बस छूट गई
कथा साहित्य | कहानी हेमन्त कुमार शर्मा1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
सरल भी नहीं था। बस में चढ़कर अपने अड्डे पर उतर जाना बड़ी कुशलता का काम है। जिसमें हर कोई निपुण नहीं। उन अकुशल लोगों में महेश भी एक था।
प्रतिदिन की भाँति वह लेट था। कार्यालय क्या समय पर पहुँच पाता। और ऊँचे अधिकारी की डाँट खानी पड़ी। यह कोई उसके लिए नई बात नहीं थी। और अधिकारी के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। जैसे चेरापुंजी में बारिश। लोग परिचित थे। बारिश परिचय की मोहताज नहीं थी।
शनिवार का दिन था। अगले दिन दफ़्तर में छुट्टी थी। घर की तरफ़ की बस पकड़नी थी। परन्तु अपनी मोटे शरीर, आलसी मन के कारण लोकल बस निकल गई। अब कोई बस गंतव्य तक जाने वाली नहीं थी। लोंग रूट की बसें आती थीं। वह बाईपास पर उतार देतीं। और बैठाती भी काफ़ी मान मनौव्वल के बाद।
बस तो मिल गई थी। सात आठ किलोमीटर का रास्ता था। जाने कैसे महेश की आँख लग गई। और उसका अड्डा निकल गया। आँख खुली जब कंडक्टर आवाज़ लगा कर सवारियों को उतरने के लिए कह रहा था।
महेश ने आँखें फिरा कर इधर-उधर देखा। सारी सवारियाँ उतर रही थीं। देखा मेन बस स्टैंड आ गया था। उसके घर से लगभग पचास किलोमीटर दूर।
‘इतनी दूर आ गया। रात भी हो गई है। अब . . .?’
यह सोच कर वह बस से उतरा। शुक्र था कि कोई टिकट चैकर नहीं आया और कंडक्टर ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया।
बहुत देर तक तो वह बस अड्डे पर रखे बैंच पर बैठा रहा। भूख भी लग गई थी। फोन द्वारा घर पर इत्तला भी कर दी थी। वापसी की बस का पूछ के वह फिर अपने बैंच पर विराजमान हो गया था।
पर कितनी देर बैठे-बैठे ऊँघता रहता। बैंच पर लेट भी नहीं सकता था। अन्य सवारियाँ आकर बैठ गई थीं। और भूख पेट पर दस्तक दे रही थी।
अभी सर्दी आरंभ भर थी। बस स्टैंड पर हवा चीरती हुई आ-जा रही थी। सुबह अनुज की माँ ने आधी बाज़ू का स्वैटर साथ ले जाने के लिए कहा था। पर शेख़ी के कारण और ‘दोपहरी में गर्मी हो जाती है’ का हवाला देकर वह मना कर आया था। पर अंदर तक ठिठुर रहा था।
सामने चाय का काउंटर था। उठने पर दोबारा बैंच मिलना कठिन था और अपने घर तक पहुँचना भी सुबह तक मुश्किल था। बस का रूट सुबह छह बजे था।
भूख को चकमा देने के लिए चाय और दो मट्ठी लेकर खड़े-खड़े चाय की चुस्कियाँ लेने लगा।
वहीं से रैन-बसेरे का पता जानकर वह सोने की व्यवस्था करने लगा। ऑटो करके भी घर तक जा सकता था। परन्तु जेब इसकी इजाज़त नहीं देती। फिर महीने के अन्तिम दिन चल रहे थे। प्राईवेट जॉब वाले को दस को तनख़्वाह मिले पन्द्रह को ख़त्म होने को भी आ जाती है। और यह तीस तारीख़ थी, भला . . .
बस स्टैंड के पिछली तरफ़ थोड़ी दूर जाने पर रैन-बसेरा था। शुल्क न के बराबर था। पर्ची कटा कर वह लेटने की जगह ढूँढ़ने लगा। बीड़ी का धुआँ और खाँसते कुछ चेहरे दिखाई दिये। मना करने पर झगड़ने पर आ जाते। कुछ लोग ताश पीट रहे थे। एक-आध दारू पीकर कर अंटशंट बक रहा थे।
एक बारी को तो मन हुआ कि वापस मुड़ जाए। लेकिन बस स्टैंड की ठंडी हवा से बच कर यहाँ आया था। कुछ घंटों की तो बात थी। जैसे-तैसे बिता लेगा। जगह देख कर लेट गया। वहाँ पर दरी बिछी हुई थी। ठंडी थी। पर कुछ देर लेटने पर गर्म हो गई।
इस सारी क़वायद में वह थक गया था। कब नींद ने आ दबोचा पता नहीं चला।
सुबह नींद टूटने पर देखा। उसका लंच बाक्स उसके पास नहीं था। वह घबरा उठा। पिछली जेब में हाथ मारा पर्स भी ग़ायब था। अब टिकट कैसे लेगा?
महेश ने वहाँ के कर्मचारी से बात की उसने पल्ला झाड़ लिया। पैसे अधिक नहीं थे। पर बस में तो टिकट लगेगी ही।
वरना कंडक्टर कहाँ मानने वाला था। चलो वह मान भी गया रास्ते में टिकट चैकर . . .
उसे विश्वास था कि उसकी क़िस्मत ख़राब थी। और आजकल तो कुछ ज़्यादा ही।
पर एक हौसला कर के उसने कंडक्टर से बात की। पहले तो उसने ग़ौर से ऊपर से नीचे तक देखा। फिर कहा, “ठीक है। चल पड़ना। कोई पूछे तो कह देना कि मेरे रिश्तेदार हो। डरने की कोई बात नहीं।”
बस चल पड़ी थी। जब तक घर नहीं पहुँच गया महेश, चैन नहीं पड़ा।
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