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गुंडे कहीं के

 

शरदनाथ खरे साहब ने ऑफ़िस के बाहर निकलते ही बाहर भीड़, हल्ला और हुड़दंग देखा। उनका मन यह सब देखकर कड़वाहट से भर गया। सुबह से ही उनका मन ख़राब था। वह घर से तो समय से निकले थे मगर रास्ते में नवरात्रि का पहला दिन होने के कारण सड़क पर वह एक धार्मिक जुलूस के जाम में फँस गए। ऑफ़िस देर से पहुँचे तो उन्होंने पाया कि उनके सीनियर अफ़सर उनके समय पर ऑफ़िस ना पहुँच पाने पर नाख़ुशी ज़ाहिर कर चुके हैं बस तभी से उनका मन ख़राब था। अब फिर कोई हुड़दंग देखकर उनका मन कसैला हो गया। फिर उनकी गाड़ी जाम में फँस गई।

उन्होंने झल्लाते हुए अपने ड्राइवर को भेजा कि मसले का पता लगाएँ और वैकल्पिक रास्ते का भी।

उनका ड्राइवर कुछ बता पाता तब तक उन्होंने देखा कि मेन रोड पर खुलती गली के एक होटल से मुँह ढँके एक लड़की और एक लड़के को संस्कृति रक्षा दल के लड़के बाहर ला रहे थे।

वे लड़के लड़की को तो चुपचाप पकड़े हुए लेकर आ रहे रहे थे पर लड़के की अच्छी-ख़ासी पिटाई कर रहे थे।

संस्कृति रक्षा दल के लोग चिल्लाते हुए कह रहे थे कि था कि यह ग़ैर मज़हबी लड़का इस हिंदू लड़की के साथ रंगरलियाँ मना रहा था।

“जबसे यह सरकार आयी है तब से ये सड़कछाप लोग तमाशा ही करते रहते हैं। इन्हें काम–धंधा तो कुछ करना नहीं रहता। सिर्फ़ लॉ एंड ऑर्डर डिस्टर्ब करते रहते हैं। ये रास्कलस, गुंडे कहीं के, बड़े आये रक्षा दल वाले रक्षा करने। नालायक़, निकम्मे, बेरोज़गार सब के सब,” ऐसा ही कुछ कहते हुए और अनगिनत गालियाँ संस्कृति रक्षा दल वालों को बकते हुए वह घर आ गए।

झुँझलाते और झल्लाते हुए उन्होंने टीवी खोला। टीवी पर भी वही दृश्य था। उन्होंने फिर कोई गंदी सी गाली बकी।

मिस्टर खरे बड़बड़ा उठे, “इस देश में कांस्टिट्यूशन का नहीं, बल्कि इन अनपढ़-जाहिल रक्षा दल वाले गुंडों का राज चलेगा। पुलिस–कोर्ट का नहीं बल्कि इन लफ़ंगों का सिस्टम चलेगा क्या? लड़की अपनी मर्ज़ी से किसी भी धर्म के लड़के के साथ जाती है तो इन जाहिलों के पेट में क्यों मरोड़ उठ रही है। कांस्टिट्यूशन उन्हें एलाउ कर रहा है तो इसमें मज़हब बीच में कहाँ से आ गया?”

“काहे ख़ून जला रहे हैं अपना जब से आये हैं तब से? लीजिए, ठंडी लस्सी पीजिये और अपना दिमाग़ थोड़ा ठंडा रखिये,” उनकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“तुम कुछ नहीं समझती। असल बात यह हैं कि . . .” तभी कॉलबेल बजी।

उनकी पत्नी ने दरवाज़ा खोला। किसी से कुछ बातचीत की। कुछ देर बाद वहीं से आवाज़ लगायी, “कुछ लड़के हैं, देखिये आपसे ही कुछ बात करना चाह रहे हैं।”

उसी अवस्था में झल्लाते हुए मिस्टर खरे बाहर आये। उन लड़कों के झुंड को देखते ही उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गए।

ये उन्हीं लड़कों का पूरा झुंड था जो उन्होंने कुछ देर पहले सड़क पर देखा था। सभी लड़के भगवा गमछा गले में डाले थे।

“क्यों आये हो? कोई चंदा–वंदा नहीं मिलेगा भंडारे–वंडारे का। तुम लोग वही हो ना। जो अभी उस बेचारे ग़ैर मज़हबी लड़के को मार-पीट रहे थे। अब भंडारे के नाम पर धन उगाही करने आये हो क्या? एक फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे। मुझसे गुंडई नहीं चलेगी। मैं पुलिस बुला लूँगा। मुझसे ज़बरदस्ती चलेगी नहीं,” ग़ुस्से से चीखते हुए मिस्टर खरे ने कहा।

उनमें से एक लम्बे क़द के लड़के ने आगे आते हुए कहा, “शांत रहिये अंकल जी, हम यहाँ आपसे कुछ लेने नहीं आँये हैं बस आपको कुछ लौटाने आये हैं। ऊँचा-ऊँचा नहीं बोलो अकंल जी। घर की बात घर में ही रहे तो बेहतर है।”

मिस्टर खरे थोड़ा हैरान हुए और सकपकाए भी। उन्हें अजीब लगा कि इन सड़कछाप लड़कों से उनके कौन-सी घर की बात का कनेक्शन हो सकता है। वह कुछ समझ पाते तब तक उन लड़कों का झुंड एक तरफ़ हट गया और एक लड़की घर के अन्दर चली गयी। उस लड़की का चेहरा भी उसी रंग के गमछे से ढँका हुआ था जैसे गमछे बाक़ी लड़कों ने पहन रखे थे। जो लड़की घर के अन्दर गयी थी वह मिस्टर खरे की युवा बेटी अवंतिका उर्फ़ एंजेल थीं जो बाराहवीं क्लास में पढ़ती थी।

उन लड़कों के झुंड का मुखिया लड़का धीरे से बोला, “ओ अंकलजी, हमने सिस्टर को कुछ नहीं होने दिया। पुलिस-वुलिस का भी कोई झंझट नहीं होने दिया है। चेहरा भी किसी को नहीं देखने दिया किसी को। बच-बचाकर लाये हैं सिस्टर को, ताकि बदनामी ना हो और घर की बात घर में ही रहे। वैसे ही मीडिया में इस ख़बर का हल्ला मचा हुआ है। आपकी बेटी होटल में एक ग़ैर मज़हबी बदमाश आदमी के साथ थी। वह पहले भी कई लड़कियों को ख़राब कर चुका है अपने प्रेम जाल में फँसा कर। वो शादीशुदा आदमी है और शातिर है। ऐसे ही अच्छे घरों की भोली-भाली लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फँसाता है और उनकी ज़िंदगी ख़राब कर देता है। उस बदमाश आदमी पर काफ़ी दिनों से हमारी नज़र थी। आज हमने उसे रंगे हाथ पकड़ा और उसका क़ायदे से इलाज कर दिया। आपकी बेटी सेफ़ है उसे कुछ नहीं हुआ। थोड़ा ख़्याल रखा कीजिये कि आपकी बेटियाँ कहाँ जाती हैं किससे मिलती हैं। हमारा जो काम था वो हमने कर दिया और आगे भी करते रहेंगे। आप हमें गुंडा समझते हैं तो कोई बात नहीं पर हम यह सब करते रहेंगे। चलते हैं अंकल जी। राम-राम,” यह कहकर अभिवादन करते हुए वो सब लड़के चले गए।

मिस्टर खरे घर के अन्दर आ गए। उन्होंने दरवाज़ा बंद कर लिया। टीवी पर अब भी वही ख़बरें आ रही थीं कि “संस्कृति रक्षा दल वालों की गुंडई चरम पर पहुँच चुकी है। इन गुंडों ने एक ग़ैर मज़हब के निर्दोष व्यक्ति को मार-मार के अधमरा कर दिया।”

मिस्टर खरे टीवी देख तो रहे थे मगर उन्हें अब इन ख़बरों पर ग़ुस्सा नहीं आ रहा था। 

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