यह तो होना था
काव्य साहित्य | कविता भीकम सिंह1 Jan 2023 (अंक: 220, प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
यह तो होना था
कुछ तो खोना था
अपने हाथों से
कैसे-कैसे पग धोना था।
कौन जान सका
हमारे कच्चे चिट्ठे
कैसी-कैसी थैली के
हमें चट्टे-बट्टे होना था।
जाने कैसा वक़्त था
तृण-तृण भक्त था
घृणा के झाड़ों को
हमें ही बोना था।
याद नहीं कहाँ-कहाँ
और कितने गिरे हम
जीवन का बस एक
यही तो रोना था।
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टिप्पणियाँ
सरजीत सिंह 2022/12/21 09:08 PM
बहुत सुन्दर कविता !
Avneesh Brij Verma 2022/12/21 06:03 PM
There is a depth in each word
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नव पंकज 2022/12/25 08:53 PM
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