अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रिय मित्रो,

पिछले सप्ताह के मध्य में भारत से कैनेडा लौट आया। एक महीना कैसे बीत गया- पता ही नहीं चला। बहुत ही सुखद अनुभव रहा भारत यात्रा और भ्रमण का। अंत के दिनों में कोरोना वायरस की आपदा से मन कुछ विचलित अवश्य था। इस संपादकीय में मैं दो विषाणुओं की चर्चा करना चाहता हूँ। एक विषाणु मानव का नाश करता है तो दूसरा साहित्य का।

सारा विश्व इस समय कोरोना वायरस से उत्पन्न आपदा से निपटने का प्रयास कर रहा है। इस वायरस ने समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभावित किया है और कब तक करता रहेगा, इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। सदियों पहले जब प्लेग फैलती थी तो वह एक क्षेत्र तक सीमित रहती थी क्योंकि यातायात के साधन इतने नहीं थे और जो थे भी उनकी गति और उनकी सीमा सीमित थी। अज्ञान के कारण समस्याजनित अंधविश्वास निदान निर्धारित करते थे। प्रभावित गाँव को अग्नि के हवाले कर देना और बन्दरगाह में खड़े जलपोतों को आग लगा कर नष्ट कर देना ही पर्याप्त समझ लिया जाता था। परन्तु वर्तमान काल में दुनिया बहुत छोटी हो चुकी है। व्यवसायिक यातायात इतना बढ़ गया है कि हमें स्वीकार करना होगा कि देशों की सीमाएँ ऐसे संक्रामक रोगों के लिए अर्थहीन हैं। विश्वग्राम का यह कृष्ण पक्ष है। अधिकतर देश अपने द्वार बंद करने पर तुले हैं। यह प्रयास संक्रमण को सीमित करने का मात्र प्रयास है - उपचार नहीं। इससे यह विषाणु समाप्त होने वाला नहीं है। 

दूसरा विषाणु साहित्यिक है। कल मुझे एक मित्र का फोन आया कि उनके फोन पर एक ऐप थी जिसे उन्होंने जब पहली बार ऑन किया तो उसमें हिन्दी कहानियों की ऑडियो प्रस्तुति थी। आश्चर्य की बात थी कि मेरी पाँच-छह कहानियाँ रिकॉर्ड करके वितरित की गई थीं और मुझे इसकी सूचना ही नहीं थी। यही हाल मेरी मित्र की रचनाओं का भी था। उनकी कहानियाँ और कविताएँ रिकॉर्ड करके वितरित की जा रही थीं। अगर वह ऐप को प्ले न करतीं तो उन्हें या मुझे कभी पता भी नहीं चलता कि मेरी रचनाएँ मेरी जानकारी या अनुमति के बिना इलैक्ट्रानिक माध्यम में वितरित की जा रही हैं। मैं अभी तक उस ऐप को खोज नहीं पाया हूँ क्योंकि यह ऐप गूगल प्ले पर अलग नाम से उपलब्ध है और आपके मोबाइल पर किसी दूसरे नाम से दिखाई देती है।

मैं अभी इस ऐप का नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहता। 

अगर हम दोनों की रचनाओं का अनधिकृत वितरण हो रहा है तो हो सकता है कि इस ऐप द्वारा अन्य वितरित रचनाएँ भी अनधिकृत ही हों। हम हिन्दी के लेखक वैसे भी बिना पारिश्रमिक ही रचनाओं को प्रकाशित करवाने के अभ्यस्त हो चुके हैं- परन्तु कम से कम कोई प्रकाशन से पहले हमसे पूछ तो ले! 

मेरा मन विचलित इसलिए है कि हर दिशा से हिन्दी के लेखक का शोषण हो रहा है और अब शोषण का एक और आयाम सामने आ गया। क्या हमारा अस्तित्व इतना पारदर्शी है कि प्रकाशकों को हमारी रचनाएँ दिखती हैं पर उन रचनाओं के लेखक नहीं। हो सकता है प्रिंट मीडिया के प्रकाशकों की मिन्नतें करके और पैसे देकर पुस्तक प्रकाशित करवा कर, पुस्तक प्रकाशन का उत्सव मनाने वाले लेखक इस इलैक्ट्रानिक माध्यम के प्रकाशन पर आपत्ति न करें। शायद वह अपने आपको तसल्ली दे लें कि कम से कम बिना प्रयास के ही उनकी रचनाएँ अधिक लोगों तक पहुँच रही हैं।  प्रश्न यह है कि सैद्धांतिक रूप से ग़लत बात को हम स्वीकार क्यों करें? जब हम रचना के बाद "सर्वाधिकार सुरक्षित" लिखते हैं उसे न्यायलय भी मान्यता देता है। भारतीय क़ानून के बारे में तो नहीं जानता परन्तु कैनेडियन क़ानून के अनुसार रचनाकार का अधिकार सर्वोपरि रहता है।

अगर हमें इस परिस्थिति को बदलना है, लेखकों के शोषण को समाप्त करना है तो पहले हमें यानी लेखकों को स्वाभिमान को पुनः जागृति करना होगा। मत भूलें कि व्यवसायिक प्रकाशक आपके लेखन से कमाई करता है। अगर लेखक न हो तो प्रकाशक हो ही नहीं सकता। परन्तु हिन्दी साहित्य प्रकाशन में उल्टी गंगा बह रही है। आम विचारधारा बन चुकी है कि अगर आपने साहित्य जगत में अपनी पहचान बनानी है तो आपको अमुक प्रकाशक से पुस्तक प्रकाशित करवानी पड़ेगी। लेखकों को प्रलोभन सम्मान प्राप्ति का है और प्रकाशक इससे भली-भाँति परिचित है। मान्यता प्राप्त हिन्दी साहित्यिक संस्थान जिनके सम्मान कुछ अर्थपूर्ण हैं वह इन्हीं प्रकाशकों के हाथ में हैं। मत भूलें साहित्य का सृजन आप कर रहे हैं - प्रकाशक नहीं। अगर आप अच्छा लिखेंगे तो पाठक स्वतः आपके आसपास जुटेंगे। इस परिस्थिति को बदलने के लिए केवल आपको सम्मानित होने के लोभ को त्यागना होगा।

एक-दो अन्य व्यवसायिक वेबसाइट्स है जो कि स्व-प्रकाशन पर निर्भर करती हैं। यानी उन्होंने प्रोग्राम बना दिया और आप अपनी रचना टाईप करके वहाँ पेस्ट कर दें और वह रचना सीधी प्रकाशित हो जाती है। आपकी रचना उनकी मेलिंग लिस्ट या स्बस्क्रिपशन लिस्ट द्वारा हज़ारों पाठकों तक पहुँच जाती है। वेबसाइट का इसमें कोई परिश्रम नहीं लगता। वह कुछ लेखकों को काग़ज़ प्रिंट करके सम्मानित कर देती है या सर्टिफ़िकेट भी दे देती है। हिन्दी का भोला-भाला लेखक यह भी नहीं पूछता कि - इस सम्मान की चयन प्रक्रिया के निर्णायक कौन थे? या चयन प्रक्रिया क्या थी? वह तो बस सम्मान से सम्मानित होकर फूला नहीं समाता। हिन्दी के लेखक का ध्यान ऐसी वेबसाइट के व्यवसायिक पक्ष की ओर जाता ही नहीं। आपसे आग्रह कर रहा हूँ कि इन वेबसाइट्स के बारे में गूगल पर सर्च डाल कर बिज़नेस सेक्शन के समाचार पढ़ें। यह फलते-फूलते बिज़नेस हैं। स्टॉक मार्केट पर करोड़ों रुपए का निवेश इकट्ठा कर रहे हैं। आप हैरान हो जाएँगे कि यह करोड़ों रुपये के निवेश को आकृषित करने का कारण आपकी लाखों रचनाएँ और आप जैसे हज़ारों लेखक हैं। हालाँकि यह दावा करते हैं कि अभी तक इन्होंने आपकी रचनाओं को घाटे में ही प्रकाशित किया है - जो कि व्यवसायिक दृष्टिकोण से सही है परन्तु जो निवेश उन्हें मार्केट से मिला उससे यह अपने लाखों रुपये के वेतन निकाल रहे हैं। और बेचारा हिन्दी का लेखक एक प्रशस्ति पत्र पाकर ख़ुश है।

साहित्य कुञ्ज में मेरा उद्देश्य केवल अच्छे साहित्य को संपादन के बाद पाठकों तक पहुँचाने का रहा है। गूगल के विज्ञापन भी पिछले वर्ष के मध्य से लगाने आरम्भ किए हैं। उससे पहले आपकी रचनाओं को 2004 से अपनी जेब से पैसे खर्च करके प्रकाशित करता आ रहा था। अभी भी गूगल विज्ञापन के माध्यम से पिछले छह-सात महीनों में केवल 57 डॉलर की आय हुई है जबकि वेबसाइट को जीवित रखने के लिए लगभग 160 डॉलर वर्ष के लगते हैं। नई वेबसाइट को बनवाने के लिए अभी तक लगभग 1000 डॉलर खर्च कर चुका हूँ। नई वेबसाईट के विस्तार को देखते हुए इसको बनवाने की लागत वास्तव में बहुत कम है। इसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ विपिन कुमार सिंह (प्रोग्रामर) का जो निःशुल्क वेबसाईट बनाने के लिए तैयार था; परन्तु कम से कम मैं किसी का शोषण नहीं कर सकता। शायद इसलिए क्योंकि मैं स्वयं शोषित लेखक हूँ। 

- सुमन कुमार घई

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

सम्पादकीय (पुराने अंक)

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015