अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

बारिश और हवा

 

बारिश को सलाम किया। न भी करता तो चल जाता। पर एक शिष्टाचार भी होता है। इसी के चलते अभिवादन कर दिया। कल्लू की झोंपड़ी पानी से रिसने लगी थी। ठंड भी बड़ी तीखी थी। 

खोमचे वाला आज काम पर नहीं जा सका। सो दिहाड़ी का कोई सवाल नहीं था। उसकी झुग्गी थोड़ी ठीक थी। कल के लिए आज रेहड़ी लगानी थी। पर . . .

मोनू का घर ही नहीं था। इधर-उधर से कूड़े से कुछ प्लास्टिक आदि इकट्ठा कर खाने पीने का बंदोबस्त कर लेता। पर बारिश। 

फ़ुटपाथ पर सो नहीं सकता था। हवा भी ज़ोरदार थी। किसी बन्द दुकान के बादरे में रात बिताई पर दिन . . .

टोनी कुत्ते के पैर में चोट लग गई थी। वह बारिश से बचता फिर रहा था। भीगे शरीर का क्या करे? 

बड़े साहब भी परेशान थे। कार्यालय से छुट्टी ले ली थी। चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “वाह! ऐसी ठंड बारिश ने नज़ारे दिला दिये।”

कहीं हिल स्टेशन पर घूमने की परिवार में चर्चा की। छुट्टी का आवेदन करने का मन बनाया। 

बुढ़ी गाय किसी पेड़ के नीचे खड़ी थी। और गोवंश भी आ गया था। सड़कों पर विचरण करते रहते। घर बार नहीं था इनका। शायद इकट्ठे रहने पर ठंड कम लगेगी। या शरीर सहन करने लगा था। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

105 नम्बर
|

‘105’! इस कॉलोनी में सब्ज़ी बेचते…

अँगूठे की छाप
|

सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया। परेशान थी। घण्टा-भर…

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

लघुकथा

नज़्म

कविता

सजल

कहानी

ग़ज़ल

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

सांस्कृतिक कथा

चिन्तन

ललित निबन्ध

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं