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ISSN 2292-9754

वर्ष: 16, अंक 167, अक्टूबर द्वितीय अंक, 2020

पुस्तक बाज़ार

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संपादकीय

साहित्य का यक्ष प्रश्न – आदर्श का आदर्श क्या है?
सुमन कुमार घई

प्रिय मित्रो, कुछ सप्ताह पहले साहित्य कुञ्ज का व्हाट्स ऐप समूह आरम्भ किया था। इस समूह को आरम्भ करने से पहले जो परिकल्पना की थी, वह फलित होती दिखाई दे रही है। समूह के प्रतिभागी अपनी साहित्यिक रचनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं। उन रचनाओं पर चर्चा भी हो रही है। जैसा कि एक बार मैंने लिखा था कि यह समूह केवल वाह-वाह का मंच नहीं है – वही हो रहा है। अगर रचना अच्छी है तो केवल वाह-वाह या इमोजी नहीं चिपकाई जा रही बल्कि पाठक टिप्पणियाँ भी कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, शब्दों के सही स्वरूप, शब्दों की व्युत्पत्ति से लेकर उनके सही प्रयोग तक की...

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फीजी का हिन्दी साहित्य

साहित्यकुञ्ज पत्रिका ’फीजी का हिन्दी साहित्य’ विषय पर नवंबर में विशेषांक प्रकाशित करने वाली हैं। उद्देश्य यह है कि फीजी की सांस्कृतिक और हिन्दी की साहित्यिक संपदा पाठकों के सामने रख सकें। हमारा फीजी के लेखकों और फीजी से जुड़े सभी लोगों से सादर आग्रह है कि आप अपनी कविताएँ, कहानियाँ, साहित्यिक लेख, संस्मरण, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आदि साहित्यकुंज पत्रिका के लिए भेजियेगा। साहित्यकुंज पत्रिका के संपादक हैं: सुमन कुमार घई। इस विशेषांक की संपादक हैं: डॉ. शैलजा सक्सेना; सह-संपादक: सुभाषिणी लता कुमार (लौटुका, फीजी) ये रचनाएँ अक्तूबर 18, 2020 तक अवश्य भेज दीजिए। कृपया इन रचनाओं को आप इन ई-मेल पतों पर भेजिए: shailjasaksena@gmail.com sampadak@sahityakunj.net

विशेषांक

दलित साहित्य

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विशेषांक सूची

डॉ. शैलजा सक्सेना (विशेषांक संपादक)

साहित्य संरक्षण देता है, वह मनुष्य की चेतना और उसके विवेक को, उसके मानवीय मूल्यों को संरक्षित करता है। इसी से युगों पहले लिखा गया साहित्य भी प्रासंगिक हो जाता है। जब-जब मूल्यों का हनन होता है तब उन मूल्यों के हननकर्ताओं पर साहित्य अपने आक्रोश की तलवार तानता है, अपने साहस की दीवार पर खड़ा होकर उन्हें.. आगे पढ़ें

(विशेषांक सह-संपादक)

साहित्य कुञ्ज के इस अंक में

विडियोज़

कहानियाँ

अरक्षित
|

उनका घर इन-बिन वैसा ही रहा जैसा मैंने कल्पना…

आत्मविश्वास और पश्चाताप
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आत्मविश्वास और पश्चाताप में युद्ध होने लगा।…

एक बिलकुल अलग कहानी – 2
|

 मूल कहानी (अँग्रेज़ी): डॉ. नंदिनी साहू …

एक मैं एक वो
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हाँ वो वही थी, जिसे मैं पंद्रह साल से भुलाने…

तोरपा का साहसी क़दम
|

"चाचा जी, चाचा जी, चाइना में वुहान…

दाह
|

दरवाज़े पर कड़कदार खट-खट का जबाब दीना को देना…

धुआँ (राजीव कुमार)
|

भले ही कुछ लोगों ने  मज़ाक उड़ाया लेकिन…

पिताजी
|

रात के तीन बजे थे। कालबेल बजने की लगातार…

प्यादा
|

वह मेरा क़रीबी है । वह पिछले कुछ वर्षों में…

बलात्कार का जश्न
|

उत्तर प्रदेश के एक गाँव में बलात्कार की…

मरीचिका - 6
|

(मूल रचना:  विद्याभूषण श्रीरश्मि) धारावाहिक…

मुख्यमंत्री 
|

संत बद्रीनाथ कश्यप के लाखों अनुयायी थे।…

मौक़ापरस्त
|

आपको एक क़िस्सा सुनाना चाहता हूँ लेकिन क़िस्से…

ये दुनिया-वो दुनिया
|

वर्मा जी बहुत परेशान हैं। उनके छठे कहानी…

हास्य/व्यंग्य

फिर हैप्पी इंडिपेंडेंस डे
|

लीजिए, फिर एक और इंडिपेंडेंस डे का प्रोग्राम…

आलेख

समीक्षा

प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व)
|

समीक्ष्य पुस्तक: प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व) लेखक: अवधेश…

युवाओं की लाचारगी का यथार्थ चित्रण 
|

समीक्षित कृति: यारबाज़ (लघु उपन्यास) लेखक: विक्रम सिंह   प्रकाशक:…

वक़्त है फूलों की सेज, वक़्त है काँटों का ताज
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(प्रबोध कुमार गोविल की किताब ‘ज़बाने यार मनतुर्की’ की समीक्षा)…

हरी चरण प्रकाश जी कहानी 'नन्दू जिज्जी'पर संक्षिप्त टिप्पणी
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'नन्दू जिज्जी' कहानी पढ़कर राहत देने वाला अनुभव मिला। यह कहानी…

संस्मरण

पवनार आश्रम 
|

पवनार एक ऐतिहासिक गाँव है जो महाराष्ट्र…

भांडे में ही भेद है, पानी सबमें एक
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बस आकर रुकती तो जितने उसके अंदर चढ़ते उससे…

नाटक

आरती
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पहला दृश्य (किसी फ़्लाई ओवर के नीचे का अन्तिम,…

साक्षात्कार

स्वयंसिद्धा – ए मिशन विद ए विज़न - 2 
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आइये इस सिलसिलेवार सफ़र को अंजाम तक ले जाते…

कविताएँ

आगे बढ़ता चल
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लक्ष्य मन में ठान छोड़ दे मद-मान कर्म पथ…

आत्मनिर्भर भारत
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आत्मनिर्भर भारत  मिसाइल हो अपनी …

एक दीया उनके नाम 
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एक दीया उनके नाम  जो बेतरह बेवज़ह …

कान्हा! तुम्हारी स्मृति सताती है
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जब साँझ की प्रदीप्त बेला आती है प्रकृति…

कोटि नमन हे प्राणाधार
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कोटि नमन हे भारत तुमको कोटि नमन हे प्राणाधार…

कौन सा लोकतंत्र?
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निर्बल को बल मिले, निर्जल को जल मिले, गूँगे…

क्यूँ? (भव्य गोयल)
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जिसकी इच्छा के विरुद्ध, पेड़ से इक पत्ता…

गर इंसान नहीं माना तो
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गर इंसान नहीं माना तो जीवन के अब लाले हैं।…

चैतन्य महाप्रभु और विष्णुप्रिया
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रात्रि रास की बेला में  स्वामी आ बैठे…

जब से उम्र ढली है मेरी
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(वृद्धावस्था की व्यथा पर मेरा एक गीत) झूल…

तुम आये (शाश्वती पंडा)
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तुम आये, लेकिन बहुत देर कर दी आना ही था…

दिशा
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उदित होता हुआ नन्हा लाल सूरज एक दिशा की…

नदियाँ
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हज़ार-हज़ार दु:ख उठाकर जन्म लिया है मैंने…

पथ चल पथ चल
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पथ चल पथ चल होकर निडर आगे क्या होगा मत डर…

पहाड़
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चाहता था मैं भी जीना स्वच्छंद थी महत्वाकांक्षाएँ…

पेड़
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फूलों को मत तोड़ो छिन जायेगी मेरी ममता हरियाली…

बेटी घर की बगिया
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माँ के लिए पुत्र सम पुत्री दोनों होते हृदय…

माँ लोरी सुना
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माँ लोरी सुना, जिसमें, अखण्ड भारत का इतिहास…

मानव अस्तित्व
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कोरोना ने ज़िंदगी के कैनवास पर रंग दी है…

मेरा वजूद 
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तुम इस्तेमाल करते हो मैं इस्तेमाल होती हूँ…

मैं ढूँढ़ रही हूँ
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मैं ढूँढ़ रही हूँ उस अपने को, जो मेरे सामने…

मैं तो तेरे अंदर ही हूँ
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मुझे कहाँ खोज रहा, मैं तो तेरे अंदर ही हूँ।…

राष्ट्रपिता से संवाद 
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(महात्मा गाँधी के जन्म-दिवस पर एक भावपूर्ण…

लुटेरे
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लुटेरे कहीं सच्चे थे आज के कर्णधार झूठे…

लौट आओ बापू!
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लौट आओ बापू  पगडंडी से निशान …

वादा और आश्वासन 
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मैंने तो आश्वासन दिया था कोई वादा थोड़े…

वो माँ
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तुम भूल गए जब माँ ने गोदी में तुम्हें उठाया…

समस्या से घबरा नहीं
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समस्याओं से घबरा नहीं, ये वक़्त है जंग का।…

हवा
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मैं थी अल्हड़-अलमस्त विचरती थी स्वछंद फिरती…

शायरी

मुझे रास आई न दुनिया तुम्हारी
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ग़ज़ल- 122 122 122 122 अरकान- फ़ऊलुन फ़ऊलुन…

रहती है मंज़िल मेरी मुझसे आगे
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रहती है मंज़िल मेरी मुझसे आगे इक उलझन से…

हर किसी से न वास्ता रखना
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हर किसी से न वास्ता रखना ख़ास लोगों को ही…

साहित्य के रंग शैलजा के संग

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर हरीश नवल जी से एक मुलाक़ात

बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर हरीश नवल जी से एक मुलाक़ात SAHITYA KE RANG-SHAILJA KE SANG

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