विकसित दुनिया के भिखारी
काव्य साहित्य | कविता शैलेन्द्र चौहान1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
वे सिर्फ़ भीख नहीं माँगते हमेशा
कभी गिटार बजाते हैं
कभी सैक्सोफोन में
एक उदास शहर की साँस भरते हैं
कभी फ़ुटपाथ पर
चॉक से बना देते हैं
एक रंगीन आकाश
जिसके किनारे
उनकी अपनी ज़िन्दगी से कहीं अधिक उजले होते हैं
रेलवे स्टेशन के बाहर
सबवे की सीढ़ियों के पास
या किसी व्यस्त चौक में
वे बैठे मिल जाते हैं
एक कप
एक टोपी
साथ में एक कुत्ता
या खुला हुआ वायलिन केस रखे हुए
लोग गुज़रते हैं
कॉफ़ी के काग़ज़ी मग लिए
मोबाइल पर झुके
जल्दी में
चलते-चलते कोई
कुछ सिक्के गिरा देता है
जैसे अपनी संवेदना का
छोटा-सा टैक्स भर रहा हो
अमेरिका हो
कैनेडा हो
यूरोप हो
चमकदार इमारतों
और काँच की दीवारों के बीच
जहाँ पूँजी
रात-दिन दौड़ती रहती है
और मनुष्य
धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता है
यहाँ भूख
तीसरी दुनिया के ग़रीब देशों की
गलियों जैसी नहीं दिखती-
नंगे पाँव
फटे कटोरे वाली क़तई नहीं
यहाँ वह
एक पुराने ओवरकोट में छिपी होती है
एक थके हुए गिटार में
या किसी कार्डबोर्ड पर लिखे
“नीड हेल्प” में
ये सिर्फ़ ग़रीब नहीं
वे लोग हैं
जो कारख़ानों से निकाले गए
जो मानसिक अवसाद में डूब गए
जो युद्धों से लौटे
और फिर समाज में कहीं फ़िट नहीं हो सके
कलाकार,
पूर्व सैनिक,
प्रवासी
और वे बूढ़े भी
जिन्हें कल्याणकारी राज्य
पूरी तरह बचा नहीं पाया
विकसित देशों में
भिखारी
सभ्यता की विफलता का
सबसे शांत विज्ञापन हैं
वे बताते हैं
कि समृद्धि
समानता नहीं होती
और चमकते बाज़ारों के भीतर भी
अकेलापन
भूख
और पराजय
अपनी जगह बनाए रखते हैं
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