एक आत्म स्वीकरण
आलेख | ललित निबन्ध शैलेन्द्र चौहान1 May 2026 (अंक: 296, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
डोनाल्ड ट्रंप मेरे लिए केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं रहे; वे धीरे-धीरे मेरे समय की बेचैनी का प्रतीक बनते गए। जब-जब उनकी कोई टिप्पणी, कोई निर्णय या कोई उच्छृंखल वक्तव्य सामने आता, मुझे लगता मानो दुनिया की सतह के नीचे कुछ गहरा दरक रहा है—और उसी दरार की गूँज मेरे भीतर भी सुनाई देने लगती है।
शुरू में यह सब एक बाहरी घटना भर था—दूर देश की राजनीति, जिसकी ख़बरें अख़बारों और स्क्रीन पर तैरती रहती थीं। पर धीरे-धीरे यह दूरी समाप्त होती गई। उनकी भाषा, उनकी आक्रामकता, और तथ्यों से उनका निर्लज्ज विचलन मुझे भीतर तक विचलित करने लगा। मैं सोचने लगा कि क्या यह केवल एक व्यक्ति की ‘जहालत’ है, या यह हमारे समय की कोई व्यापक बीमारी है? इसी प्रश्न ने मुझे जकड़ लिया।
मैंने पाया कि मैं अनायास ही अधिक पढ़ने लगा हूँ—समाचार, विश्लेषण, इतिहास, राजनीतिक सिद्धांत। Post-truth politics जैसे शब्द अब केवल अकादमिक शब्दावली नहीं रहे, बल्कि मेरे दैनिक अनुभव का हिस्सा बन गए। ऐसा लगता था कि सत्य धीरे-धीरे धुँधला रहा है और उसकी जगह एक शोर ले रहा है—भावनाओं, पूर्वाग्रहों और उत्तेजनाओं का शोर।
इस पूरी प्रक्रिया में ट्विटर एक अजीब-सा रंगमंच बनकर उभरा, जहाँ हर क्षण कोई नया कथन, कोई नई उत्तेजना जन्म लेती थी। मैं स्वयं को उस प्रवाह से अलग नहीं रख सका। हर ट्वीट, हर प्रतिक्रिया मानो मुझे अपनी ओर खींचती, मुझे सोचने और फिर लिखने के लिए उकसाती।
धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि यह व्यस्तता केवल बाहरी नहीं है; यह एक आंतरिक आग्रह में बदल चुकी है। जैसे कोई अदृश्य शक्ति मुझे लगातार लिखने के लिए बाध्य कर रही हो। मेरे भीतर एक बेचैन लेखक जाग गया था, जो इस समय को केवल देखना नहीं चाहता था, बल्कि उसे दर्ज करना चाहता था—उसकी विडंबनाओं, उसकी क्रूरताओं और उसकी विसंगतियों सहित।
मुझे याद आता है कि इतिहास में ऐसे क्षण पहले भी आए हैं। शीत युद्ध के समय भी लेखकों और विचारकों ने अपने समय की बेचैनी को शब्द दिए थे। शायद हर युग अपने संकटों के साथ अपने लेखक भी पैदा करता है। और आज, इस अजीब, अस्थिर और शोरगुल भरे समय में, मैं स्वयं को उसी परंपरा की एक छोटी-सी कड़ी के रूप में देखने लगा हूँ।
अब मैं यह नहीं कह सकता कि ट्रंप ने केवल दुनिया को हिलाया है; उन्होंने मेरे भीतर के स्थिर जल को भी आंदोलित कर दिया है। उनकी ‘जहालत’ ने मुझे एक तरह से अनुशासित किया है—पढ़ने के लिए, सोचने के लिए, और सबसे बढ़कर, लिखने के लिए। यह एक विडंबना ही है कि जो चीज़ मुझे सबसे अधिक विचलित करती है, वही मेरे लेखन की सबसे बड़ी प्रेरणा भी बन गई है।
ट्रंप और मैं
वह दुनिया का नक़्शा
अपनी उँगलियों से मोड़ता है
मैं काग़ज़ की सिलवटों में
अपना समय सीधा करता हूँ
वह कहता है
“मेरे पास ताक़त है”
मैं लिखता हूँ
“मेरे पास शब्द हैं”
उसकी आवाज़ में
घोषणाएँ हैं, धमकियाँ हैं
मेरी चुप्पी में
सवाल हैं, प्रतिरोध है
वह दीवारें खड़ी करता है
सरहदों पर, दिमाग़ों में
मैं पुल बनाना चाहता हूँ
भाषाओं के बीच, मनुष्यों के बीच
वह इतिहास को
अपने पक्ष में मोड़ना चाहता है
मैं इतिहास के हाशिये पर
भूले हुए नाम खोजता हूँ
वह ‘महान’ होने का दावा करता है
मैं ‘मानव’ बने रहने की जद्दोजेहद में हूँ
उसके लिए दुनिया
एक सौदा है
लेन-देन, जीत-हार
मेरे लिए दुनिया
एक कविता है
अधूरी, लेकिन ज़रूरी
वह जब बोलता है
बाज़ार हिलते हैं
मैं लिखता हूँ—
शायद कोई दिल झंकृत जाए
ट्रंप और मेरी
यूँ कोई तुलना हो नहीं सकती
फिर भी हम
दो छोर हैं एक समय के
एक सत्ता का शोर
एक संवेदना की धीमी पुकार
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