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वो परिंदे कहाँ गए

(घनाक्षरी)

'पर' जिनके कटे थे, वो परिंदे कहाँ गए
हाँ, सीधे सादे गाँव के, बाशिंदे कहाँ गए

ज़मीन खा गई उसे, कि निगला आसमान
निगरानी शुदा थे वो, दरिन्दे कहाँ गए

हाँ यही है वो जगह, कल्पना का लोक था
सब चीज़ें मिल रही, घरौंदे कहाँ गये

मज़हब की ज़मीनों में, ये बारूद और धुँआ
ढेर लगी लाशो फिर, ज़िन्दे कहाँ गये

तेरे होने का सुकून, रहता कहीं भीतर
सर रखे जहाँ रोते, वो कंधे कहाँ गए

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