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आगंतुक

 

यह बरसात भी अभी आई नहीं थी। वर्षा ऋतु से पहले की बारिश। रात के नौ बज गए थे। दुकान बंद करने का समय था। इक्का-दुक्का बूँदें टपकने लगी थीं। आँधी कुछ देर पहले ही शांत हुई थी। मोहन ने कुछ आवाज़ें सुनी थीं। वे आवाज़ें कुछ जानी-पहचानी थीं।

दुकान से लगती दीवार के दूसरी ओर, कच्चे में, जहाँ घास-फूस भी ख़ूब था, वहाँ मादा श्वान अपने बच्चों को लेकर परछती के नीचे आ पहुँची थी।

पहली-पहल देखा—अंधेरे में बस कुतरों की आवाज़ गूँज रही थी और उन शावकों की माँ भी गुर्रा रही थी। शायद मोहन के द्वारा मोबाइल की टॉर्च ऑन करने पर वह असहज अनुभव कर रही थी। माँ को अपने बच्चों की रक्षा की अधिक चिंता थी।

लाइट में बच्चों की गिनती की—चार थे। लगभग बीस-पच्चीस दिन के होंगे।

मोहन ने पुचकारा, तब शांत हुई मादा श्वान।

हवा बीच-बीच में झोंक-सी मार देती। घर पास था मोहन का। वह घर से रोटी बनवाकर ले आया। बासी एक-आधा भी नहीं पड़ी थी। टुकड़े करके दूर से ही फेंक दिए। जानवर का क्या पता होता है।

रात भर बारिश होती रही। सुबह जागने पर मोहन ने उठकर दुकान की लगती दीवार के पार जाकर देखा। वहाँ बच्चे बेचैन, उद्विग्न थे। माँ आसपास न थी।

थोड़ी दूर नाली के पास वह मृत पड़ी थी। पता चला—रात चोरों ने सेंध लगाई थी। वह भौंकती-भौंकती सड़क की तरफ़ चली गई और किसी वाहन की चपेट में आ गई।

मोहन का हृदय बैठ गया। आँख में एक क़तरा जगमगाया। पर वहाँ खड़े लोगों की दृष्टि से बचा, पोंछ लिया।

दूर कहीं विजनता में गड्ढा खोदकर उस मृत को दफ़नाया। शायद यही उसके भौंकने का मूल्य था।

मोहन ने अनाथ बच्चों को अपना लिया। कुछ लोग अपने साथ ले गए, पालने के लिए। एक-आध वहीं दुकान के आसपास पलता रहा।

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