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वृहत्त नाटक—विवेकानंद: एक योद्धा संन्यासी के अंक के अंतिम (कुछ दृश्य) अंश


दृश्य 50

 

स्वामीजी और संन्यासी साथी गुरुदेव का जयकारा कर रहे हैं। सब बड़े प्रसन्न हैं। स्वामीजी कंधे पर रामकृष्ण परमहंस अस्थि कलश उठाए प्रसन्न भाव से बढ़े जा रहे हैं।

 

स्वामीजी:

(चलते-चलते, साथियों से) 9 दिसंबर, 1898। आज का दिन कितना शुभ है! ठाकुर ने मुझसे कहा था कि ‘तू कंधे पर चढ़ाकर जहाँ ले जाएगा, मैं वहीं जाऊँगा और रहूँगा; वह स्थान चाहे वृक्ष के नीचे हो या कुटी में’। इसलिए मैं अस्थि कलश स्वयं कंधे पर उठाकर मठभूमि ले जा रहा हूँ। निश्चय जान लेना कि ठाकुर ‘बहुजनहिताय’ यहाँ दीर्घकाल तक स्थिर रहेंगे। जो मठ हम यहाँ बना रहे हैं, उसमें सभी मतों और भावों का सामंजस्य रहेगा। ठाकुर का जो उदारमत था, यह उसी का केंद्र होगा। विश्व समन्वय की जो किरण यहाँ से प्रकाशित होगी, उससे सारा जगत् उद्भासित हो जाएगा।

 

(अस्थि कलश को ऊँचे स्थान पर रखा जाता है। स्वामीजी साथियों एवं शिष्यों के साथ गुरुदेव की जय-जयकार करते हैं। स्वामीजी के साथ सभी दुहराते हैं – ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे। गीत-संगीत के बाद बैठे सभी साथी एवं शिष्य संन्यासियों को स्वामीजी संबोधित करते हैं।)

स्वामीजी:

(हर्ष से) श्री गुरुदेव की इच्छा से आज उनके धर्मक्षेत्र की स्थापना हो गई। बारह वर्ष की चिंता का बोझ आज मेरे सिर से उतर गया। इस समय मेरे मन में क्या-क्या भाव उठ रहे हैं, सुनोगे? यह मठ विद्या एवं साधना का एक केंद्र होगा। धार्मिक गृहस्थ इस भूमि के चारों ओर अपने-अपने घर बनाकर बसेंगे और बीच में त्यागी संन्यासी लोग रहेंगे। मठ के दक्षिण ओर इंग्लैंड तथा अमेरिका के भक्तों के लिए घर बनाए जाएँगे।

यथासमय यह सब होकर रहेगा। मैं तो इसकी नींव-मात्र डाल रहा हूँ। बाद में न जाने और क्या-क्या होगा! कुछ तो मैं कर जाऊँगा, कुछ विचार तुम लोगों को दे जाऊँगा।

साथी संन्यासी:

तुमने जो संकल्प लिया है, वह अवश्य पूरा होगा। प्रतीक स्वरूप गुरुदेव प्रतिक्षण साथ हैं।

 

दृश्य 51


(बेलुर मठ। गुरुभाई आपस में बात कर रहे हैं।)

 

गुरुभाई १:

और डॉक्टर ने उसे समुद्री यात्रा करने और किसी ठंडी जगह जाकर रहने और आराम करने की सलाह दी है। किन्तु नरेन तो अथक श्रम का पर्याय बन चुका है।

गुरुभाई २:

हाँ, देखो! इस बार भी वह कितने समय आराम करता है। मैं जानता हूँ, वह वहाँ जाकर भी चैन से नहीं बैठेगा।

गुरुभाई ३:

सही कहा। उसके पत्र से तो ऐसा ही लगता हैं। 20 जून 1899 को 'गोलकुंडा' नामक जहाज़ से लंदन के लिए रवाना हुआ। जहाज़ मद्रास बंदरगाह पहुँचा तो कई शिष्य और प्रशंसक उनसे मिलने आए। 1 जुलाई को जहाज़ लंदन पहुँच गया। दो सप्ताह बाद वह कैलिफ़ोर्निया से न्यूयॉर्क चला गया किन्तु वहाँ बिना रुके वह वहाँ से डेढ़ सौ मील दूर श्रीमती लगेट के कंट्री हाउस चला गया, जो बहुत ही सुंदर और शांत जगह है।

शेष दोनों:

यह उसने अच्छा किया।

गुरुभाई १:

देखो, आगे उसकी क्या योजना बनती है। हम यहाँ का दायित्व भली-भाँति निभाएँ, यह आवश्यक हैं।

 

(शेष दोनों सहमति जताते हैं और बात करते हुए बाहर निकल जाते हैं)

 

दृश्य 52


(स्वामी अभेदानंद का प्रवेश।)

 

अभेदानंद:

(दर्शकों से) नरेन का संदेश पाकर मैं तत्काल उनसे मिलने चल पड़ा। फिर हम साथ-साथ हैं। पिछली बार भारत जाने से पहले अमेरिका के वेदांत सोसाइटी का प्रभार उसने मुझे ही सौंपा था। उसके आगमन की सूचना आग की तरह फैली है। प्रशंसक उनको सुनने के लिए बेचैन होने लगे हैं। उसे अपने आराम की चिंता कहाँ! लॉस एंजेल्स में भी लोग उनका भाषण सुनने को बेचैन रहे। वह कभी किसी का दिल नहीं दुखा सकता। अस्वस्थ होने के बावजूद वह उन्हें धर्म के व्याख्यान के साथ ही रामायण और महाभारत की कहानियाँ भी सुनाता रहा। लोगों में उत्साह देखते ही बनता है। फिर हम वहाँ से सेन फ्रांसिस्को रवाना हुए। सेन फ्रांसिस्को में लोगों की श्रद्धा और सम्मान भाव को देखते हुए नरेन उन्हें गीता, वेदांत की शिक्षा देने के साथ ही, कुछ निजी कक्षाएँ भी ले रहा हैं . . .

 

(दूसरी ओर इशारा करते हैं। प्रकाश स्वामीजी पर। दर्शक उनके श्रोता रूप में होंगे)

 

स्वामीजी:

वेदांत पग-पग पर कहता है—बंधु, तुम जिसकी अज्ञात कहकर उपासना करते हो, उसकी उपासना मैं तुम्हारे रूप में करता हूँ। तुम जिसकी खोज विश्व भर में कर रहे हो, वह सदैव तुम्हारे पास ही रहा है . . .

 

(तालियों की पार्श्व ध्वनि)

फेड आउट

फेड इन

 

(स्वामीजी एवं अभेदानंद संवाद करते हुए आगे बढ़ते हैं। मंच के सामने पहुँचकर स्वामीजी कुछ सोचते हुए कहते हैं)

 

स्वामीजी:

काली! मेरा विचार है, क्यों न न्यूयॉर्क में एक और वेदांत सोसाइटी की स्थापना हो ताकि इच्छुक लोग जुड़े रह सकें।

अभेदानंद:

उत्तम विचार है। मेरे लिए क्या निर्देश है?

स्वामीजी:

तुम लौटकर अपने कार्य को गति दो। मैं कैलिफ़ोर्निया से न्यूयॉर्क आ जाऊँगा।

 

(दोनों चलते हुए बाहर निकल जाते हैं) 
फेड आउट
फेड इन


(पेरिस। स्वामीजी अपनी इस यात्रा पर चिंतन करते हैं। कुछ विदेशी शिष्य इधर-उधर दिखाई देते हैं।)

 

स्वामीजी:

(स्वगत) श्रीमती लगेट ने पेरिस में ‘धर्मों के इतिहास’ पर भव्य आयोजन की जानकारी दी। वे चाहती थीं कि मैं उसमें अवश्य सम्मिलित होऊँ। यद्यपि मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं, किन्तु उनकी सलाह मानकर आज 1 अगस्त को मैं पेरिस की धरती पर क़दम रख चुका हूँ। पेरिस! मेरा तात्कालिक गंतव्य!! मैंने प्रयास तो किया है कि यात्रा के दौरान पेरिस के इस ‘धर्मों के इतिहास के अधिवेशन में’ अपनी बात समझा पाऊँ। और इसलिए अमेरिका में ही फ़्रैंच सीखना शुरू भी कर दिया था, मुझे आशा थी कि लोग अपनी भाषा में मेरे कहे को अधिक समझेंगे।

स्वास्थ्य ठीक न होने के बावजूद मैंने दो भाषण दिए और लोगों ने पसंद किया है। लोग मुझे नाम से जानने लगे हैं। यहाँ महान भारतीय वैज्ञानिक जगदीश बसु से भी कई बार मिलने का अवसर मिला। कुछ शिष्य साथ पाने की लालसा में मेरे साथ-साथ यात्रा कर रहे हैं।

 

फेड आउट 
फेड इन

 

स्वामीजी:

(स्वगत) ऑस्ट्रेलिया, तुर्की, ग्रीस घूमने के दौरान कई महत्त्वपूर्ण लोगों से मिल चुका और दर्शनीय स्थानों को देखा भी। किन्तु, अब बाहरी दृश्यों में मेरा मन नहीं रम रहा। साथ चल रहे शिष्य-मंडली की प्रसन्नता के लिए साथ हो लेता हूँ, किन्तु नहीं! अब और नहीं! मैं, मेरा मन, अब अधिक से अधिक ईश्वर-चिंतन में रमना चाहता है। इसलिए अब मुझे बिना किसी को सूचना दिए, भारत लौट जाना चाहिए।

 

दृश्य 53


(9 दिसंबर 1900 की रात। बेलूर मठ। स्वामीजी के विदेशी कपड़ों के कारण दरबान पहचान नहीं पाता और उन्हें मुख्यद्वार पर ही रोक देता है और भीतर संन्यासियों को बताने जाता है। स्वामीजी भी उसके आगे बढ़ते ही भीतर आ जाते हैं। एक ओर मठ के कुछ संन्यासी भोजन हेतु बैठे हैं)

 

दरबान:

(उन संन्यासियों से) कोई साहेब आए हैं, मिलना चाहते हैं'।

 

(कोई कुछ कहे, इसके पहले ही स्वामीजी अन्दर आ जाते हैं। उन्हें सामने पाकर सब बहुत प्रसन्न होते हैं। एक के इशारे पर स्वामीजी के लिए भी भोजन की थाली आती है। सब भोजन आरंभ करते हैं)

 

स्वामीजी:

आज लंबे समय बाद आश्रम का भोजन पाकर तृप्त हो रहा हूँ। यहाँ का समाचार बताओ।

एक साथी:

मिस्टर सेवियर नहीं रहे। मिसेज सेवियर अब भी (मायावती) अद्वैत आश्रम के दायित्व के प्रति समर्पित हैं।

स्वामीजी:

(गंभीर मुद्रा) सेवियर दंपती ने अपना जीवन अद्वैत आश्रम की सेवा में समर्पित कर दिया। हिंदुओं के लिए आत्मोत्सर्ग करनेवाले दो महान अँग्रेज़। यदि कोई शहीद हुए हों, तो ये ही हैं . . . मुझे उनसे मिलने जाना होगा।

 

(अन्य साथी द्वारा ‘नरेन! अवश्य जाओ / जाना चाहिए’ जैसे मिले-जुले स्वर उभरते हैं। भोजन करके सब उठते हैं और बाहर निकलते हैं)

 

दृश्य 54


(कथावाचक मंच पर दर्शकों को संबोधित करते हुए आगे की यात्रा का ब्योरा देता हैं। बैकग्राउंड में मायावती आश्रम आदि का दृश्य। प्रकाश कथावाचक पर।)

 

कथावाचक:

जनवरी 1901। स्वामीजी मायावती आश्रम पहुँचे। वहाँ उन्हें पाकर सबकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।

 

(दूसरी ओर इशारा करता है। प्रकाश मायावती आश्रम के संन्यासियों एवं मिसेज सेवियर पर। सब स्वामीजी को घेरे हुए हैं। सबके चेहरे पर ख़ुशी का भाव है। स्वामीजी मिसेज सेवियर से संवाद कर रहे हैं। अन्य संन्यासी इधर-उधर कार्यरत। प्रकाश से दिन-रात का क्रम। मद्धम प्रकाश। स्वामीजी अर्द्धपद्मासन लगाए ध्यानमग्न हैं। वे धीरे-धीरे आँखें खोलते हैं)

 

स्वामीजी:

(अपने आप से) हिमालय की मेरी यह पाँचवीं यात्रा अंतिम यात्रा ही है। हिमालय की गोद में आकर प्रकृतिस्वरूपा जगद्जननी के सान्निध्य की अनुभूति होती रही है। मायावती के इस पवित्र वातावरण में दो सप्ताह बीत गए। अब लौटना होगा। समय कम है। माँ के लिए कुछ न कर सका। उनकी एक इच्छा तो पूरी कर दूँ।

 

(स्वामीजी शून्य में देखते हुए सोच में डूबे रहते हैं। प्रकाश कथावाचक पर)

 

कथावाचक:

(दर्शकों से) मठ लौटने के कुछ समय पश्चात् स्वामीजी अपनी माँ और कुछ शिष्यों के साथ ढाका गए। ढाका का प्राकृतिक वातावरण उन्हें प्रिय लगा। वहाँ भी प्रशंसकों की ख़ुशी और जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने दो लंबे भाषण दिए। सैंकड़ों लोग मिलने आते रहे। वे भी कई जगह गए। वहाँ से वे गुवाहाटी आ गए। फिर मुख्य आयुक्त सर हेनरी कॉटन के निमंत्रण पर असम में शिलांग गए। रास्ते में एक रात के लिए लाबान की एक झोंपड़ी में रुके, किन्तु स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण लगभग बीस-पच्चीस दिनों तक रुके रहे। सर हेनरी कॉटन ने लाबान में अस्वस्थ स्वामीजी के लिए उपचार की व्यवस्था करवाई। एक बार उनसे मिलने लाबान भी आए। सर हेनरी कॉटन से सार्थक बातचीत हुई। मिलने-जुलनेवालों की भीड़ भी लगी रही। दूसरी ओर इशारा करता हैं—

 

एक:

(भीड़ में से कोई एक) स्वामीजी! अमेरिका, इंग्लैंड जैसे बड़े देशों में घूमने के बाद आप यहाँ क्यों आए?

स्वामीजी:

एक भिक्षु के जीवन में तीर्थयात्रा करना उसका कर्त्तव्य है। और इसलिए मैं कामाख्या के रास्ते शिलांग आया। जिस स्थान पर हेनरी कॉटन जैसे सहृदय व्यक्ति हों, वह स्थान स्वयं तीर्थ बन जाता है। मि. कॉटन एक ऐसे व्यक्ति हैं जो भारत की समस्याओं को अच्छी तरह समझते हैं और इसकी बेहतरी चाहते हैं।

 

(भीड़ श्रद्धा से उन्हें देखती हैं। लोग आते-जाते रहते हैं)

 

दृश्य 55


(शिलांग। कार्यक्रम स्थल। दिन का समय। सर हेनरी कॉटन एवं स्वामीजी कुर्सी पर बैठे हैं।)

 

संचालक:

(दर्शक को संबोधित करते हुए) क्विंटन मेमोरियल हॉल, शिलांग में सर कॉटन की अध्यक्षता में आयोजित इस सार्वजनिक बैठक में उपस्थित खचाखच भरे हॉल और उन्हें सुनने के लिए बाहर भी खड़े आप सभी श्रोताओं का स्वागत है, जहाँ आप स्वामीजी को सुनेंगे। स्वामीजी ने अस्वस्थ होने के बावजूद हमारे आग्रह को स्वीकार किया, इसके लिए हम कृतज्ञ हैं। मेरा स्वामीजी से आग्रह है कि आप बैठकर ही भाषण दें।

स्वामीजी:

(दर्शकों को संबोधित करते हुए) पवित्र पुस्तक के बिना कोई भी धर्म समय की कसौटी पर खरा नहीं उतर सकता। रोमन, यूनानी और अन्य लोगों के धर्मों को देखें। यद्यपि उनके धर्म ज्ञान और अनुशासन पर आधारित थे, फिर भी वे लंबे समय तक जीवित नहीं रह सके, क्योंकि उनके पास कोई पवित्र पुस्तक नहीं थी। लेकिन जब लोगों के पास अपने धर्म की पवित्र पुस्तकें होती हैं, तो भले ही वे यहूदियों की तरह भटक जाएँ, उनका धर्म या उनकी आस्था कभी नहीं मर सकती। हिंदुओं के साथ भी ऐसा ही है। वे उन मानव निर्मित विविध शिक्षाओं से बहुत अधिक गुमराह हैं, किन्तु जब तक उनका वेद जीवित है, आशा शेष है।

धर्म कर्मकांडों से परे आत्म-साक्षात्कार है और जो इसे आचरण में ला सकता है, वही सच्चा मानव है। कर्म के बिना धार्मिक अनुष्ठानों का कोई महत्त्व नहीं है। एक आदमी जो कुछ करता है, जो कुछ भी करता है। भले ही वह अपराध कर सकता है, उस आदमी से बेहतर है जो कुछ नहीं करता या कुछ भी नहीं करता, क्योंकि आलसी और कर्तव्यहीन मनुष्य एक सूखे पेड़ या बैल से अलग नहीं है।

साथी मनुष्यों की भलाई के लिए कार्य करें। मनुष्य के अच्छे कर्म तीन श्रेणियों में विभाजित हैं—पहला है भिक्षा देना, भौतिक शरीर को भोजन और कपड़े से मदद करना; दूसरा है—प्रशिक्षण और ज्ञान देना। जैसे—मानव विद्यालय में पढ़ाना; और तीसरा है—मानव आत्मा को ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखाना। यह अंतिम श्रेणी सबसे महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानवान लोगों का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि वे आत्मा के उपदेशक हैं।

शिक्षा प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है। सभी सक्षम मनुष्य अपने साथियों को प्रबुद्ध करने और उनकी मदद करने आगे आएँ। जो लोग स्कूल जाने का ख़र्च उठा सकते हैं, उन्हें बड़े पैमाने पर सीखने की सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिएँ, किन्तु जो सीखने नहीं जा सकते, उन्हें कम से कम वर्णमाला सीखनी चाहिए। उन्होंने अच्छा काम किया है और उनकी सराहना होनी चाहिए और आशीर्वाद मिलना चाहिए। भारत में अब हमारा काम लोगों की आँखें खोलना है। दुनिया के सभी मनुष्य एक हैं। किसी को भी नीची जाति के हिंदू के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वेद कहते हैं कि हमें लोगों को सत्य का उपदेश करना चाहिए। इसलिए मैंने दुनिया भर में यात्रा की और प्रचार किया।

 

(स्वामीजी की तबियत बिगड़ने लगती है और वे मौन हो जाते हैं। सर हेनरी उठ खड़े होते हैं और स्वामीजी के व्याख्यान की प्रशंसा करते हैं)

 

दृश्य 56


(बेलूर मठ। स्वामीजी अपने कमरे में आते हैं जहाँ कई मोटे ग्रंथ रखे हैं।)

 

स्वामीजी:

(स्वगत) शिलांग में लगभग 20-25 दिन रहने के बाद मेरा स्वास्थ्य सुधरने के बजाय और अधिक बिगड़ गया। अंतत: 12 मई, 1901 की सुबह मैं बेलूर मठ लौट आया। मुझे ज्ञात है कि अब मैं अधिक समय नहीं रहूँगा। मैंने मठ में जीवन के कुछ नियम-अनुशासन बना दिए हैं। जैसा गुरुदेव चाहते थे, ठीक वैसी ही व्यवस्था है। (तुष्टि का भाव) सुबह उठकर, संन्यासियों और शिष्यों को जगाना, ध्यान का अभ्यास करवाना; उनके लिए कक्षाएँ आयोजित करना, बग़ीचा और पशु-पक्षी—सभी के लिए कार्य करना आनंद देता है। (पुस्तकों के पास रुककर) एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के नए संस्करण का ग्यारहवाँ संस्करण ही पढ़ना शेष है। इसे भी पढ़ ही डालूँ।

 

(आगे बढ़कर मोटी पुस्तक उठाते हैं और पढ़ना शुरू करते हैं। वे पन्ने पलटते जाते हैं। दृष्टि पुस्तक पर ही टिकी होती है। एक शिष्य का प्रवेश)

 

शिष्य:

(उस मोटी पुस्तक को देखते हुए, आश्चर्य से) अगर कोई संपूर्ण जीवन भी इसे पढ़ता रहे तो भी इसे समझ पाना कठिन है।

स्वामीजी:

(उसकी ओर देखकर, मुस्कुराते हुए) ऐसा कैसे? मैं इसके दस खण्ड पढ़ चुका हूँ। तुम जो भी पछना चाहो, पूछ सकते हो।

 

(शिष्य मोटी पुस्तक का पन्ना पलटते हुए बीच-बीच से प्रश्न पूछ रहा है और स्वामीजी सभी के सही उत्तर बताते जा रहे हैं। दर्शकों तक संवाद की ध्वनि नहीं पहुँचती शिष्य चकित होता जाता है)

 

शिष्य:

कोई व्यक्ति इस तरह कैसे याद रख सकता हैं! यह मानवीय शक्ति से बाहर की बात है।

स्वामीजी:

ऐसा एकाग्रता से सम्भव है और एकाग्रता तभी आती है जब हम पवित्र जीवन जीएँ। 


(शिष्य स्वामीजी को देखता हैं। स्वामीजी शांत हैं, मुस्कुरा रहे हैं। ) 
फेड आउट 
फेड इन 
(शाम का समय। स्वामीजी गुरुभाई प्रेमानंद के साथ मठ के मैदान में घूमते हुए एक जगह रुक जाते हैं।)

 

स्वामीजी:

(स्वगत) आज 1 जुलाई 1902 हैं। मेरी मृत्यु निकट है। (प्रेमानंद को इशारे से मैदान का एक हिस्सा दिखाते हुए) बाबूराम! मेरा अंतिम संस्कार इसी जगह पर करना।

प्रेमानंद:

(उन्हें देखते हुए) परिहास कर रहे हो? तुम्हारा स्वास्थ्य पहले से बेहतर है। कर्म के प्रति सदा की तरह ही समर्पित और व्यस्त हो। फिर ऐसे परिहास का क्या औचित्य है?

 

(प्रेमानंद को भावुक होते देखकर स्वामीजी मुस्कुरा देते हैं। दोनों वैसे ही टहलते रहते हैं)

 

दृश्य 57


4 जुलाई 1902। सुबह का समय। समयावधि का संकेत दिया जाना आवश्यक है। स्वामीजी अकेले अपने कमरे में तीन घंटे ध्यान लगाते हैं। फिर, काली माँ का सुंदर भजन गाते हैं—

 

काली माता
जागो माँ कुलकुण्डलिनी, तुमि ब्रह्मानन्दस्वरूपिणी,

तुमि नित्यानन्दस्वरूपिणी प्रसुप्त्-भुजगाकारा आधारपद्मवासिनी
(२)

त्रिकोणे ज्वले कृशानु, तापिता होइलो तनु, मूलाधार त्यज शिवे स्वयंभू-शिव-वेष्टिनी
गच्छ सुषुम्ना नाड़ी पथ, स्वाधिष्ठाने होओ उदित, मणिपुर अनाहत विशुद्धाज्ञा संचारिणी
शिरसि सहस्रदले, पर शिवेते मिले, क्रीड़ा करो कौतूहले, सच्चिदानन्ददायिनी! (भैरवी एकताला)

 

(गाते-गाते स्वामीजी भाव विभोर हो जाते हैं। कुछ देर खोए-से बैठे रहते हैं) 
फेड आउट 
फेड इन 


(दिन का समय। ब्रह्मचारी पुस्तक के साथ प्रवेश करते हैं। स्वामीजी ब्रह्मचारियों को संस्कृत व्याकरण पढ़ा रहे हैं। घंटे की ध्वनि। शाम का समय। सभी शिष्य उठकर प्रणाम करके जाने लगते हैं। प्रेमानंद का प्रवेश। स्वामीजी साथी प्रेमानंद के साथ सैर पर निकलते हैं। वापसी में स्वामीजी संन्यासियों से बातचीत करते हैं। संन्यासी आते-जाते हैं। शाम ढल चुकी है। आरती का समय होता है। घंटी और शंख की पार्श्व ध्वनि।)

 

स्वामीजी:

बाबूराम! आरती आरंभ हो गई है। तुम भी जाओ। मैं कमरे में जाता हूँ।

 

दृश्य 58


कमरे का दृश्य। मद्धम रोशनी।

 

स्वामीजी:

(स्वगत) मेरा कार्य पूर्ण हुआ। प्रस्थान का समय निकट है।

 

(स्वामीजी ध्यान करने बैठ जाते हैं। ध्यान में लीन। घड़ीघंटे द्वारा रात्रि 8 बजने का संकेत। एक शिष्य का प्रवेश।)

 

स्वामीजी:

ब्रजेन्द्र! मेरे सिर पर ज़रा पंखा झल दे तो।

 

(स्वामीजी बिस्तर पर लेट जाते हैं। वैसे ही जैसे बुद्ध एक करवट लेटे थे। घड़ीघंटे द्वारा रात्रि 9 बजने का संकेत।)

(स्वामीजी को सोया जानकर वह शिष्य पंखा छोड़कर उनके तलवे सहलाने लगता है। अचानक स्वामीजी के हाथ में कम्पन होता है और वे शांत हो जाते हैं। शिष्य को कुछ अलग-सा महसूस होता है, वह उठकर बाहर की ओर भागता हैं। मंच से बाहर। कुछ संन्यासियों सहित ब्रजेन्द्र का प्रवेश। सभी आ-आकर कर स्वामीजी के बिस्तर के पास चारों ओर खड़े होते जाते हैं। दर्शक को अब स्वामीजी नहीं दिखते)

 

एक संन्यासी:

(शांत स्वर में) स्वामीजी निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें गुरुदेव से यह वर मिला था कि अपने कार्य पूर्ण करने के पश्चात् वे उससे भी ऊपर की अवस्था प्राप्त करेंगे। और यह उनके संज्ञान में होगा। स्वामीजी ने आज का दिन चुना। रात्रि 9 बजकर कुछ मिनट हुए हैं। स्वामीजी चिर समाधि में जाकर परब्रह्म में विलीन हो गए हैं। किन्तु उनके विचार – उनके स्वर वायुमंडल में गूँज रहे हैं . . . ‘उठो! जागो! और लक्ष्य-प्राप्ति से पहले मत रुको! हमें उनके बताए रास्ते पर चलते हुए विश्व को प्रेम और सद्भाव की भेंट देनी है . . .’

 

(सभी हाथ जोड़े खड़े हैं। वे दर्शक की ओर आधे मुड़ जाते हैं। सामने प्रकाश केंद्र में खड़े, मुस्कुराते स्वामी विवेकानंद दिखाई देते हैं)

 

नेपथ्य से स्वामीजी की ध्वनि:

 

तुम प्रभु की संतान, अमर आनंद के हिस्सेदार, पवित्र और पूर्ण हो। ऐ पृथ्वीवासी, ईश्वरस्वरूप भाइयो! तुम भला पापी? मनुष्य को पापी कहना पाप है; यह कथन मानवस्वरूप पर एक लांछन है। ऐ सिंहो! आओ और अपने लिए भेड़-बकरी होने का भ्रम दूर कर दो। तुम अमर आत्मा, शुद्ध-बुद्ध मुक्त स्वभाव, शाश्वत और मंगलमय हो। तुम जड़ नहीं हो, तुम शरीर नहीं हो; जड़ तुम्हारा ग़ुलाम है, तुम उसके ग़ुलाम नहीं।

जो अपने आप पर विश्वास नहीं करता, वह नास्तिक है। विश्वास, विश्वास, विश्वास—अपने आप पर विश्वास, ईश्वर पर विश्वास—यहीं महानता का रहस्य है। यदि तुम अपने आप पर विश्वास नहीं करते तो तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती। अपने आप पर विश्वास करो, उस पर स्थिर रहो और शक्तिशाली बनो।

यदि मानवजाति के आज तक के इतिहास में महान पुरुषों और स्त्रियों के जीवन में सबसे प्रवर्तक शक्ति कोई है तो वह आत्मविश्वास ही है। जन्म से ही यह विश्वास रहने के कारण वे महान होने के लिए ही पैदा हुए हैं, वे महान बने।

संसार को यदि किसी एक धर्म की शिक्षा देनी चाहिए तो वह है—निर्भीकता। इस ऐहिक जगत और आध्यात्मिक जगत में भय ही पाप तथा पतन का कारण है। अपनी स्नायु शक्तिशाली बनाओ। हम लोहे की मांसपेशियाँ और फ़ौलाद की स्नायु चाहते है। मेरे तरुण मित्रो! शक्तिशाली बनो। मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्ययन की अपेक्षा फ़ुटबाल के द्वारा स्वर्ग के अधिक समीप पहुँच सकोगे। तुम्हारी स्नायु और मांसपेशियाँ अधिक मज़बूत होने पर तुम गीता अच्छी तरह समझ सकोगे। तुम अपने शरीर में शक्तिशाली रक्त प्रवाहित होने पर श्रीकृष्ण के तेजस्वी गुणों और उनकी अपार शक्ति को अधिक समझ सकोगे।

इच्छाशक्ति सबसे बलवती है। इसके सामने हर एक वस्तु झुक सकती है।

शुद्ध बनना और दूसरों की भलाई करना ही सब उपासनाओं का सार है। जो ग़रीबों, निर्बलों और पीड़ितों में शिव को देखता है, वही वास्तव में शिव का उपासक है। पहले रोटी और फिर धर्म। किसी भी मतवाद से भूख की ज्वाला शांत नहीं होती।

मैं उस धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो विधवा के आँसूँ पोंछने या अनाथों को रोटी देने में असमर्थ है।

मुझे मुक्ति या भक्ति की परवाह नहीं हैं। मैं सैंकड़ों-हज़ारों नरक में ही क्यों न जाऊँ, बसंत की तरह मौन दूसरों की सेवा करना ही मेरा धर्म है। श्रेष्ठतम जीवन का पूर्ण प्रकाश है—आत्मत्याग। . . . आओ, मनुष्य बनो। अपनी संकीर्णता से बाहर आओ और अपना दृष्टिकोण व्यापक बनाओ। देखो, दूसरे देश किस तरह आगे बढ़ रहे हैं। क्या तुम मनुष्य से प्रेम करते हो? क्या तुम अपने देश से प्रेम करते हो? तो आओ, हम उच्चतर तथा श्रेष्ठतर वस्तुओं के लिए प्राणपण से यत्न करें।

सब प्राणियों के प्रति करुणा रखो। जो दुःख में हैं, उन पर दया करो। सबसे प्रेम करो। हर एक में परमात्मा है।

 

(शिष्यों द्वारा जयकारा। बैकग्राउंड म्यूज़िक के साथ प्रकाश मंद . . .) 


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