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तुम जैसी

छुटकी!
तू भी बड़ी हो गई!!
लील गई मुस्कान 
भ्रमजाल फैलाती मर्यादाओं ने 
भूल गई 
तू भी थिरकना 
मचलना और ज़िद करना 
सभ्यता के आवरण में
संस्कार की बेड़ी से कसे स्वर 
अवरुद्ध हो ही गए!

ओह!
छुटकी! तू क्यों बड़ी हो गई?
तुझमें जीती थी मैं 
हाँ! जीती थी अपना बचपन
तेरे अल्हड़पन में 
अपनी साँसें चुनती थी 
तेरी कल्पनाओं में 
अपने सपने बुनती थी 
और जी उठता था 
मेरा कोमल निसर्ग मन!

हाय!
खो ही गई खिलखिलाहट 
और बाल सुलभ आमोद भी 
अब हर घड़ी नीति उपदेश 
हमारे आचार-व्यवहार पर
हमारी सोच,
हमारी आकांक्षाएँ 
हमारी रुचि-अरुचि 
हमारे निर्णय 
हमारी अभिव्यक्ति 
हमारे बढ़ते क़दम 
अनायास 
अनदेखी बेड़ियों की फाँस से 
अब घुटने ही लगे हैं!
कहीं मुक्त हवा नहीं मयस्सर
काश!
तू कुछ और दिन जी लेती 
अपना शापमुक्त जीवन
और तुझमें मैं भी!!

दीदी!
हम क्यों बड़ी होती हैं?
शालीनता, संस्कार 
और पुरातन पीढ़ियों की 
अवांछनीय परंपराओं को 
अपने कमज़ोर कंधों पर उठा 
हाँफने- काँपने के लिए;
सजीव उपादान का आकर्षक
मुखौटा पहनने के लिए;
स्वत: स्फूर्त प्रेम पर 
पहरे बिठा
तन-मन नोचने-
खसोटने देने के लिए
आजीवन!

ओह दीदी!
राज़ तुम्हारी ख़ामोशी का
अब समझ पाई हूँ मैं!
तुम्हारे नीरव मौन में गुंफित 
हाहाकार का पारावार
हाँ! 
अब ही तो समझ पाई हूँ मैं!
पिता की इच्छा
भाई का निर्देश 
माँ की विवशता और 
तुम्हारे भावहीन चेहरे का राज़
अब ही तो समझ पाई हूँ मैं!
समझ पाई हूँ –
क्षत-विक्षत हृदय का 
मूक क्रंदन 
पराधीन सपनों की घुटन 
और अवचेतन –सा 
रेंगना तुम्हारा 
पिता और भाई के इशारे पर।

हाँ दीदी!
अब ही तो समझ पा रही हूँ 
कि मैं 
तुम जैसी क्यों हो रही हूँ!

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