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सुशील यादव – दोहे – 003 

1.
तिनका-तिनका तोड़ के, जिसको रखता आज। 
कहीं अकड़ में बस्तियाँ, कहीं फिजूल समाज॥ 
2.
रंज तुझे है फूल से, ख़ुशबू से परहेज़ 
बेटी तुमको ब्याहना, देकर दान-दहेज़॥ 
3.
तेरा कहीं श्मशान है, तेरा ही बैराग। 
जहाँ लगाना बाग़ है, वहीं लगाते आग॥ 
4.
देख जुलाहा हाथ की, तिरछी-खड़ी लकीर॥ 
नफ़रत से तुम क्यों बुने, जंग लगी तक़दीर। 
5.
देशद्रोह के जुर्म का, है अब लगना आम॥ 
उनकी चलती देश में, जिनके हाथ लगाम। 
6.
नदिया सूखी यूँ मिली, तैरा नहीं जहाज़। 
मन के भीतर झाँक ले, ठहरा-ठहरा आज॥ 
7.
पता भूलकर डाकिया, मन ही मन पछताय। 
चिट्ठी पता लिखे बिना, निश-दिन कौन पठाय॥ 
8.
पसरी केवल सादगी, छूट गया सब मोह। 
इस जंगल के रास्ते, उस घाटी तक खोह॥ 
9.
पिघले पत्थर दिल कभी, करना हमको याद। 
जुदा हुए कब भूलते, अपनेपन का स्वाद ॥ 
10.
भव-सागर की सोचते, करने अब की पार। 
चुकता करते चल रहे, गिन-गिन क़र्ज़-उधार॥ 
11.
भाँडा सब का फूटता, समझो देर-सबेर। 
क़ुदरत के इन्साफ़ में, हुआ नहीं अँधेर॥
12.
मन भँवरा मँडरा रहा, तुझे समझ के फूल। 
यही अक़्ल की ख़ामियाँ, बचपन मानो भूल॥ 
13.
मर्ज़ वही है जानता, पर है नीम-हकीम। 
हल्के-फुल्के रोग में, नुस्ख़ा लिखता नीम॥ 
14.
माथे को वो पीटता, करता रहा मलाल 
देने वाला देखता, छप्पर है किस हाल 
15.
मिल जाये गर राह में, साधू-संत-फ़क़ीर। 
चरण धूलि माथे लगा, माँगो ज्ञान-अबीर॥ 
16.
प्रभु जी तेरे राज में, दीन-दुखी हैं लोग। 
अच्छे दिन बुख़ार चढ़े, बुरे दिनों के रोग॥ 
17.
आकर देखो तुम कभी, गति कितनी विकराल। 
यथा-शीघ्र ख़ाली करो, जीम-बाद पंडाल॥ 
18.
ले जाओ फिर छीन के, सुख सुविधा सार। 
हम शापित हैं लोग वो, चलते पथ अंगार॥ 
19.
वनवासी चौदह बरस,  भटके थे श्री राम।    
चौदह दिन गृहवास तुम, माँग रहे आराम ॥    
20.
समझौतों के बीच में, कूद रहा ये कौन।    
आपस का है मामला, अब की रह लो मौन॥  

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