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भीतर ज़हर . . .

 

कहीं तो धब्बे दाग निकालो
इस बसंत में आग निकालो 
 
जो अपनी मनमानी करते
उनकी अकड़ झाग निकालो
 
बेसुर होकर ढोल न पीटो
मधुर सुरों के राग निकालो
 
सोने को तमाम उम्र पड़ी है
अपना हिस्सा जाग निकालो
 
भीतर ज़हर कुछ काम न देगा
बेहतर बाहर नाग निकालो

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