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जहाँ में आग है लगी, धुआँ बना ग़ुबार है

 

हज़ज मुसम्मन मक़बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
 
1212    1212    1212    1212
 
जहाँ में आग है लगी, धुआँ बना ग़ुबार है
तमाम ख़्वाहिशें मिरी लो आज दर किनार है
 
मिरी तलाश एक हम-सफर की बस दबी रही
मिरे ही आईने का टूटना तो बार-बार है
 
वो तल्ख़ बात पर यक़ीन रख रहा है अब तलक
मिरी गुजारिशों चमकता उसका कार-बार है
 
है वक़्त बे-र'हम न जाने कितने दिल को तोड़ता
कहीं बना मिसाल है, कहीं पे यादगार है
 
शजर ये सूखने लगे, बिना ही देख भाल के
मगर वहीं है चाँदनी, जहाँ नज़र बहार है
 
ये आदमी वो आदमी ये ज़िन्दगी वो ज़िन्दगी
दिशा-दिशा में शोर है, ये क़ौम होशियार है
 
है नींद में जो आदमी उसे जगा सको अगर
ये लोक तंत्र नींव है, ये पीढ़ियों क़रार है 

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