विजेंद्र के काव्य में लोक और श्रम
आलेख | साहित्यिक आलेख शैलेन्द्र चौहान1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
हिंदी कविता के विकासक्रम में कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी रचनात्मकता केवल साहित्यिक प्रयोगों या शैलीगत विशिष्टताओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह अपने समय और समाज की गहरी ऐतिहासिक-सामाजिक प्रक्रियाओं से संवाद करती है। ऐसे कवियों में विजेंद्र का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विजेंद्र (1935–2021) हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कवि, चित्रकार और संपादक थे, जिनकी काव्य-दृष्टि में लोकजीवन, श्रम-संस्कृति और सामाजिक न्याय की आकांक्षा केंद्रीय रूप से उपस्थित है। उनकी कविता उस भारत की आवाज़ है जो खेतों, खलिहानों, पगडंडियों, मेहनतकश हाथों और संघर्षरत जनजीवन में बसता है।
विजेंद्र की कविताओं में लोक और श्रम केवल विषय नहीं, बल्कि उनकी काव्य-संवेदना की मूल धुरी हैं। वे उन कवियों में हैं जिन्होंने कविता को नगर-केंद्रित बौद्धिक विमर्श से बाहर निकालकर गाँवों की वास्तविकताओं, श्रमिक जीवन की धड़कनों और आम मनुष्य की आकांक्षाओं से जोड़ा। उनकी कविता में लोक जीवन का चित्रण किसी रोमानी मोह या सांस्कृतिक स्मृति के उत्सव के रूप में नहीं आता, बल्कि वह जीवन-संघर्ष की ठोस ज़मीन पर खड़े होकर सामने आता है। इसीलिए उनके यहाँ लोक और श्रम का चित्रण सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ एक वैचारिक प्रतिबद्धता का भी संकेत देता है।
विजेंद्र का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले के धर्मपुर गाँव में हुआ था, किन्तु उनकी कर्मभूमि राजस्थान रही। यह तथ्य भी उनके काव्य को समझने में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनके अनुभव-संसार में उत्तर भारतीय ग्रामीण जीवन और राजस्थान की सांस्कृतिक-सामाजिक धरती का साझा प्रभाव दिखाई देता है। इस भौगोलिक और सांस्कृतिक अनुभव ने उनकी कविता को बहुस्तरीय बनाया। वे जीवन भर अपनी धरती, अपनी भाषा और अपने जन से जुड़े रहे। यही जुड़ाव उनकी कविता को लोक-संवेदना से संपन्न बनाता है।
उनकी रचनात्मक यात्रा का आरंभ साठ के दशक में हुआ। 1966 में प्रकाशित उनका पहला कविता संग्रह ‘त्रास’ उस दौर की सामाजिक-राजनीतिक बेचैनियों को व्यक्त करता है। इसके बाद ‘ये आकृतियाँ तुम्हारी’ (1980), ‘चैत की लाल टहनी’ (1982), ‘उठे गूमड़ नीले’ (1983), ‘धरती कामधेनु से प्यारी’ (1990), ‘ऋतु का पहला फूल’ (1994), ‘उदित क्षितिज पर’ (1996), ‘घना के पाँखी’ (2000), ‘पहले तुम्हारा खिलना’ (2004), ‘वसंत के पार’ (2006), ‘आधी रात के रंग’ (2006) और ‘भीगे डैनों वाला गरुण’ (2010) जैसे अनेक संग्रह प्रकाशित हुए। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीन डायरियाँ और कुछ आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखीं। इन समस्त कृतियों में लोकजीवन, प्रकृति, श्रम और सामाजिक अंतर्विरोधों का बहुआयामी चित्र उपस्थित है।
विजेंद्र के यहाँ ‘लोक’ का अर्थ केवल लोक-संस्कृति या लोक-गीतों की स्मृति तक सीमित नहीं है। उनके यहाँ लोक उस समूचे जीवन-विश्व का नाम है जिसमें किसान, मज़दूर, स्त्रियाँ, कारीगर, चरवाहे और समाज के हाशिये पर खड़े समुदाय अपनी रोज़मर्रा की जद्दोजेहद के साथ उपस्थित हैं। वे लोक को किसी संग्रहालयीय वस्तु की तरह नहीं देखते, बल्कि उसे एक जीवित, गतिशील और संघर्षशील सामाजिक इकाई के रूप में चित्रित करते हैं। इसीलिए उनकी कविता में लोकजीवन का चित्रण सजावटी या सौंदर्यपरक दृश्यावली के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की कठोर यथार्थपरकता के साथ सामने आता है।
उनकी कविताओं में खेत में झुकती हुई देह, पसीने से भीगी कमीज़, मिट्टी से सने पाँव, बैलों की चाल, हल की रेखाएँ, धूप से तपती ज़मीन और बारिश की प्रतीक्षा—ये सभी बिंब केवल दृश्यात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए नहीं हैं। वे अपने भीतर इतिहास, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सम्बन्धों की जटिल संरचनाओं को भी व्यक्त करते हैं। इन बिंबों के माध्यम से कवि उस श्रम-संस्कृति को रेखांकित करता है जिसने सदियों से भारतीय समाज को जीवित रखा है।
विजेंद्र की कविता में श्रम का चित्रण किसी रोमानी महिमामंडन के रूप में नहीं है। वे श्रम को केवल पीड़ा या करुणा की दृष्टि से भी नहीं देखते। उनके लिए श्रम मनुष्य की सृजनात्मक शक्ति है। यह वह शक्ति है जो धरती को उपजाऊ बनाती है, शहरों का निर्माण करती है, सभ्यता को गति देती है और जीवन को अर्थ प्रदान करती है। इसलिए उनकी कविताओं में श्रमिक व्यक्ति केवल पीड़ित या शोषित पात्र नहीं है, बल्कि वह रचनाकार भी है—धरती का सृजक, जीवन का निर्माता।
इस दृष्टि से विजेंद्र का काव्य श्रम को गरिमा प्रदान करता है और उसे इतिहास की केंद्रीय शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से उनके वामपंथी वैचारिक झुकाव से भी जुड़ा हुआ है। उनकी कविता में वर्गीय असमानताओं और शोषण की संरचनाओं की पहचान मौजूद है, किन्तु यह पहचान घोषणात्मक या नारेबाज़ी की शैली में नहीं आती। वह संवेदना, संकेत और दृश्यात्मकता के माध्यम से व्यक्त होती है।
विजेंद्र के यहाँ श्रम का अनुभव केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुभव भी है। गाँव का जीवन श्रम के साथ ही अपनी सांस्कृतिक लय भी रचता है—फ़सल के त्योहार, ऋतुओं का परिवर्तन, खेतों का सौंदर्य, लोकगीतों की ध्वनियाँ—ये सब श्रम के साथ ही जुड़े हुए हैं। उनकी कविताओं में यह सांस्कृतिक आयाम भी बार-बार उभरता है।
उनकी काव्य-भाषा इस लोक-संवेदना को अभिव्यक्त करने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विजेंद्र की भाषा में ग्रामीण शब्दावली, देशज मुहावरे और बोलचाल की सहजता मिलती है। यह भाषा कृत्रिम अलंकरणों से मुक्त है। उसमें मिट्टी की गंध, पसीने की नमी और श्रम की खुरदुरी आहट सुनाई देती है। उनकी भाषा में जो सादगी है, वही उसकी शक्ति भी है।
यह सादगी किसी प्रकार की कलात्मक कमी नहीं, बल्कि एक सजग काव्य-चयन है। विजेंद्र जानते थे कि यदि कविता को सचमुच जनजीवन से जोड़ना है तो उसकी भाषा भी जनभाषा के निकट होनी चाहिए। इसलिए उनकी कविता में लोक-भाषिक तत्त्व केवल शैलीगत उपकरण नहीं, बल्कि वैचारिक प्रतिबद्धता के संकेतक हैं। यह भाषा साहित्य और समाज के बीच की दूरी को कम करती है।
विजेंद्र के काव्य में लोक और श्रम का सम्बन्ध केवल सांस्कृतिक या मानवीय नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। उनकी कविताएँ उस सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं जिसमें श्रम करने वाला व्यक्ति हाशिये पर धकेल दिया जाता है, जबकि उपभोग करने वाला वर्ग सत्ता और प्रतिष्ठा के केंद्र में बैठा रहता है। वे इस असमानता को सीधे नारे की तरह व्यक्त नहीं करते, बल्कि जीवन के दृश्य प्रस्तुत करके पाठक को सोचने के लिए बाध्य करते हैं।
उदाहरण के लिए, जब उनकी कविता में खेत में काम करते किसान की छवि आती है, तो उसके साथ ही यह प्रश्न भी उपस्थित होता है कि जो व्यक्ति धरती को उपजाऊ बनाता है, वही क्यों आर्थिक संकट और सामाजिक उपेक्षा का शिकार होता है। इसी प्रकार जब उनकी कविताओं में मज़दूरों के जीवन का चित्र आता है, तो उसमें शहरों की चकाचौंध और श्रमिक जीवन की कठिनाइयों के बीच का विरोधाभास भी स्पष्ट होता है।
विजेंद्र की कविता व्यवस्था-विरोध की कविता है, किन्तु उसका स्वर संयमित और संवेदनात्मक है। वह पाठक को विचार करने के लिए प्रेरित करती है। यही कारण है कि उनकी कविताएँ केवल भावुकता पैदा नहीं करतीं, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जाग्रत करती हैं।
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि विजेंद्र के यहाँ लोक कोई स्थिर और जड़ इकाई नहीं है। वह निरंतर बदलता हुआ जीवन-क्षेत्र है। आधुनिकता, बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के प्रभाव से गाँवों का सामाजिक और आर्थिक ढाँचा तेज़ी से बदल रहा है। खेती के तरीक़े बदल रहे हैं, श्रम के रूप बदल रहे हैं, और पारंपरिक जीवन-पद्धतियाँ भी रूपांतरित हो रही हैं।
विजेंद्र की कविता इस परिवर्तन को भी दर्ज करती है। कभी यह परिवर्तन उन्हें पीड़ा देता है, क्योंकि इसके साथ विस्थापन और असमानता की समस्याएँ भी जुड़ी हैं। कभी यह परिवर्तन प्रतिरोध की भावना जगाता है, क्योंकि लोकजीवन अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। और कभी यह परिवर्तन स्मृति के रूप में सामने आता है, जहाँ कवि अतीत के अनुभवों को वर्तमान के संदर्भ में देखता है।
इस प्रकार उनकी कविता लोक-संस्कृति के संरक्षण का ही नहीं, बल्कि उसके समकालीन रूपांतरण का भी दस्तावेज़ बन जाती है। विजेंद्र का काव्य हमें यह समझने में मदद करता है कि लोकजीवन केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान का सक्रिय और संघर्षशील यथार्थ भी है।
उनकी कविताओं में प्रकृति का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। लेकिन यह प्रकृति भी किसी रोमानी सौंदर्य का प्रतीक नहीं है। वह श्रम से जुड़ी हुई प्रकृति है—खेतों की मिट्टी, ऋतुओं का चक्र, वर्षा की प्रतीक्षा, धूप की तपन। प्रकृति यहाँ मनुष्य के श्रम के साथ मिलकर जीवन की लय रचती है।
विजेंद्र का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका चित्रकार होना है। चित्रकला की यह संवेदना उनकी कविता में भी दिखाई देती है। उनकी कविताओं में दृश्यात्मकता बहुत सशक्त है। वे शब्दों के माध्यम से ऐसे दृश्य रचते हैं जो पाठक के सामने किसी चित्र की तरह उभर आते हैं। खेत, पेड़, आकाश, पक्षी, मिट्टी और मनुष्य—इन सबके बीच एक जीवंत सम्बन्ध दिखाई देता है।
इस दृश्यात्मकता के कारण उनकी कविता में संवेदना का प्रभाव और अधिक गहरा हो जाता है। पाठक केवल शब्द नहीं पढ़ता, बल्कि एक पूरा दृश्य अपने सामने घटित होते हुए महसूस करता है। यही उनकी काव्य-शक्ति का महत्त्वपूर्ण पहलू है।
विजेंद्र का काव्य हिंदी कविता की उस परंपरा से भी जुड़ता है जिसमें नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों ने लोकजीवन और श्रम की महत्ता को रेखांकित किया था। किन्तु विजेंद्र की अपनी विशिष्टता भी है। उनकी कविता में लोक-संवेदना के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक यथार्थ की जटिलताएँ भी उपस्थित हैं।
उनकी कविता में एक ओर खेतों और गाँवों की दुनिया है, तो दूसरी ओर बदलते समय की बेचैनी भी है। यही कारण है कि उनकी कविता अतीत की स्मृति में क़ैद नहीं रहती, बल्कि वर्तमान के प्रश्नों से संवाद करती है।
समग्रतः कहा जा सकता है कि विजेंद्र के काव्य में लोक और श्रम जीवन के यथार्थ, नैतिकता और संघर्ष का त्रिवेणी-संगम रचते हैं। उनकी कविता हमें यह याद दिलाती है कि समाज की वास्तविक शक्ति उन लोगों में निहित है जो अपने श्रम से जीवन का निर्माण करते हैं। वे कविता को श्रमशील मनुष्य की आवाज़ बनाते हैं।
उनके यहाँ लोक कोई पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि काव्य का केंद्र है; और श्रम केवल परिस्थिति नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और अस्तित्व का आधार है। यही विशेषता उन्हें समकालीन हिंदी कविता में एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है। विजेंद्र की कविता हमें यह समझने की दृष्टि देती है कि साहित्य का सबसे गहरा सम्बन्ध मनुष्य के श्रम, उसके संघर्ष और उसके जीवन-सत्य से होता है।
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