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ISSN 2292-9754

वर्ष: 16, अंक 169, नवम्बर द्वितीय अंक, 2020

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संपादकीय

पाठक की रुचि ही महत्वपूर्ण
सुमन कुमार घई

प्रिय मित्रो, आप सभी साहित्य प्रेमियों को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।  पिछले सप्ताह से लघुकथा के विषय पर सोच रहा हूँ। इसकी परिभाषाएँ पढ़ते हुए इस विधा को समझने का प्रयास कर रहा हूँ। आज इस विषय को लेकर मन में प्रश्न क्यों खड़े हो रहे हैं – समझने का प्रयास कर रहा हूँ। संभवतः यह मेरी मानसिक प्रवृत्ति है कि मैं साहित्यिक विधाओं की परिभाषाओं द्वारा स्थापित सीमा रेखाओं में सुराख़ों पर केन्द्रित हो जाता हूँ। जो मैं कर रहा हूँ यह कोई नई या अनूठी विचारधारा नहीं है। युगों से यह होता आया है। अगर ऐसा न होता तो  साहित्य कभी विकसित ही नहीं हुआ...

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फीजी का हिन्दी साहित्य

साहित्यकुञ्ज पत्रिका ’फीजी का हिन्दी साहित्य’ विषय पर नवंबर में विशेषांक प्रकाशित करने वाली हैं। उद्देश्य यह है कि फीजी की सांस्कृतिक और हिन्दी की साहित्यिक संपदा पाठकों के सामने रख सकें। हमारा फीजी के लेखकों और फीजी से जुड़े सभी लोगों से सादर आग्रह है कि आप अपनी कविताएँ, कहानियाँ, साहित्यिक लेख, संस्मरण, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आदि साहित्यकुंज पत्रिका के लिए भेजियेगा। साहित्यकुंज पत्रिका के संपादक हैं: सुमन कुमार घई। इस विशेषांक की संपादक हैं: डॉ. शैलजा सक्सेना; सह-संपादक: सुभाषिणी लता कुमार (लौटुका, फीजी) ये रचनाएँ अक्तूबर 18, 2020 तक अवश्य भेज दीजिए। कृपया इन रचनाओं को आप इन ई-मेल पतों पर भेजिए: shailjasaksena@gmail.com sampadak@sahityakunj.net

विशेषांक

दलित साहित्य

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विशेषांक सूची

डॉ. शैलजा सक्सेना (विशेषांक संपादक)

साहित्य संरक्षण देता है, वह मनुष्य की चेतना और उसके विवेक को, उसके मानवीय मूल्यों को संरक्षित करता है। इसी से युगों पहले लिखा गया साहित्य भी प्रासंगिक हो जाता है। जब-जब मूल्यों का हनन होता है तब उन मूल्यों के हननकर्ताओं पर साहित्य अपने आक्रोश की तलवार तानता है, अपने साहस की दीवार पर खड़ा होकर उन्हें.. आगे पढ़ें

(विशेषांक सह-संपादक)

साहित्य कुञ्ज के इस अंक में

विडियोज़

कहानियाँ

अपना घर
|

लतिका और मालती एक ही महाविद्यालय में शिक्षिका…

इंतज़ाम
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आज फिर सेठ जी के सीने में बहुत ज़्यादा दर्द…

एक कलाकार की मौत
|

पता नहीं क्यों आज सुबह से ही मैं अपने हर…

छठी 
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(१)   गाड़ी अभी बालामऊ में ही थी जब…

झुमका
|

तुम्हें याद है बचपन में कैसे तुम मुझे अपनी…

फटी-पुरानी चप्पल
|

"यह फटी-पुरानी चप्पल क्यों रखी है,…

मस्ती का दिन  
|

रविवार को पापा दफ़्तर नहीं जाते। मुझे पकड़कर…

रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
|

अस्पताल में मोहन ने मास्टर जी के बिस्तर…

फ़ेस बुक-फ़ेक बुक 
|

वह बस से उतरी। रात के दो बजे थे और इस अनजान…

हास्य/व्यंग्य

आलेख

व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
|

व्यक्तित्व का अर्थ व्यक्ति के बाह्य रूप…

समीक्षा

देश-दुनिया के 'सवाल' और पत्रकारिता के 'सरोकार'
|

समीक्षित पुस्तक : सवाल और सरोकार  लेखक : ऋषभदेव शर्मा  प्रकाशक…

मुट्ठी भर आकाश की खोज में: ‘रोशनी आधी अधूरी सी’ की शुचि 
|

समीक्ष्य पुस्तक: रोशनी आधी अधूरी सी लेखक: इला प्रसाद प्रकाशक: Bhavna Prakashan…

संस्मरण

कविताएँ

अपराजेय समर
|

ये जो चल रहा है मस्तिष्क और हृदय के मध्य…

इन्हें मात्र मज़दूर मत समझो
|

वो चुप है पर, उनकी आँखों में धधकता लावा…

उपेक्षा 
|

अपनों की उपेक्षा में फिर भी रहती है …

उड़ान भरना चाहता हूँ
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आकाश में उड़ने अनन्त से जुड़ने बाधाओं को तोड़ने…

एक कहानी सुन
|

(लोरी)   एक कहानी सुन, ओ मुन्ने! एक…

एक ख़्वाब
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देखा था एक ख़्वाब जो मेरा नहीं था। बनना था…

काश (राजीव डोगरा ’विमल’)
|

काश! मेरी ज़ुबान की कड़वाहट के पीछे तुम मेरे…

कुछ तो हो
|

जीत नहीं तो हार ही सही, सुख नहीं तो दुख…

क्या वह आएगा
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फिर से बिछी है  चौपड़ की बिसात वह कौन…

जाने क्यों (राजीव डोगरा ’विमल’)
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न जाने क्यों खो सा गया है कहीं मेरा मन।…

जीवन : लड़कियों का
|

प्रतिदिन ही अख़बार में ख़बर बन रही हैं लड़कियाँ…

झूमका सँभाल गोरी
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पवित्र गंगा सी  पावन तुम्हें मिला है…

तुम्हें अगर फ़ुर्सत हो थोड़ी
|

तुम्हें अगर फ़ुर्सत हो थोड़ी,  मैं भी…

दीये की पाती
|

टिमटिमाते दीये से पूछा  महँगाई का हाल…

नगर
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नगर में उगते नहीं हैं चौड़े रिश्तेवाले हरे…

नाटक था क्या?
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नाटक था क्या? देर रात तक बातें करना, छोटी-छोटी…

नारी (राजनन्दन सिंह)
|

नारी  किसी प्रतिस्पर्धा का नाम नहीं…

प्रेम (संजय वर्मा ’दृष्टि’)
|

लहराती ज़ुल्फ़ों में  ढंक जाती तुम्हारे…

फिर मुझे तेरा ख़याल आया
|

मैंने जब भी जाम उठाया!  मुझे  तेरा…

माँ (अनुपमा रस्तोगी)
|

माँ, मैं माँ बनकर तुम्हें समझ पाई तुम्हारे…

मानव मशीन है
|

भूखे और प्यासे से दूरी बनाता है फाँका भर…

मेरे पिया
|

मेरे प्रत्येक व्रत आपके नाम से, मेरा सम्पूर्ण…

याद रखना
|

उठूँगा एक दिन तूफ़ान बन कर मुझे याद रखना।…

रात (संजय वर्मा ’दृष्टि’)
|

चमकते जुगनू लगते चराग़ों से कुछ फूल खिलकर…

रेल का सफ़र
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"यात्रीगण कृपया ध्यान दें" यही…

वे दिन बीत गए
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जो हँसने-गाने के दिन थे, इस जीवन के, वे…

शामों का क्या!!
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अक़्सर ढल जाती हैं शामें! इरादतन, मैंने हज़ार…

हम औरतें
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हम औरतें हृदय में लज्जा और अपमान का दर्द…

हम पल-पल चुक रहे हैं
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हम पल-पल चुक रहे हैं शिखर से गिर रहे हैं,…

हर गीत में
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भूलकर मतभेद को, मिलाप का पैग़ाम दूँ। अहंकार…

हाँ! वह लड़की!!  
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पानी की दो भरी बाल्टियाँ, लेकर हाथों में,…

ज़िंदगी बिकती है
|

वे सारी की सारी आवश्यकताएँ जिसके बिना ज़िंदगी…

शायरी

अगर उन के इशारे इस क़दर मुबहम नहीं होंगे
|

अगर उन के इशारे इस क़दर मुबहम नहीं होंगे …

तेरी तस्वीर
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मैंने अब तक नहीं देखा है तुझे जान-ए-बहार…

नहीं मिला कहीं भी कुछ अगरचे दर-ब-दर गए
|

नहीं मिला कहीं भी कुछ अगरचे दर-ब-दर गए …

साहित्य के रंग शैलजा के संग

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर हरीश नवल जी से एक मुलाक़ात

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर हरीश नवल जी से एक मुलाक़ात SAHITYA KE RANG-SHAILJA KE SANG

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