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ख़ास मौसम का बुलावा हमें आया होता

 

रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मक़तू
फ़ाएलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
 
2122    1122    1122    22
 
ख़ास मौसम का बुलावा हमें आया होता
और तक़दीर को झूले में झुलाया होता
 
कोई पहचान लिए हम भी किसी दिल रहते
काश महफ़िल भरी दिल अपना गँवाया होता
 
हम भी छूना किसी मंज़िल की हदों को चाहें
एक सरहद मिरी पहचान बनाया होता
 
कोई तमन्ना कभी पूरी भी हमारी होती
कुछ घरौंदा सा बना रोज़ मिटाया होता
 
चोरों की तरह कहीं दिल में जग़ह कर लेते
लाख तालों में तू ने उसको छुपाया होता
 
हम ग़लतियों में ही तुमको कहीं ढूँढ़ा करते
पाठ सादा कोई सीधा भी पढ़ाया होता

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