अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

देखते। हारे कौन? 

 

तरना है तारे कौन? 
दीया बुझा बारे कौन? 
 
उच्चासन पर पहुँच गया, 
फिर भी ग़रीब अब तक, 
माननीय को, 
ग़रीबी से उबारे कौन? 
 
इधर—
निर्धन की गीली लकड़ी, 
सूखा अँखियों के आँगन में। 
फिर उनसे ही वोट मिलेगी, 
शर्म नहीं आँखन में। 
चन्दा भी निर्धन से लेगा, 
लाज तजी माँगन में। 
उन गीली लकड़ियों पर, 
उन सूखे आँसुओं पर, 
देखते। हारे कौन? 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

उपलब्ध नहीं

उपलब्ध नहीं