माँ
काव्य साहित्य | कविता अमरेश सिंह भदौरिया26 Jan 2019
ज़िंदगी के एहसास में
ओ हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर
1.
दुनिया में नहीं
दूसरी कोई समता
सन्तान से पहले
जहाँ जन्म लेती ममता
औलाद में स्वयं
फौलाद भरती
टकराती तूफ़ानों से
चट्टान बनकर
ज़िंदगी के एहसास में
ओ हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर
2.
पन्नाधाय बनी कभी
बनी जीजाबाई
अंग्रेज़ों से लड़कर
कहलायी लक्ष्मीबाई
सामने पड़ा है कभी
राष्ट्रहित जब
उदर अंश को रख
लिया है पीठ पर
ज़िंदगी के एहसास में
ओ हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर
3.
प्रगति को जहाँ
रुकना पड़ा है
देवत्त्व को स्वयं
झुकना पड़ा है
सतीत्व को कसौटी पर
सती ने रखा जब
त्रिलोकी झूले हैं
पालने में पड़कर
ज़िंदगी के एहसास में
ओ हर वक़्त रहती
कभी सीख बनकर
कभी याद बनकर
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