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तेरे लिए तो सबसे बड़ा कमरा

समय के रथ पर सवार जीवन जब यात्रा पर निकल पड़ता है तब अनेक मोड़ों /अनेक पड़ावों के पल उसकी भावी यात्रा के आजीवन सहचर बन जाते हैं। ये पल कभी स्मृतियों के विशाल प्रांगण में छुपन-छुपाई का खेल खेलते हैं तो कभी आशीष का जलप्रपात बन सारी तपिश हर लेते हैं . . . कभी-कभी प्रतिपल ज्योतित आलोक बन, आगे की राह दिखाते चलते हैं। ऐसा ही एक प्रकाश पुंज मेरे जीवन में उतर आया। दुनिया के लिए अभी चिकित्सक, मेडिकल कॉलेज के प्रोफ़ेसर और नाक-कान-गला विभाग के विभागाध्यक्ष, मानवता की रेलिंग थामे, अध्यात्म की सीढ़ी चढ़ते जाने वाले साधक तो मेरे लिए एकमात्र ऐसे संरक्षक, अभिभावक, मार्गदर्शक और मित्र डॉ. लक्ष्मीकांत सहाय, जहाँ मैं खुली किताब थी। यों भी मेरे बारे में जानने के लिए मेरे शब्दों की आवश्यकता न थी, वे तो अनकहा समझते थे, समझते ही नहीं थे, जो मैं जान भी न पाऊँ कि जीवन के इस या अगले मोड़ पर क्या घटित हो रहा या होने वाला है, वे जान जाते और संरक्षक की तरह बच्चों सहित मुझे बचा ले जाते। ज्यों-ज्यों उनकी साधना बढ़ती गई, वे आत्मलीन होते गए, भौतिक तत्वों से विरक्ति तो दशकों पहले से थी, मगर आत्मिक संबंध भौतिकता से परे होते हैं, उसका निर्वहन वे आज भी कर रहे, जबकि संसार के लिए पिछले वर्ष ही विदेह हो चुके। 

अंकल के निर्निमेष नेत्र आज भी उसी अतुल स्नेह से निहार रहे और मंद मुस्कान में अस्फुटित आशीष बरसा रहे, जिसे स्पष्ट रूप में महसूस रही . . . हमेशा की तरह! पिछले पड़ावों को निहारूँ तो पट खुलता है वर्ष 1992 का, जब उनकी क्लीनिक बतौर मरीज़ गई थी। शहर में उनके नाम की चर्चा थी। महज़ इसलिए नहीं कि बुज़ुर्ग अनुभवी चिकित्सक थे, इसलिए कि समय के साथ चिकित्सा-क्षेत्र में बढ़ते कोलाहलों के बीच वे अपनी पुरानी पद्धति और सबसे कम फ़ीस सहित एक दिन में गिने-चुने मरीज़ देखते, ग़रीब मरीज़ से फ़ीस लेना तो दूर, दवाएँ भी दे देते और कहीं कुछ और ज़रूरत हो तो अपना रेफ़्रेंस लेटर भी ताकि उस मरीज़ को हर जगह रियायत मिल सके। आस-पास के गाँव के लोग सुबह से लाइन लगाए रहते। सुबह से फोन पर नंबर बुकिंग की सुविधा थी। हर एक मरीज़ को पूरा समय देना, उसके मनोविज्ञान को समझना और फिर दवा और उससे भी अधिक सलाह देना उनकी कार्यशैली थी। डॉक्टर सहाय ने मुझे देखा, आँखें चेक की और पलकों तले बोझिलता पढ़ ली, साइनस के पोईंट चेक किए और पर्चे पर दवा व परहेज़ लिखने लगे। दो-तीन तरह की मुहर मारी जिनमें अलग-अलग हिदायतें अंकित थीं। ज़ुबानी ज़्यादा कुछ नहीं कहा, पर्चा दिखाते हुए बोले, "पढ़ इसको . . . समझी! तेरी बीमारी भीतर ही भीतर घुटते रहना है। तनाव से भी साइनस बढ़ता है। तेरा शरीर बाहरी दबाव से कम मन-मस्तिष्क के दबाव में अधिक और तुरंत आता है। बाहरी वातावरण के बुरे प्रभाव से बचने का नुस्ख़ा पर्चे पर है।” मैं सिर हिलाती हुई उन्हें देखती रही, ऐसा अनोखा डॉक्टर पहली बार देखा, जो मन की गाँठें पहली बार में टोह ले– वह भी बिना कुछ पूछे। उनकी आँखों में ममता थी, वात्सल्य था, अनकहा संदेश भी कि 'ज़िंदगी ख़ूबसूरत है, इससे प्यार करना चाहिए'। 

ये पहले डॉक्टर थे, जिनके लिए पहली मुलाक़ात में ही सम्मान ही नहीं श्रद्धा-भाव भी उभरा था। फिर तो जब भी कोई दिक़्क़त आती, उनके पास ही जाती और हर बार वे दवा-परहेज़ तो लिखते, अदृश्य दुआओं की पोटली चुपचाप मुझे थमा देते, इसलिए वहाँ से जब लौटती तो आधी तकलीफ़ ग़ायब! बीच के कुछ वर्षों में उनकी क्लीनिक जाने का क्रम टूटा। मुझे लगा, वे भूल गए होंगे, मगर उन्हें मैं–वर्षों पहले की उनकी मरीज़ उन्हें याद थी। 2008 के उत्तरार्ध में अनायास उन्हें देखा तो देखकर ही ख़ुश हो गई । राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार और शिक्षाविद डॉक्टर राधाकृष्ण सहाय जिन्हें भागलपुर विश्वविद्यालय के समस्त हिंदी प्राध्यापक और कमिश्नरी के साहित्यकार अपना अभिभावक मानते थे, के साथ ही चिकित्सक डॉक्टर सहाय का कई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ाव होना अच्छा लगा। ये संस्थाएँ उन्हें बुलाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करतीं। उस माटी की एक ख़ूबी है, साहित्य-शिक्षा-संस्कृति से संबंध लोग या संस्थाएँ खुले मन से उस माटी से जुड़े और अतीत हो चुके व्यक्तित्व को अमरता प्रदान करने के लिए कुछ न कुछ ठोस काम करते रहते हैं, अपने से वरिष्ठ से आशीष लेने से नहीं चूकते और न ही किसी के सहयोग से। माटी और भाषा/बोली के प्रति गहन आस्था और समर्पण दिखता है उनमें। इसलिए तमाम व्यस्तताओं के बावजूद सहाय अंकल किसी को निराश नहीं करते थे। जब मैंने उन्हें देखा तो सहसा सिर उनके क़दम की ओर झुक गए। उनके नेत्र वात्सल्य से भरे-भरे थे तब भी। आकाशवाणी के राष्ट्रीय मंचीय कार्यक्रमों में भी वे बतौर सम्मानित अतिथि बुलाए जाते। ख़ास कर आकाशवाणी के मेरे दोनों मंचीय कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति देर तक बनी रही। अब अंकल से मिलने के लिए मुझे न बीमार होने की आवश्यकता थी, न मरीज़ बनकर उनके सामने जाने की। अपने सीनियर कंपाउंडर से उन्होंने कह रखा था कि मेरे आने-जाने पर टोक-टाक न करे। सो, जब उस तरफ़ से गुज़रती, क्लीनिक घुसती, अंदर अधिक मरीज़ होते या वे अधिक व्यस्त होते तो पास रखी विज़िटर्स चेयर पर बैठ जाती। वे सवालिया निगाह उठाते कि सब ठीक है न। मेरी ओर से आश्वासन का संकेत पाकर फिर मरीज़ देखने लग जाते। उनके पास के मरीज़ जब चले जाते तो मेरा हाल पूछते, मैं बैठने के मूड में होती तो कोई बात ही नहीं, नहीं तो उनके गले लग, उनके चरण छू कर निकल आती। धीरे-धीरे उनके जीवन में मेरा अधिकार-क्षेत्र बढ़ता गया और मेरे जीवन में उनका कर्म-क्षेत्र। मैं सभी को मित्र कहती हूँ, मगर प्रायः संबंध ऐसे कि फिर मैंने ही अपने हिस्से की दोस्ती निभाई– बे-आवाज़! कहीं भी उसकी धमक सुनाई न दे और जिसे स्वीकारा है, उसे भर दूँ, फिर वह कोई भी हो– किसी भी उम्र का हो। ईश्वर के बाद एकमात्र सहाय अंकल ही ऐसे व्यक्तित्व मिले, जो मेरे जीवन के संरक्षक, मार्गदर्शक, अभिभावक और गहरे मित्र बने रहे। मैं उनकी मित्र नहीं थी। जिसने ईश्वर को इसी जीवन में पा लिया हो, उसे किसी से कुछ साझा करने की ज़रूरत नहीं होती, यह महसूसा था उनमें। ऐसा नहीं था कि कुछ भी साझा नहीं करते थे, ज्यों-ज्यों आत्मीयता गहराती गई, वे खुलने लगे थे। किसी मसले पर वे खुल कर राय देते, बिला वज़ह टोक-टाक नहीं करते, न ही अपने ज्ञान और साधना का प्रदर्शन करते थे। मैंने उनसे जो भी सीखा पाया, वह उन्हें देखकर– उनके कार्य-व्यवहार को देख-परख कर। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा था, “मुझे जाँचो-परखो, फिर मेरी बात का विश्वास करो" गाँधी ने भी यही कहा, "मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।" स्वामी विवेकानंद ने कहा– "तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता, कोई आध्यात्मिक बना नहीं सकता। तुमको सब कुछ स्वयं अंतस से सीखना है।आत्मा से अच्छा शिक्षक कोई नहीं है।" अंकल की प्रवृत्ति और प्रकृति समय के बढ़ते चक्र के साथ जिस प्रकार, संतनुमा हो गई थी, उसके प्रदर्शन के लिए उन्हें वाणी या वेशभूषा में बाह्य आडंबर रचने की आवश्यकता न हुई। वे जैसे रहते थे, जो पहनते थे, अंतिम समय तक वह बना ही रहा। मर्यादा, चरित्र आदि की दुनियावी परिभाषा पर वे मुस्कुराते, कहते, "इन बातों का वहाँ कोई मतलब नहीं।” 

नवंबर 2009! जब डायरी से निकल कर मेरी कविताएँ ‘अंतर्मन' के नाम पुस्तक रूप में सामने आईं। लोकार्पण समारोह में शहर के दिग्गज साहित्यकार शिव कुमार शिव, रंजन कुमार व अन्य सहित मेरे तीन पूज्य— माँ, बाबा और सहाय अंकल एक साथ डायस पर उपस्थित थे, इससे बड़ा उपहार क्या होता मेरे लिए! सारी व्यवस्था मानवजी ने की थी। अंकल के कथन इतने सारगर्भित और मर्मस्पर्शी थे, अर्थ के कितने ही आयाम प्रस्तुत कर दिए थे उन्होंने! काश! वह आवाज़ सुरक्षित रख पाती! मई 2010 में ‘ज्योति कलश' के लोकार्पण समारोह का दायित्व आकाशवाणी के वरिष्ठ संचालकों एवं कलाकारों ने सँभाला था। मेरे गीत उनके स्वर में जी उठे थे। माँ-बाबा नहीं आ पाए तो मन ज़रा उदास था, सहाय अंकल ने महसूस लिया और अपने काम को छोड़कर हाज़िर! इस बार डॉक्टर राधाकृष्ण सहाय भी उपस्थित थे। उन दोनों की उपस्थिति कार्यक्रम को शीर्ष तक ले गई। 

वर्ष 2009–10 एक ओर मुझे साहित्य की बाहरी दुनिया की ओर खींच रहा था, दूसरी ओर मानसिक संघर्ष भी उसी अनुपात में बढ़ता गया था। बाहरी दुनिया से मेरा तात्पर्य मंचीय कार्यक्रमों में शिरकत करने या सम्मान स्वीकारने से है। बतौर कहानीकार, कवयित्री, बाल रचनाकार आकाशवाणी 1995 से ही जाती रही थी। मानसिक संघर्ष के कई कारण थे। उस समय मेरी अवस्था अंकल ने बतौर चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और अभिभावक बनकर समझी। यह वह समय था जब मन की परतें खुलती गईं। उन्होंने दवा न के बराबर दी। सुबह से क्लीनिक में होते, शाम को वहाँ से निकलकर मेरे पास आते। मैं जानती थी, यह अंकल के आराम करने का समय है, जो उनके लिए बेहद ज़रूरी भी था, मगर उन्होंने निर्णय ले लिया कि जब तक मैं अवसाद के घेरे से एक सीमा तक मुक्त नहीं हो जाती। वे रोज़ शाम को आते, घंटे-डेढ़ घंटे बैठते, मैं ज़मीन पर उनके पैर के पास बैठकर उनकी गोद में सिर रखकर सुबक लेती। कभी-कभी तो आँसू भीतर ही भीतर बहते और वे कुछ सोचते हुए सिर सहलाते रहते। फिर दोनों बच्चों के साथ बातें करते, सासु माँ नज़र आतीं तो उनसे समधी के नाते खड़े होकर मिलते। मैं जब पूछती, “आप खड़े क्यों हो जाते हैं?” तो मुस्कुराकर कहते, “तेरा बाप हूँ तो खड़ा तो होना पड़ेगा न! समाज की रीत है कि बेटी का बाप हमेशा झुकता है।" 

“चाहे सामने वाला उस योग्य हो या न हो?” 

“छोड़ न, उससे मेरा आकार छोटा थोड़े हो जाता है—चल-चल अब कॉफ़ी पिला। ड्राइवर को भी तो घर जाना है।" ऐसी ही कई बातें, कई परंपराएँ जिनके प्रति उनकी आस्था गहरी न थी, निभाए जाते थे और मैं चिढ़ जाती थी। अब समझ रही हूँ, वे व्यर्थ की बातों में उलझने के बजाय परंपरा में घुस आई बुराइयों के निराकरण पर चिंतन करते और अपने ढंग से उन्मूलन करते थे। 

अनोखे चिकित्सक! उनके पास कई ऐसी मरीज़ थीं, जिनमें तनाव का कारण परिवार था, ऐसी मरीज़ को बेटी का दर्जा ही नहीं, वही प्यार-दुलार, अधिकार और किसी भी समय अपनी हर परेशानी को साझा करने और सलाह लेने की छूट देते जो ग्रामीण/क़स्बाई/छोटे शहर के मध्यवर्गीय परिवार में विवाहित बेटियों को मयस्सर नहीं होता। धीरे-धीरे मर्ज़ तो ग़ायब हो जाता, वे बेटियाँ आत्मबल से भरने लगतीं और जीने की राह बनाने लगतीं। वे समाज के इस ताने-बाने से दुखी होते, विवाहित नवयुवती की आत्महत्या व अवसादग्रस्त होते-होते बीमारियों का पुलिंदा होते जाने को वे अपने चिकित्सा-क्षेत्र के लगभग छह दशकों के अनुभव से समझ रहे थे। अंकल कभी-कभी चर्चा करते उन बेटियों की। एक दिन मैंने झूठ-मूठ का रोष जताते हुए कहा, “अंकल देख रही हूँ, बेटियों की संख्या बहुत बढ़ा ली है आपने, अगर मेरे हिस्से का दुलार एक छटाँक भी कम हुआ न तो देख लीजिएगा।” 

अंकल हँसे “पागल हुई है क्या? तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता। चिंता मत कर, अंदर बहुत जगह है। सबके लिए अलग-अलग कमरा। . . . और तेरा कमरा तो सबसे बड़ा है।" 

अंकल सिर्फ़ सच बोलते और सच की राह ही चलते हैं, जानती थी, फिर भी उनके ऊपर अपने अधिकार-भाव को बनाए रखने का सुख भला कैसे छोड़ती! अंकल भी मेरे इस भाव को समझते और मेरे बचपने को अपने पास सुरक्षित रखने की कोशिश करते जो वर्षों पहले खो गया था। उनका ही साथ रहा जो 2009 से 2018 तक की तमाम बहुआयामी चुनौतियों से संघर्ष कर सकी। 

वर्ष 2010! अंकल बोले, "आज तेरी ज़रूरत है।" मेरे लिए यह नया था कि अंकल के विश्वास की कसौटी पर खरा उतर सकूँ, कुछ कर सकूँ। अंकल के छोटे भाई की पत्नी अपने बेटे के करियर की चिंता और अवसाद में इस क़दर बिस्तर पर आ गई कि किसी की दवा काम नहीं कर रही थी। उन्होंने खाना-पीना कम कर दिया था। अंकल रिश्ते की ज़ंजीर से बँधे थे। वे मर्ज़ समझ रहे थे, समझा सकते थे, मगर उस तरह दुलार कर नहीं। उन्हें विश्वास था कि मैं यह कर सकूँगी। मेरी अस्वीकृति का प्रश्न ही कहाँ था! रोज़ सुबह गाड़ी लेने आती और चार-पाँच घंटे बाद घर पहुँचा जाती।

पहला दिन ! अंकल क्लीनिक जाने को तैयार! मेरे इंतज़ार में बरामदे पर चहलक़दमी करते हुए मिले। मुझे साथ लेकर बड़े वाले कमरे में आंटी जी के सामने खड़ा कर दिया और बोले, "ये मेरी बेटी है। तुमसे मिलने आई है। मैं क्लीनिक जा रहा हूँ।" अंकल ने और कुछ नहीं कहा। मैं कुछ देर संकोच से घिरी रही, फिर नज़र घुमाई। आंटी जी का बेटा माँ के बिस्तर के पास टेबल पर सिर झुकाए बैठा नज़र आया। प्यारा-सा बच्चा, मगर उदास क्यों है? फिर मैं भी कुर्सी खींचकर बैठ गई और आंटी जी से बात करने लगी। बात करने के दौरान उनकी हथेली अपनी हथेली पर रख कर प्यार से थपथपाती रही। धीरे-धीरे आंटी जी खुलने लगीं, उनके भीतर जमा अवसाद का गहरा धुआँ अब छँटने लगा। उनका बेटा रिशु जो बारहवीं में कम नंबर लाने के कारण अपराधी की तरह महसूस कर रहा था, वह भी खुलने लगा। दो से तीन दिन में आंटी के चेहरे की रंगत बदल गई। वे उठकर बैठने लगीं और चौथे दिन तो ज़िद करके उन्होंने अपने हाथ से लेमन टी बनाकर पिलाई। रिशु ख़ुश था, अंकल भी! एक दिन आंटी की हथेली थामे मैंने कहा, "हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है, उसे बचाए रखना चाहिए। . . . आपको भी! उम्र के बंधन अवसाद बढ़ाते हैं मगर भीतर बैठा बच्चा ख़ुशी के क्षण ढूँढ ही लेता है । रिशु बहुत अच्छा बच्चा है। बहुत प्रतिभाशाली! एक दिन बहुत आगे जाएगा।" मैंने तो सहज भाव से कहा, मगर जाने क्या असर हुआ, आंटी जी का अवसाद मिट चला। अंकल बरामदे से मेरी बात सुन रहे थे। दूसरे दिन उन्होंने फोन किया। आवाज़ में चहक थी। बोले, "मेरा विश्वास जीत गया। तुम उसको बचा लाई। अब तो मैं हर पेशेंट से कहता हूँ, 'हर इंसान के भीतर एक बच्चा होता है, उसको बचाकर रखो'। . . . तुम्हारा यह फ़ॉर्मूला बड़े काम का है।" दिल को सुकून मिला, कि अंकल की परेशानी कुछ कम कर पाई। यह उनके विश्वास और स्नेह का ही प्रतिफल था और कुछ नहीं। एक बात वे हमेशा कहते, “तुझे कोई समझ नहीं सका, इसलिए तुझसे कुछ पा न सका। ऐसे ही थोड़े न बेटी बनाया है।" अंकल ने इसी तरह मुझपर प्रेम और विश्वास बनाए रखा कि उस नेमत को बनाए रखने के लिए मैं रह-रह कर ख़ुद को जाँचने लगी थी। कई बार उनसे ही पूछ बैठती, "मैं सही राह पर हूँ न!" 

"जिस दिन डिगोगी, मेरी बेटी नहीं रहोगी। चिंता मत कर! तेरी दिशा सही है। ऐसा कुछ आभास होगा तो मैं पहले ही चेता दूँगा। वह नौबत ही नहीं आएगी।" अंकल ने आजीवन निभाया इसे। अब, जबकि उनका आभास दिव्य ऊर्जा-पुंज के रूप में होता है, वहाँ से बरसती दिव्य आभा महसूसती हूँ। यह भ्रम या कोरी कल्पना नहीं है। 

वर्ष 2011! मेरे जीवन में उथल-पुथल ! दिल्ली आ जाना! आ जाने के बाद अपनों के द्वारा मिलने वाले मानसिक आघात और उसके कारण जीवन का पटरी से उतर जाना। कई रंग देखे मानव चरित्र के, बस एकमात्र अंकल ही थे जो कोसों दूर होने के बावजूद मेरे और बच्चों के लिए चिंतनमग्न रहे, मुझे राह दिखाते रहे, प्रतिकूल परिस्थितियों में साहस बढ़ाते रहे। मगर फोन की भी अपनी सीमा है। वे तो साधनारत हो, मेरे और बच्चों की स्थिति जान जाते मगर मैं उनसे बात की बिना विकल होती। उनकी किडनी पर हल्का दबाव शुरू हो चुका था। खाना-पीना तो यों भी संयम से था। मगर आराम न करते, परिवार-सगे-संबंधी, दिल से जुड़े संबंध और ग़रीब मरीज़—सबकी ख़ुशी का ध्यान रखते हुए सबके लिए कर्मरत! 2015 से बीमारी प्रत्यक्ष रूप में उभरी, मगर उन्हें कहाँ चैन! पाँच वर्ष बाद 2016 में जब मेरा भागलपुर जाना हुआ तब थोड़े सुस्त लगे, मगर साधना उत्तरोत्तर ऊर्ध्वमुखी! जब मैंने स्वास्थ्य को लेकर टोका तो उनके चेहरे पर वही संत-सी मुस्कान बिखरी, बोले, “अरे बेटा! जब तक चल सकता है, चलने देते हैं। बड़ी आसरा रहता है गाँव के पेशेंट को। बेचारा ग़रीब! कहाँ जाएगा?” 

“क्लीनिक गए बिना आप जी भी नहीं सकते, मालूम है, लेकिन इलाज तो करवाइए।“ 

“वो है न, वही जाने सब कुछ! एक साल तो हो गया। तुम्हारा भैया का मन रखने के लिए दिखा लिए, दवा भी है लेकिन खाएँगे नहीं।" 

“ये कैसी ज़िद है! किसीकी बीमारी ओढ़ी है क्या?” 

उन्होंने सवाल टाल दिया और जवाब को दूसरी दिशा दे दी, “यहीं सब भोग कर जाएँ तो अच्छा है। . . . चिंता मत कर! अभी बहुत समय है।"

वर्ष 2017, साहित्यायन ट्रस्ट की ओर से बाल पुस्तकालय खोलने के क्रम में भागलपुर जाना हुआ तो पहली बार अंकल के साथ कुछ अधिक रहने और लंबा संवाद करने का अवसर मिला। मैं महसूस रही थी, वे देहधारी होकर भी देह से परे होते जा रहे थे। उस समय भी स्वामी विवेकानंद को महसूसा था, देख रही थी आचरण में उतरे हुए। सामाजिक दायित्वों का निर्वहन उसी गति से करते, साधना गहन हो चली थी। सांसारिक मान्यताओं और उसके दृश्यमान स्वरूप की असारता का भान तो पहले से ही था, अब परतें खुलने लगी थीं। नाथ नगर में कार्यक्रम के दौरान वे पूरे समय साथ रहे, बाहर ही भोजन किया हमने, फिर हमें घर रवाना कर, दूसरी बेटी को दिया वचन निभाने चले गए। शाम से रात 10 बजे के कुछ बाद तक हमारी बातचीत होती रही। इस बीच मुझे अपने हाथ से सादा भोजन बनाकर अंकल को खिलाने का अवसर मिला। उस पल जो आत्मतुष्टि हुई, उसे शब्द नहीं दे सकती। मुझे याद है, कम शब्दों में ही मर्यादा, चरित्र आदि बातों पर नए सिरे से और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उन्होंने मेरी जिज्ञासाओं का शमन किया था। अंकल मेरे समक्ष सत्य के प्रतिरूप थे। पिता को भी देखा था सदैव सत्य-पथ पर चलते हुए, उनकी आंतरिक साधना कभी समझने का अवसर नहीं मिला, मिला भी तो अंतिम दिनों में किंतु अंकल तो मेरे हर तरह की जिज्ञासाओं का समाधान करने वाले इंसाइक्लोपीडिया थे। उनसे बात करने के बाद मन में कभी संबद्ध विषय को लेकर संशय न रहता। कभी-कभी हँसकर कहते भी, “अरे बेटा! तोरा जन्म नै दिए तो क्या, हैं तो बापे न" मैं भी हँसकर स्वीकारती, कभी इस वाक्य की तह में जाने की कोशिश नहीं की। आवश्यकता नहीं पड़ी। उनका स्नेह एक ओर ,सारे संबंध दूसरी ओर। आज भी उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। जगह लेना तो दूर, उनके स्तर पर खड़े होने योग्य कोई नहीं दिखता। 

यहाँ एक उल्लेख ज़रूरी जान पड़ता है। मैं निराश होती दिल्ली की कलाकारी से / मौसम से अधिक बदलते बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोगों को देखा, उनके बहुरूपिए व्यवहार देखे, प्रत्यक्षत: सहयोगी बनकर अपनी हीनता या अभाव को तुष्ट करने का माध्यम मुझे बनाते देखा और मैत्री के नाम पर सीढ़ी से धकेलना भी . . . मैं अवाक्! अंकल से कहती, बार-बार कहती, “कब आएँगे आप? मुझे ढेरों बात करनी है। फोन पर नहीं . . . आपके पास बैठकर बात करनी है।" 
“इतने दिन हो गए तुझे। अब तक तो दिल्ली को समझ लेना था। कैसे नहीं समझी अब तक!” 

“आप जैसा कोई नहीं जिस पर पूरा भरोसा किया जा सके।" 

“अब तक मिला नहीं? . . . मिल जाएगा बेटा! मिल जाएगा। परेशान न हो।” 

“कोई भी आप जैसा नहीं हो सकता। भगवान जी ने दूसरा पीस ही नहीं बनाया।” 

वे ज़ोर से हँसे थे। 

“हम तो हैये हैं न! तुझे और नाती-नातिन को देखने-सुनने के लिए हमको फोन का ज़रूरत थोड़े पड़ता है।” 

“तो हमको भी सिखाइए न!" 

"सीख जाएगी बेटा! वक़्त आने दे।" 

अंकल की दोनों बातें सत्य साबित हुई। हालाँकि आरंभ में जिन्हें वर्षों तक अंकल के बाद स्थान देती रही, वह भ्रम टूटा और सही पात्र / आध्यात्मिक सलाहकार मिला और उनके माध्यम से अंकल के उस उच्च दिव्य स्तर को समझ पाई। . . . और मज़ेदार बात यह कि जब भी अंकल से मिली तो मेरे पास उद्विग्नता भरे सवाल स्मृति में ठहरते ही नहीं। अंकल के सान्निध्य में मन-मस्तिष्क जैसे भूल-सा जाता।

वर्ष 2018 में माँ जीवन और मौत के बीच झूल रही थी, ऐसी त्रासद स्थिति में बिहार जाना हुआ तो अंकल से मिले बिना लौटने का सवाल कहाँ था! मगर अंकल के साथ ज़्यादा समय नहीं बिता सकी। शेष समय उलझन भरा ही रहा, न मिल पाने की अजीब-सी मन:स्थिति के साथ। बीच के कालखंडों में रिषु से पता चला था, अंकल अधिक बीमार रहने लगे हैं। राजेश भैया भाभी जबरन साथ ले गए हैं ताकि आराम कर सकें। मैं जानती थी उन्हें चैन न होगा। वे मरीज़ों की चिंता सहित अपनी सभी बेटियों की चिंता से मुक्त नहीं होंगे। ड्राइवर, रसोइया सभी का परिवार भी तो उन पर ही आश्रित था, अन्य कई युवा छात्र भी। मैंने पहले भी उनसे कहा था कि राजेश भैया की बात मान लें, वहीं रहें। नहीं माने थे वे . . . पूरी ज़िंदगी डॉक्टर सहाय बनकर रहे हैं। हर एक के लिए द्वार खुला रहा। 

"वहाँ लोग राजेश को जानते हैं, हमको उसका पिता के रूप में ही जानेंगे।” 

“तो वहीं क्लीनिक खोल लीजिएगा, मन लगा रहेगा।" 

“राजेश भी यही कहता है। अब इ उमर में हम ज़मीन से नहीं उखड़ेंगे। यहाँ जो लोग हमसे जुड़े हैं, (इलाज, आजीविका और सहयोग के लिए) भरोसा करते हैं, उनको ऐसे कैसे छोड़ दें? आज 40 बरस से जो मान-सम्मान, प्यार मिला है यहाँ, अपना आराम के लिए सब कुछ भुला दें, छोड़ दें? . . . जब तक ज़िंदा हैं , भागलपुर नहीं छोड़ेंगे। नहीं रहेंगे, तब बात अलग है।" 

“मेरे बाबा वाला हठ!” 

“तुम अभी नहीं समझ रही बेटा! समझ जाएगी।”

मानती हूँ, माटी का भी क़र्ज़ होता है। उसके प्रति भी लगाव होता है। यह मोह नहीं, स्नेह का वह अप्रतिम रूप है जो माता-शिशु के के वात्सल्य-भाव में झलकता है। अपनी माँ-सी माटी की गोद में हमेशा के लिए सो जाना! 

2019 में मेरे पिता की स्थिति का जायज़ा साधना के स्तर पर लेते और मुझे बताते रहे थे अंकल, सलाह भी दी थी जिसे सही समय पर मेरे परिवार ने नहीं सुना और स्थिति बिगड़ती चली गई। मेरी बहुआयामी स्थिति ऐसी थी कि दिल्ली में सिवाय अवसादित होने के कुछ नहीं कर सकती थी। आश्चर्य यह कि अंकल के आगाह करने के बावजूद एक बार जाने की कोशिश की तो कई तरह की हानि उठाकर स्टेशन से घर वापस आना पड़ा, बड़ी मुश्किल से मिला रिज़र्वेशन बरबाद हो गया। फिर उसी दिन जा पाई जो तिथि उन्होंने पहले ही बताई थी। कई ऐसी अनहोनी, जिसका मानसिक आघात मुझे मिलना था, सबकी चर्चा वे पहले ही कर चुके थे, फोन पर समझाया था बार-बार कि मुझे झेलने ही होंगे आघात मगर शांत रखना होगा ख़ुद को . . . वह हो न सका। पिता को असहाय अवस्था में एक-एक पल रिक्त होते देख रही थी। इसी बीच एक दिन के लिए भागलपुर गई। अंकल शांत थे, नब्ज़ ही नहीं, हाथ के एक स्नायु के भीतर की गति शताब्दी ट्रेन से भी अधिक गति में। उन्हें उस मकान को छोड़ना था, जिसमें पाँच दशक गुज़ार चुके, जहाँ के कण-कण में परिवार की यादें बसी थीं, जो मकान उन्हें हमेशा घर लगा। कई बड़े-बड़े त्रासद क्षण उन्होंने इसी मकान में भोगे थे, इसी मकान में आत्म को ढूँढा और पाया था। मैं जब गई तो दरवाज़े पर ताला लगा देखकर हैरान-परेशान हुई। लगभग घंटे भर बाद अंकल की गाड़ी की आवाज़ सुनी तो तसल्ली हुई। आदतन गाड़ी से उनके उतरते ही गले मिली, फिर उलाहना दिया, “भूल कैसे गए हम आने वाले हैं ?” अंकल ने भीतर चलने का इशारा दिया। अंकल की एक और मेरी जैसी ही बेटी जो मेरे दिल्ली जाने के बाद और अंकल के अस्वस्थ होने के बाद उनसे अधिक जुड़ गई थी। मैंने पाया, उसके भीतर अपने अधिकार भाव का रोष बहुत अधिक होता, ख़ास कर जब मेरे जाने पर अंकल मेरे साथ होते, साथ खाते-पीते। मैं समझती और उसके रोष पर प्यार आता। अंकल भी समझते मगर बात टाल जाते। उस दिन अंकल की तबियत का नासाज़ होना दिख रहा था। उन्होंने खाना भी नहीं खाया। लेटे-लेटे सारी बातें कीं। वे थोड़ी देर सोना चाहते थे, मगर उनकी वही बेटी हर पाँच मिनट में लगभग 4-5 बार फोन करके कभी दवा के लिए कभी किसी बात के लिए कहलवाती रही, इससे अंकल की नींद बार-बार टूट रही थी। मैंने कहा, थोड़ी देर के लिए साइलेंट कर दीजिए, मगर वह भी हो न सका। मैं उसकी बुद्धि पर तरस खाती रही, इतने दिनों से अंकल से जुड़ी रहकर भी वह अंकल को समझ नहीं पाई, यह भी नहीं की उसके व्यवहार से अंकल की परेशानी बढ़ रही। अंकल मेरे शब्द से अधिक मेरे मन को पढ़ने में सक्षम थे, उस हालत में भी . . . । मैं उनके पास बैठी इंतज़ार करती रही, अंकल थोड़ा सो लें तो फिर बात हो। मिनट-मिनट किसी न किसी कारण से खिसकता गया। बाबा से संबंधित कुछ निर्देश दिए, आगाह किया कि वे 31 से पहले भी जा सकते हैं। यही बात मेरे पिता ने भी कही थी, की 31 तक रुक नहीं सकेंगे। मैंने देखा, अंकल बाबा के बारे में बताते हुए बीच-बीच में कहीं शून्य में अधखुली आँखों से निहारते रहते। पूछ बैठी तो मुस्कुरा कर बोले, "ऊपर से ही तो ज़वाब मिलता है। . . . मेरे लिए चिंता मत कर। अभी तो हैं ही।" 

"फिर मुलाक़ात होगी?" 

"देखो, होना तो चाहिए। अभी मेरे जाने में देर है।" 

फिर कुछ नहीं कह पाई थी। कोई मिलने आ गया और हमारी बातचीत का क्रम भंग हो गया। दुनियावी बातों में भी ईश्वरतत्व ढूँढ़ लेना और लीन हो जाना . . . परमार्थ और हर एक को स्नेह और सम्मान देकर जैसे ईश्वर तत्व के प्रति अपने भाव समर्पित करते थे। कथाकार रंजन भैया नियत समय पर मुझे लेने आ गए। अंकल के साथ कम समय बिता पाने का मलाल लिए उनसे विदाई माँगी। गले मिलते हुए मन ने दुआ की कि फिर मिल सकूँ गले, फिर छू सकूँ चरण और सुन-सीख सकूँ अनकहे शब्द-संदेश। अंकल दरवाज़े से लगे रहे जब तक गाड़ी गली से सड़क की ओर मुड़ नहीं गई। मेरा मन पीछे की ओर भागता रहा, शरीर आगे की ओर। 

अंकल का स्वास्थ्य बिगड़ता रहा, मगर उन्होंने मुझे भनक तक न लगने दी कि वे डायलिसिस पर पिछले चार वर्षों से हैं। 2019 में मिलकर आने के बाद कभी फोन पर बात होती तो मुस्कुरा भर देते, फिर धीरे से कहते, "शरीर ठीक नहीं है, मन चकाचक।" पहले की तरह बात नहीं हो पाती, मगर अंकल यों चले जाएँगे, इसका अनुमान न था। 2020 में बहुत कम बात हो पाई। न के बराबर! अब उनकी हँसी में ठहराव होता। मैं विकल थी, मगर लॉकडाउन और कोरोना के बढ़ते क़दम ने मेरे पाँव बाँध रखे थे, बिहार जाना हो नहीं पाया। 27 जुलाई को फ़ेसबुक पर धमाका हुआ . . . किसी ने अंकल के विदेह होने की ससम्मान पोस्ट डाली थी। 26 जुलाई को मध्यरात्रि में ही अंकल ने आँखें मूँद लीं। 

स्वामी विवेकानंद को देखा नहीं, बापू को भी नहीं! मगर यह देख-समझ और गुन पा रही हूँ कि बापू की तरह अंकल ने अपने जीवन को ही परवर्ती पीढ़ी के लिए संदेश बना दिया। स्वामी विवेकानंद की तरह संसार में रहकर सांसारिक लिप्सा के प्रति अनासक्ति, हर जीव में ईश्वर-दर्शन, कर्मयोग को जीवन में साधना, ज़रूरतमंदों का गुपचुप सहयोग, भक्तों के लिए धर्मशाला, आत्मिक गुणों का सहज आलोक बिखेरना . . . बिखेरते रहना, मानव सेवा को धर्म समझ, उसमें रत रहते हुए भी साधना-उपासना में लीन रहना और अंतत: ईश्वरतत्व के दर्शन और प्रतिपल अनुभूति इसी लोक में पा लेना . . . यह था उनका जीवन! युग कोई भी हो, सद्पुरुष हर युग में अवतरित होते हैं। मैं सौभाग्य को कितना सराहूँ कि ऐसे व्यक्तित्व को जितना जान-समझ पाई, वह भी मुझे गर्वित करने को पर्याप्त है और जीवनशैली सिखाने को भी। अंकल कल भी साथ थे, आज भी हैं। वे हैं और दिशा दिखा रहे हैं . . . बस अब उनके गले नहीं लग पा रही! 

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टिप्पणियाँ

जेन्नी शबनम 2021/07/30 08:07 AM

डॉ. एल. के. सहाय भागलपुर के प्रसिद्ध डॉक्टर रहे हैं। उनकी बेटी मेरे स्कूल में पढ़ती थी, मुझसे एक साल सीनियर थी। लेकिन वह न रही। उनसे एक बार मिली हूँ अपने कान दिखाने के लिए। उसके बाद आज आपके पोस्ट से जानकारी मिली कि उनका व्यक्तित्व कितना विशाल था। ऐसे महान विभूति विरले ही होते हैं। आपको उनका सानिध्य मिला यह वरदान है। डॉ सहाय को विनम्र श्रद्धांजलि।

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