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चाँद अलोप था

 

मेरे लफ़्ज़ ख़ामोश हो गए थे, 
जिसने देखा समझा नहीं था। 
असल में लफ़्ज़ देखे नहीं जाते, 
इसलिए समझ से परे थे। 
मैं विदूषक था, 
समझ रहा था विद्वान, 
यहीं चूक गया, 
सब जब हँस रहे थे। 
अपनी लिबास टूक टूक थी, 
उन उधड़े धागों, 
और बहुत से फ़ाक़ों, 
इन्हें नमस्ते था, 
आख़िर अंत भी था, 
केवल ज़िन्दगी नहीं थी, 
चाँद अलोप था, 
शायद छुट्टी पर हो, 
और अपना मन सदा कार्यरत। 

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