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अनाथ पत्ता

मैं हूँ 
शाख- विहीन 
एक अनाथ पत्ता!
बेबुनियाद --–अस्तित्वहीन।
कल तक,
मैं था 
निश्चिंत, प्रमुदित 
पेड़ की शाख से जुड़ा 
जीवन–रस पाता हुआ;
कल तक,
समझ ना सका महत्व
जड़ से जुड़ाव का;
वंश के पोषण का, 
विद्रोह की आँधी चली 
और मैं,
दिशाहीन!
प्रतिकूल दशा में 
क्षत-विक्षत पड़ा हूँ 
भूमि पर 
और कोई 
देखता तक नहीं।

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