हिंदी साहित्यकार और ए.आई. का प्रयोग
आलेख | साहित्यिक आलेख शैलेन्द्र चौहान1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी क्षेत्र की अवधारणा नहीं रह गई है, बल्कि उसने मनुष्य की सृजनात्मक गतिविधियों—विशेषतः साहित्य, कला और संस्कृति—में भी प्रवेश कर लिया है। आज जब यह कहा जा रहा है कि कविताएँ, कहानियाँ, लेख और यहाँ तक कि उपन्यास भी ए.आई. द्वारा लिखे जा रहे हैं, तब हिंदी साहित्य के संदर्भ में यह प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है कि क्या ऐसा साहित्य संवेदनापूर्ण और प्राणवान हो सकता है? या फिर वह केवल भाषा का एक कुशल, पर आत्माहीन अनुकरण मात्र है?
इस प्रश्न का उत्तर किसी सरल ‘हाँ’ या ‘न’ में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि यह बहस वस्तुतः ए.आई. की तकनीकी क्षमता से अधिक साहित्य की आत्मा, उसकी उत्पत्ति और उसके सामाजिक–नैतिक दायित्व से जुड़ी हुई है।
ए.आई. और संवेदना का प्रश्न:
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ए.आई. स्वयं में संवेदनशील नहीं है। उसके पास न देह है, न जैविक स्मृति, न निजी इतिहास और न ही सामाजिक अपमान, प्रेम, भय या संघर्ष का प्रत्यक्ष अनुभव। उसने न भूख सही है, न विस्थापन, न जातिगत–लैंगिक उत्पीड़न, न सत्ता का दमन। वह न किसी आंदोलन का हिस्सा रहा है, न किसी हार या प्रतिरोध की राख में बैठा है। इसलिए यदि पूछा जाए कि क्या ए.आई. के पास संवेदना है, तो उत्तर निर्विवाद रूप से नकारात्मक होगा।
संवेदना मनुष्य के शरीर, समय और समाज के घर्षण से जन्म लेती है। वह चोट से निकलती है, स्मृति में पलती है और भाषा में फूट पड़ती है। यही कारण है कि साहित्य केवल शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों का सांस्कृतिक रूपांतरण है।
साहित्य: केवल संवेदना नहीं, एक संरचना भी:
लेकिन यह कहना भी अधूरा होगा कि साहित्य केवल संवेदना का विस्फोट है। साहित्य एक शिल्प भी है—उसकी अपनी परंपरा, व्याकरण, संरचना, प्रतीक–व्यवस्था और ऐतिहासिक स्मृति होती है। कविता में लय, कथा में संरचना, आलोचना में तर्क और निबंध में वैचारिक अनुशासन—ये सभी अभ्यास से आते हैं।
यहीं पर ए.आई. की शक्ति सामने आती है। ए.आई. हज़ारों कविताओं, उपन्यासों, आलोचनात्मक ग्रंथों और वैचारिक लेखों के भाषिक पैटर्न को सीख सकता है। वह यह पहचान सकता है कि शोक किस तरह व्यक्त किया जाता है, प्रेम किन उपमानों में आता है, क्रोध किन शब्द–संरचनाओं में ढलता है। इसीलिए वह ऐसा पाठ रच सकता है जो संवेदनशील प्रतीत हो—ठीक उसी तरह जैसे मंच पर खड़ा अभिनेता रोने का अभिनय करता है। दर्शक को क्षण भर के लिए भ्रम हो सकता है, लेकिन अभिनेता के आँसू उसकी निजी पीड़ा से नहीं, प्रशिक्षण और तकनीक से उपजे होते हैं।
यहाँ यह अंतर समझना अनिवार्य है— ए.आई. का साहित्य संवेदना से नहीं, संवेदना की नकल से पैदा होता है। वह पीड़ा को जानता नहीं, केवल पहचानता है। वह प्रेम जीता नहीं, उसके वाक्य गढ़ता है।
ए.आई. से रचित साहित्य की सीमाएँ:
इस कारण ए.आई. द्वारा रचित साहित्य प्रायः— सुरुचिपूर्ण होता है, भाषा की दृष्टि से दोषरहित होता है, भावुकता का भ्रम रचता है, लेकिन उसमें वह अपरिभाष्य कंपन नहीं होता जो किसी लेखक के जीवन से फूटता है।
वह हकलाहट नहीं होती जहाँ भाषा लड़खड़ाती है, वह जोखिम नहीं होता जहाँ लेखक स्वयं को दाँव पर लगाता है, वह असुविधा नहीं होती जहाँ सच कहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है।
महान साहित्य अक्सर भाषा की शुद्धता से नहीं, उसकी टूटन से पैदा होता है। प्रेमचंद की कथा, मुक्तिबोध की कविता, धूमिल की भाषा या महाश्वेता देवी का गद्य—ये सब अपने समय के संघर्षों से उपजे हैं, न कि किसी सुव्यवस्थित एल्गोरिद्म से।
हिंदी साहित्यकार और ए.आई. का प्रयोग: वास्तविक स्थिति
जहाँ तक प्रश्न है कि हिंदी के कौन साहित्यकार साहित्यिक सृजन में ए.आई. का प्रयोग कर रहे हैं, तो यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है—हिंदी साहित्य में अभी कोई भी बड़ा या स्थापित लेखक ऐसा नहीं है जो यह कहे कि उसकी कविता, कहानी या उपन्यास ए.आई. ने लिखा है।
हाँ, कुछ लेखक सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करते हैं कि वे ए.आई. या ए.आई.–आधारित टूल्स का प्रयोग— ड्राफ़्ट तैयार करने, भाषा–संशोधन, अनुवाद, या वैचारिक संरचना स्पष्ट करने में करते हैं।
इस संदर्भ में अशोक वाजपेयी और अपूर्वानंद जैसे नामों का उल्लेख होता है, जिन्होंने तकनीक के प्रति संवादात्मक और आलोचनात्मक दृष्टि रखी है। इसके अतिरिक्त युवा और डिजिटल माध्यमों से जुड़े कई लेखक—जो ब्लॉग, पोर्टल और न्यूज़–प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय हैं—ए.आई. को एक सहायक औज़ार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। हालाँकि अधिकांश लेखक इसे खुलकर स्वीकार नहीं करते, क्योंकि साहित्यिक क्षेत्र में अब भी ‘मौलिकता’ को लेकर एक नैतिक दबाव बना हुआ है।
इसके समानांतर यह भी सच है कि Grammarly, अनुवाद सॉफ़्टवेयर, सर्च–आधारित वैचारिक सहायक—ये सभी ए.आई. आधारित हस्तक्षेप हैं, जिनका उपयोग अब सामान्य हो चुका है। इस अर्थ में, पूर्ण अस्वीकार की स्थिति भी यथार्थ नहीं है।
हिंदी के कई वरिष्ठ कवि, कथाकार और आलोचक ए.आई. के साहित्यिक प्रयोग का खुला विरोध करते हैं। उनका तर्क है कि साहित्य अनुभव, पीड़ा, स्मृति और संघर्ष से पैदा होता है—एल्गोरिद्म से नहीं। यह विरोध केवल तकनीक का नहीं, बल्कि उस बाज़ारवादी मानसिकता का है जो साहित्य को भी ‘उत्पाद’ में बदल देना चाहती है—सुंदर, तेज़ और उपभोग–योग्य।
ए.आई.: औज़ार या प्रतिस्थापन?
यहीं बहस का निर्णायक बिंदु आता है। यदि कोई लेखक ए.आई. को औज़ार की तरह इस्तेमाल करता है—जैसे शब्दकोश, संदर्भ–ग्रंथ या प्रारूप–सहायक—और अंतिम निर्णय, संवेदना, नैतिक पक्ष और जोखिम स्वयं उठाता है, तो साहित्य प्राणवान रह सकता है।
लेकिन जहाँ ए.आई. लेखक की जगह लेने लगता है, वहाँ साहित्य एक सजावटी उत्पाद बन जाता है—चमकदार, पर निष्क्रिय; सुंदर, पर निस्संवेद।
अंततः यह कहा जा सकता है कि—ए.आई. से लिखा साहित्य प्राणहीन नहीं होता, बल्कि प्राण उधार लिए हुए होता है। उसमें आत्मा तभी आएगी, जब कोई मनुष्य अपनी चोट, अपने समय और अपने सत्य को उसमें साँस की तरह फूँके।
साहित्य का जन्म आज भी वहीं होता है— जहाँ कोई अकेला मनुष्य अपने समय से टकराते हुए भाषा को दाँव पर लगा देता है।
ए.आई. उस संघर्ष का साक्षी हो सकता है, सहायक हो सकता है, लेकिन उसका स्थानापन्न नहीं।
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