कुछ याद आया?
काव्य साहित्य | कविता भीकम सिंह1 Feb 2024 (अंक: 246, प्रथम, 2024 में प्रकाशित)
बाईं आँख फड़की
कोई करता रहा इंतज़ार
कुछ याद आया
पूछ रहा है मन।
वो गुलमोहर वाली गली
ठोकर खाते पाँव
कुछ याद आया
पूछ रहा है मन।
जब स्नेह भरे हाथ
खड़ी कर गए दीवार
कुछ याद आया
पूछ रहा है मन।
स्पंदित रहा हफ़्तों तक
खिला हुआ गुलमोहर
कुछ याद आया
पूछ रहा है मन।
एक लम्बी हॅंसी जब
खिड़की पर टूट गिरी
कुछ याद आया
पूछ रहा है मन।
जब होने लगे तनाव
और चिंघाड़े कोई आवाज़
तब याद कर लेना
सोच रहा है मन।
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