वे गुनगुने पल
संस्मरण | स्मृति लेख डॉ. आरती स्मित1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
समय की अठखेली जितना बूझो, कुछ अनबूझ रह ही जाता है, ख़ासकर तब जब अनायास वर्तमान अतीत की गठरी ढीली कर उनमें से कुछ पल ढुलका देता है। वर्तमान में अतीत को जीने की अनुभूति, उन पलों में उतर आने और स्वयं को उनसे एकाकार होते देखने की साक्षी प्रवृत्ति कभी हँसाती तो कभी रुलाती है।
31 अक्टूबर 2025 की हल्की अलसाती दुपहरी में शरीर सुकून का चँदोवा तान आराम करना ही चाहता था कि मोबाइल बज उठा और भाँजी के रुँधे स्वर ने आँसू बरसा दिए। मन-मस्तिष्क यकायक मौन हो गया। आँसू फ़ोन से निकलकर मेरी आँखों में जगह पा गए। कुछ न सूझा। क्या करूँ, समझ न आया। याद आई माँ, जिसे पिछले कई महीने से सच से दूर रख, आश्वासन सौंपा जा रहा था कि उनका बड़ा बेटा (मेरे भैया) जल्द ही स्वस्थ हो जाएगा; जो एक शहर में होते हुए भी अपनी अशक्ति के कारण अपने बीमार बेटे से मिल नहीं पाई थी और जो अब तक अनजान थी कि . . .
‘अश्वत्थामा हतो हतः’ सदृश अर्द्धसत्य की बैसाखी लिए संवाद करना कितना अपराध-बोध देता है, यह हृदय जानता है। मन को समझाना ही क्या जब वह उस बिंदु से परे की सोच में उलझा हो कि प्रियजन का जाना अधिक कष्टकर है या उनके पीछे बिलखते परिवार की पीड़ा को दूर न कर पाने की अवश स्थिति को झेलना।
मन की अवशता से बोझिल सूजी पलकें थककर मुँदने लगीं तो कानों में भैया की पुकार गूँजी, फिर समय ने अदृश्य दरवाज़े को हौले से खोल दिया। स्मृति की छोटी डोंगी में सवार पल सजीव दृश्य में बदलने लगे। धुँधलका छँटने लगा। हल्की भीनी रोशनी फैलने लगी। दिखने लगा वह पुराना घर, माँ, बाबा और भैया और मैं।
गुनगुनी यादों में तहियाए पल अंगड़ाई लेने लगे तो सामने दिखा ओसारा। ओसारे पर बिछी चटाई पर किताब-कॉपियाँ खोले बैठी दस वर्षीया ज़रा साँवली बच्ची—मैं गणित में सिर खपाती हुई। बरामदे से सटे कमरे से निकलकर छह फ़ुट लंबे, पतले, शर्ट-पैंट पहने और छुरी-सी नाक पर चश्मा चढ़ाए भैया आते हैं। सबसे बड़े भैया—दिलीप भैया। पूछ बैठते हैं—“क्या हुआ?”
“हिसाब समझ नहीं आ रहा है।”
भैया बाहर जाना मुल्तवी कर गणित समझाने लगते हैं।
“समझ आ गया?”
“हाँ!”
“इसी तरह बाक़ी हिसाब भी हल होगा। बनाकर रखना, हम लौटकर देखेंगे।”
भैया के आदेश पर सिर हामी में हिल गया मगर उनके जाते ही वे सारे फ़ॉर्मूले भी दिमाग़ से चले गए जिनसे सवाल हल होने थे। वह समझ भी। अब क्या? माथापच्ची की, सिर खुजाया, काट-पिट करती रही, बात न बनी तो किताब-कॉपी मोड़कर किनारे रख दी। पाँचवीं पास कर सीधे सातवीं में जाना मज़ेदार था मगर गणित! भूत की तरह जब-तब डराता रहता। धूप में पसीने-पसीने होती हुई अकेली खेल में मगन मैं भूल ही गई कि भैया आकर पूछेंगे। भैया आए और मुझे खेलते देखकर टोका, “सवाल बना लिए?”
खेल बंद। पैर स्थिर। नज़र भैया पर। होंठ हिले, स्वर फूटे—“नहीं।”
“क्यों?”
“नहीं बना।”
“तुम तो बोली कि समझ आ गया।”
“आपके सामने आ गया था। आपके साथ चला गया।”
“और तुम किताब समेटकर रख दी।”
भैया के स्वर के साथ ‘तड़ाक’ की आवाज़ गूँजी। जीवन का पहला करारा थप्पड़ कोमल गाल पर पड़ा तो उनकी उँगलियों के निशान उभर आए। आँसू भरभराकर बह निकले।
“हमको आपसे नहीं पढ़ना। हम कभी नहीं पढ़ेंगे।”
मैं रोती हुई कमरे में चली गई। शायद भैया को एहसास हुआ कि उनसे ग़लती हो गई। वह थप्पड़ गाल से अधिक मासूम दिल पर लगा क्योंकि बाबा के बाद एक वही थे, जिनसे मेरी ट्यूनिंग अच्छी रही। उन्होंने दुलारना, मनाना, बहलाना चाहा, मगर न जी न! मानने का सवाल ही कहाँ था! अब तो बाबा से भैया की शिकायत करनी थी। बस! मुझ कमअक़्ल को इतनी भी बुद्धि न थी कि भैया हम सबसे बड़े हैं। बीस साल के नवयुवक। मुझे तो इतना मालूम था कि वे मुझे बहुत प्यार करते हैं। और आज उन्होंने थप्पड़ मारा। यह असह्य पीड़ा इतनी जल्दी शांत कहाँ होनी थी! ख़ैर भैया ने किसी तरह मना लिया। मान तो गई मगर उसके बाद फिर कभी उनसे गणित पढ़ने नहीं बैठी। . . . वे पल सिमट आए तो मेरी हथेली गाल से जा लगी है। सोच रही हूँ, काश! एकाध थप्पड़ और खा लिया होता तो गणित सुधर जाती। यह मायके में मुझे पड़ने वाला पहला और अंतिम थप्पड़ था।
भीगे पलों में से कुछ पल बहते आ गए हैं—उसी वर्ष राखी का दिन। भैया अपनी ट्यूशन की कमाई से मेरे लिए उपहार लाए—रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स (भाग १) की मोटी पुस्तक। उस उपहार के सामने वे सारे रुपये तुच्छ जान पड़े जो अन्य भाइयों से मिले थे। भीतर आनंद का समृद्ध सोता फूट पड़ा था। भैया ने समझाया कि कैसे इसकी सहायता से अंग्रेज़ी बोलना सीख सकते हैं और ग्रामर सुधार सकते हैं। भैया फिर से मेरे दोस्त हो गए।
वर्ष बीते। कक्षा आठवीं में भैया ने विज्ञान की रोचक जानकारियों से भरी एक मोटी पुस्तक उपहार में दी। विज्ञान के प्रति रुझान बढ़ाने में वह पुस्तक सहायक हुई। पुस्तक उपहार में देने की उनकी पहल ने कहीं न कहीं कोमल मन में अपना छोटा पुस्तक-घर बनाने का सपना बुन दिया। इससे पूर्व रामकृष्ण मिशन आश्रम के कार्यक्रमों में पुरस्कारस्वरूप पुस्तकें पाती रही थी। पुस्तक को अपना कहने का अधिकार भाव अनकही ख़ुशी से भर देता था।
वर्ष १९८४ में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद उनकी अंतिम यात्रा देखने व समाचार सुनने के इच्छुक घरों में टीवी ख़रीदा गया। राजेश भैया भी टीवी ख़रीद लाए। हालाँकि मेरे परिवार में बेटी की पढ़ाई का कोई मोल न था, बावज़ूद इसके छोटी-छोटी बातों ने जीवन को देखने की नई दृष्टि दी। दोनों भैया मुझे हिंदी-अंग्रेज़ी समाचार सुनने के लिए प्रेरित करते। एक दिन सरला माहेश्वरी या मंजरी जोशी का समाचार बुलेटिन सुनते हुए भैया बोल पड़े, “एक दिन तुम भी दूरदर्शन में ऐसे ही दिखोगी।” भैया तो कहकर भूल गए। उस घर का वातावरण भी ऐसा न था कि ऐसा सोच पाती। दिल्ली हमारे लिए वाक़ई दूर थी। मगर ब्रह्मांड ने सुन लिया था। मैं न्यूज़ रीडर तो न बनी लेकिन 1995 से 2017-18 तक आकाशवाणी के विविध विभागों से विविध भूमिकाओं में सम्बद्ध रही। यहाँ तक कि आकाशवाणी के अखिल भारतीय कविता/कहानी के मंचीय सम्मेलन में अलग-अलग राज्यों में शिरकत करने का अवसर मिला तो दूरदर्शन के विविध केंद्रों में भी भागीदारी निभाई। निजी चैनलों की बाढ़ में अब तो यह बेहद सुगम हो गया है, किन्तु फिर भी दूरदर्शन केंद्रों की अपनी महत्ता थी और है। कहीं न कहीं भैया की अव्यक्त इच्छा फलीभूत हुई है तभी पथरीली राहों में भी फूल खिलते गए।
1984 में ग्रामीण बैंक में चयन के साथ ही उनके लिए रिश्ते आने शुरू हुए। 1985 में उनका नया जीवन शुरू हुआ और समय नौकरी और नए-पुराने रिश्तों में बँटने लगा। मेरे किशोरी मन पर भैया की अतिरिक्त सतर्कता कई बार खीझ पैदा करती, बाद में समझ आया, आसपास के परिवेश के कारण घर के पुरुष सुरक्षा भाव से भरे होते हैं। बहरहाल, 1990 में मेरे विवाह के बाद जब भी घर जाना होता, भैया-भाभी के साथ समय ज़रूर गुज़रता। हम पहले की तरह बात-बेबात ठठाते। दिल्ली प्रवास के बाद चीज़ें छूटती गईं। हालात और दिनचर्या बदलते गए। अब घर जाने में वर्षों गुज़र जाते। जाना भी होता तो सीमित समय के लिए। पिता गए। माँ अपने पुराने डीह में बसी यादों की सुगंध के साथ बँधी रही। इस दौरान, जब भी मेरी नई पुस्तक आई, भैया ने ख़ुशी ज़ाहिर की। पुस्तक पढ़ने की आदत छूट चुकी थी। शरीर ढल रहा था, मगर समाज के लिए कुछ करते रहने का उनका जज़्बा बना रहा। मैनेजर पद से निवृत्ति के बाद भी वे कई संस्थाओं से जुड़े, अपना दायित्व निर्वहन करते रहे। हाल के वर्षों में ख़ास मौक़े पर माँ के साथ अपनी तस्वीर भेजना न भूलते। संवाद की कड़ी कमज़ोर होकर भी सम्बन्ध की सुगंध बिखेरती रहती।
एक ख़ूबसूरत स्मृति 2023 में मेरे जन्मदिन की। माँ, भैया-भाभी, मेरे बाद की पीढ़ी सहित परिवार के अन्य जनों के साथ यादगार शाम बीती। मुस्कुराते पल तस्वीरों में सहेजे गए। वापसी में रात की गाड़ी थी। हम शाम को भैया के घर चले गए। वह शाम हमने साथ-साथ बिताई। देर रात को हमें स्टेशन पहुँचाकर भैया लौटे। तब कहाँ पता था, अब कभी आऊँगी तो वो मुस्कुराते हुए नहीं मिलेंगे, न पूछेंगे—कैसी हो?
2025 के सितंबर में दीदी के फ़ोन ने विस्फोट किया कि भैया अब कुछ दिन के मेहमान हैं। चीथड़े मन समेटती हुई मैं तत्काल मुंबई जा पहुँची ताकि उन्हें देख लूँ, उनकी आवाज़ सुन लूँ। वही हुआ। भले ही उनसे उनकी स्थिति छिपाई जाती रही, मैं हँसने-बोलने का अभिनय करती उन्हें हिम्मत देती रही कि वे घर लौटकर खाएँ-पिएँ तो जल्द ही स्वस्थ हो जाएँगे, मगर उन्हें तो अपने शरीर का स्वर साफ़-साफ़ सुनाई दे रहा था। शाम को विज़िटर आवर समाप्त होने पर जब लौटने से पहले मैंने हौसला देना चाहा तो मेरी बात पर वे मुस्कुराए, फिर सूनी आँखों से विदाई दी। टाटा मेमोरियल कैंसर संस्थान के उनके कमरे से निकलते हुए भी यह एहसास होता रहा कि भैया ने पलकें नहीं झपकी हैं। वे लगातार निहार रहे हैं। शायद जानते थे, फिर कभी नहीं देख पाएँगे।
भैया घर आ गए। घर अस्पताल में तब्दील हो गया। बेटे ने तन-मन-धन से पिता की सेवा में ख़ुद को मिटा दिया और साबित कर दिया कि श्रवण कुमार केवल त्रेता में नहीं होते। बेटी ने भी अपना फ़र्ज़ निभाया। बीच-बीच में बात होती। स्थिति सँभले होने की सूचना पाकर मैं आश्वस्त रही। दिवाली की सफ़ाई से लेकर छठ पूजा तक बात हो न पाई। भैया मानो इन पर्वों के बीत जाने का इंतज़ार करते रहे। बिहार में छठ महापर्व के रूप में मनाया जाता है। छठ पूजा की समाप्ति के बाद 31 अक्टूबर को अपराह्न साढ़े ग्यारह बजे उन्होंने अपने रोगी शरीर से स्वयं को मुक्त कर लिया। यह वह समय था जब एक साथ दो आत्मीय के जाने की सूचना मिली।
हिंदी साहित्य के शताब्दी पुरुष रामदरश मिश्र जी जिनके साथ पिता-पुत्री सा नाता रहा था, और मेरे भैया—आगे-पीछे एक बेला में जाते हुए कहीं मिले होंगे। पलटकर देखा भी होगा कि सबने एक-एक आत्मीय को खोया, मैंने एक साथ दो आत्मीय को। मुस्कुराए होंगे भैया, कहा होगा उनसे—‘ज़िद्दी है, जताएगी नहीं, मगर पिघलती रहेगी . . . ”
मैं भी जानती हूँ भैया, आप जब-तब आकर मुझे पुकारना, मेरे कार्यों के लिए बधाई देना नहीं छोड़ेंगे। स्मृति में आपने जैसी पैठ बनाई है, वे पल सदैव वर्तमान के फूल बने, खिले, सम्बन्ध की सुगंध बिखेरते मुस्कुराते रहेंगे . . .
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