प्रेम धरो
कथा साहित्य | कहानी दीपक शर्मा1 Sep 2026 (अंक: 301, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
वाराणसी से कोई मिलने आया? अपने अभिवादन के साथ ही उषा पिता से पूछ बैठी। बल्लियों उछल रहे अपने दिल को और सँभालना उसके लिए कठिन था।
“पहले कहीं एकांत में बैठ न लें?” बेटी के भावतरंग से निहाल चंद अछूते रहे। यों भी वैयक्तिक भावप्रवणता को सार्वजनिक बनाने से वह कतराते थे।
“चलिए, सामने वाले लॉन की किसी ख़ाली बैंच पर बैठ लेते हैं,” उषा इधर बेगाने इस शहर में अपनी एम.डी. के अंतर्गत इस के पी.जी. अस्पताल के एनेटमी-शरीर-रचना विज्ञान विभाग से सम्बद्ध थी। वाराणसी शहर से आए अशोक की भाँति। उसी विभाग में अशोक की सम्बद्धता उन्हें एक-दूसरे के निकट ले आई थी और अब वे शीघ्र ही विवाह-सूत्र में बँध जाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से अशोक ने वाराणसी-निवासी अपने पिता को उषा के कस्बापुर उसके पिता के पास अभी पिछले ही दिन भिजवाया था और उषा को विश्वास था कि दोनों अभिभावकों ने मिलकर उन के विवाह की तिथि निश्चित कर ली थी।
फरवरी की गुनगुनी धूप में नहा रही एक ख़ाली बैंच पर निहाल चंद बेटी की बग़ल में अपना स्थान ग्रहण करते ही बोले, “कल अशोक के पिता हमारे घर आए थे . . .”
इन पिछले दो वर्षों के दौरान वह अशोक से कई बार मिल चुके थे। बेटी से मिलने वह किसी भी महीने के पहले अथवा दूसरे रविवार इधर आया करते और उसके संग दो-तीन घंटे बिता लेने के बाद उसी दिन लौट भी लेते। कस्बापुर यहाँ से बहुत दूर नहीं था। सुबह पाँच-बीस की पहली बस पकड़ते तो दस बजे यहाँ। फिर एक-बीस की बस उन्हें संध्या होते ही वापस कस्बापुर पहुँचा दिया करती।
“घर पर?” उषा घबरा गई, “मगर मैंने तो उन्हें आपके कॉलेज का पता दिया था।”
अपने परिचितों को अपने घर उषा कभी नहीं ले जाना चाहती। प्रारंभिक वर्षों में शय्या-ग्रस्त अपनी माँ की बीमारी के कारण और उन की मृत्यु के बाद उचित गृह-प्रबंध के अभाव के कारण। अपने गाँव की जिस बूढ़ी बुआ को उसके पिता ने घरदारी का ज़िम्मा सौंप रखा था, उसे आधुनिक रख-रखाव का क-ख-ग भी नहीं मालूम था।
“हाँ। घर पर आए और पंजे मार कर चले गए।”
“कैसे पंजे?” उषा को कँपकँपी छिड़ गई।
“घर में घुसते ही चिल्लाने लगे, भई आप तो बहुत लापरवाह क़िस्म के आदमी हो। बेटी ब्याहने जा रहे हो और देख नहीं रहे, तुम्हारा गेट मरम्मत माँग रहा है। दीवारें पुताई माँग रही हैं और दरवाज़े-खिड़कियाँ रोगन . . .”
“ऐसा कहा उन्होंने?” उषा का दिल बैठने लगा।
यह सच था। पुरानी वास्तुकला और दिनातीत संरचना लिए साठ साल पुराना वह मकान मरम्मत ही नहीं माँगता था। नवीकरण भी माँगता था। छब्बीस साल पहले माँ जब वहाँ ब्याह कर आयीं थीं तो उन्होंने ज़रूर उस की रसोई, स्नानघर व शौचालय का आधुनिकीकरण करवाया था किन्तु वह सब निम्निष्ठ स्तर पर ही हो पाया था और फिर वहीं रुक भी गया। शीघ्र ही। कैंसर से उनके घिर जाने के कारण। परिणामस्वरूप घर का प्रगामी काम हमेशा के लिए पिछेल दिया गया था। उनके स्वास्थ्य-लाभ के लिए किए गए पिता के सभी प्रयास विफल जो रहे थे। और पत्नी को मृत्यु के हाथों खो देने के बाद तो पिता पूरी तरह ही घर के सुधार के प्रति निष्क्रिय हो लिए थे।
“फिर बैठक में आए तो जनाब उचरे, या तो भाई तुम महाकंजूस हो या फिर हमीं ने ग़लत सुन रखा था कॉलेज में पढ़ाने वालों को अच्छा-ख़ासा वेतन मिला करता है . . .”
“ऐसा कहा उन्होंने?”
“इस पर मुझे बहुत ग़ुस्सा आया और मैंने कहा, आपके बेटे ने आपको यहाँ निहुराई-हेतु भेजा है या अपने लिए मेरी बेटी का हाथ माँगने?”
“फिर?”
“इस पर उन्होंने दूसरा पंजा निकाल लिया, पहले आपकी औक़ात आँकी जाएगी फिर आपकी बेटी के बारे में विचार किया जाएगा।”
“फिर?” उषा की व्यग्रता अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच ली। अशोक उसे बता चुका था उसके पिता उधर वाराणसी के नामी वकीलों की एक लंबी वंशावली से सम्बन्ध रखते थे और हाल ही में अपने पुश्तैनी मकान को छोड़कर अपने लिए तैयार करवाए गए एक नए आवासीय क्षेत्र के एक विशाल, आधुनिक बँगले में खिसके थे।
“फिर क्या?” निहाल चंद का स्वर तीता हो लिया, “उस अपमान और निरादर पर मैं ताली तो पीटता नहीं। मैंने भी खरी-खरी सुना दी, औक़ात आँकनी है तो मेरी बेटी की पढ़ाई और योग्यता की औक़ात आँकिए। जो आप के बेटे के बराबर बैठती है। उन्नीस नहीं बैठती।”
“आप भूल गए?” उषा का गला रुँधने लगा, “अशोक मुझे अच्छा लगता हैं। मैं उससे शादी करना चाहती हूँ। उसी से शादी करूँगी।”
“मगर बिट्टो,” निहाल चंद ने बेटी की पीठ घेर ली, “अशोक और उसके पिता का सही होना भी तो बहुत ज़रूरी है। वज़न करने के उन के बाट-तराज़ू सही होने भी बहुत ज़रूरी है। लड़की के पिता के घर की दीनता या अस्तव्यस्तता को लड़की की पढ़ाई और योग्यता से गड्डमड्ड कर के उस का मूल्यांकन करना सही है क्या?”
“लेकिन दुनिया तो आप की तरह नहीं सोचती। आप की तरह नहीं चलती!” उषा ने पिता की बाँह अपनी पीठ से अलग झटक दी।
“सोचना तो मुझे है!” निहाल चंद ने बेटी का कंधा थाम लिया, “सोचना तो तुम्हें है। ग़लत सोचवालों की ग़लत दुनिया में हमें दाख़िल होना है या अपनी अलग और सही दुनिया में बने रहना है? उन लोगों की ठसक देख कर अपने हाथों के तोते उड़ जाने देने हैं या फिर उन्हें अपनी मूठ में सहेजे रखने हैं?”
उषा ठिठक गई। एकाएक। पिता द्वारा थमाए गए वे जाने-पहचाने तोते उसके हाथों से छूट गए थे क्या? अशोक द्वारा उसके हाथों की दिशा में छोड़े गए लव-बर्ड्स को स्थान देने हेतु? न केवल हाथों ही में, बल्कि अशोक ने तो उसके जन्मदिन पर उसे लव-बर्ड्स का एक जोड़ा भी भेंटस्वरूप दे रखा था, यह बताते हुए कि ‘लव-बर्ड्स’ नाम से पहचाए जाने वाले पक्षी तोते ही के परिवार से होते हैं। और यदि किसी जोड़े में से एक की मृत्यु हो जाती है तो दूसरा जन शोक में अपने प्राण त्याग देता है।
निस्संदेह वे बाक़ी तोतों की तुलना में छोटे आकार के थे और कम बोलते थे। मगर पिंजरे में रखे जाने पर सट कर बैठते थे। इन लव बर्ड्स की चोंच तोतों ही की भाँति अंकुशाकार थी। गर्दन छोटी मगर सिर बड़ा था और वे अपने मज़बूत पैरों की दो उँगलियाँ आगे की दिशा में नोक निकाले रखते थे और बाक़ी तोतों की भाँति अच्छी नक़ल उतार लेते थे और उन के सामने जो कोई जो भी बोले, वे वही रट पकड़ लेते थे।
जीवन के उस मदकाल में पच्चीस-वर्षीया उषा लव-बर्ड्स ही को थामे रखना चाहती थी। वास्तविकता के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप में भी।
कर्णगोचर उन लव-बर्ड्स के अनुनाद का सम्मोहन पिता के पुराने चरागाह के आरक्षित क्षेत्र के वाक्-यंत्र से उत्पादित स्वरित वाक पर हावी हो गया और वह दोहरा उठी, “अशोक मुझे अच्छा लगता है। मैं उससे शादी करना चाहती हूँ। उसीसे शादी करूँगी। मैं भी उसे अच्छी लगती हूँ। वह भी मुझी से शादी करेगा। वह अपने पिता की लीक पर नहीं। आप उससे यह सुन भी लें। मैं अभी उस का मोबाइल मिलाती हूँ . . .”
उषा का मोबाइल उसके पर्स में था। इधर बैंच पर बैठते समय उस ने उसे अपने पैरों के पास लॉन ही पर धर दिया था।
उसे उठाने के लिए वह नीचे झुकी। किन्तु उसे उठा न सकी। प्रबल उस मनोवेग की अवस्था में वह बैंच से नीचे गिर पड़ी थी। आगे की ओर। अपने हाथों के बल। चटक-चटक।
फैली हुई उस की एक बाँह की एक हड्डी चरक गई थी और वह दर्द से चीख़ उठी: “बा . . .”
पिता के लिए वह ‘बा’ संबोधन का प्रयोग किया करती, जब भी उसे उन से झगड़ा निपटाना होता।
♦ ♦
“यह कौल्ज़ फ़्रैक्चर है,” एक्सरे की रिपोर्ट देख कर इन्सटीटयूट के हड्डी-विशेषज्ञ ने कहा, “गिरते समय अपने शरीर को अपने हाथों की टेक देने के कारण उषा की दाहिनी बाँह चटक गई है और उसकी अगली हड्डी टूट गई है। रेडियस नाम की।”
“रेडियस?” निहाल चंद ने हैरानी जतलाई।
“हमारी बाँह की अगली तरफ़ दो हड्डियाँ होती हैं। एक रेडियस और दूसरी अल्ना,” हड्डी-विशेषज्ञ ने पूरी व्याख्या दी, “और हाथ को बाँह से जोड़ने वाली कलाई में छोटी-छोटी आठ हड्डियाँ होती हैं जिन्हें कार्पल बोन्ज़ कहते हैं। उषा की सभी कार्पल बोन्ज़ तो बच गईं हैं। लेकिन कलाई वाले जोड़ से लगभग दो या फिर अढ़ाई सेंटीमीटर ऊपर वाले स्थल पर रेडियस तड़की है . . .”
“फ़्रैक्चर गंभीर तो नहीं?” निहाल चंद गंभीर हो लिए।
“नहीं, आप चिंता मत करिए। रेडियस के टूटे खण्ड हम अभी जोड़ देंगे। उषा को दर्द ज़्यादा ह, इसीलिए हड्डी की सीध मिलाते समय इसे हम बेहोशी की अवस्था में रखेंगे। फिर पलस्तर बँध जाएगा। रिजिड पलस्तर कास्ट। ख़ूब कड़ा पलस्तर।”
“और वह पलस्तर उतरेगा कब?”
“समझिए तीन महीनों में उषा का यह हाथ पूरी तरह सँभल जाएगा . . .”
♦ ♦
यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि उन तीन महीनों में उषा का हाथ ही नहीं सँभला। उस का दिल भी सँभल गया। अपने प्रति अशोक का मंदोत्साह देख कर।
अचरज नहीं, जो अशोक से भेंटस्वरूप पाए लव-बर्ड्स कहलाए जाने वाले उन दो छोटे तोतों को उस ने पिंजरे से आज़ाद करने में तनिक विलंब नहीं किया था।
प्रेम की अदनवाटिका से तदनंतर पूरी तरह से बाहर हो लेने हेतु। जहाँ वह पिछले दो वर्षों से अशोक के संग उन लव-बर्ड्स की चहचहाहट अपने कानों में, अपने दिल में भरती रही थी। हाथों-हाथ।
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