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नदी: तीन कविताएँ

नदी-1
 
ऐसा लगता है 
नदी—
घाटियों से निकलकर 
चुपचाप बही है। 
 
जैसे कोई 
बिन ब्याही—
जीवन के मोड़ों पर
उलझ गयी है। 
 
नदी-2
 
आज देखो 
वो फिर
आसमान को ओढ़े 
किनारा-सा करती 
कल-कल बहकाये। 
 
एक नदी 
वादों से भागे 
जैसे रोज़ मेरे आगे 
नया-सा मोड़ 
काटने आये। 
 
नदी-3
 
एक नदी 
काली देह वाले 
नाले तक गई। 
 
यह ख़बर 
सिन्धु को 
उदास कर गई। 

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