दिनों

2122   2122   2122   12 
 
दायरे शक के रहा बस आइना इन दिनों
टूट के बिखरा हुआ है चेहरा इन दिनों 
 
गिनतियों अच्छे उसूल मिले मुझे बारहा 
यों बुरी संगत हुआ है ये बुरा इन दिनों
 
टहलने से फूलती है अब ज़रा साँस भी 
बंद मीलों चलन की है परंपरा इन दिनों
 
कोशिशें की ठहरे पानी देख लूँ मैं तुझे
अक्स तेरा कुछ बना बहुत गहरा इन दिनों
 
हैं नदारद वे हिरण आस्था के मेरे कहीं
बेज़ुबां वो ख़ौफ़ की साज़िश मरा इन दिनों
 
हम रगों में हाथ दुखती क्या तेरे रख दिए 
हो गया फिर क्या पुराना घाव हरा इन दिनों
 
तू बहुत चुप सा अकेला है 'सुशील' आज कल 
बात क्या है बोल किससे तू डरा इन दिनों

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