अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य तकनीकी

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

विकसित दुनिया के भिखारी

 

वे सिर्फ़ भीख नहीं माँगते हमेशा
कभी गिटार बजाते हैं
कभी सैक्सोफोन में
एक उदास शहर की साँस भरते हैं
कभी फ़ुटपाथ पर
चॉक से बना देते हैं
एक रंगीन आकाश
जिसके किनारे
उनकी अपनी ज़िन्दगी से कहीं अधिक उजले होते हैं
 
रेलवे स्टेशन के बाहर
सबवे की सीढ़ियों के पास
या किसी व्यस्त चौक में
वे बैठे मिल जाते हैं
एक कप
एक टोपी
साथ में एक कुत्ता
या खुला हुआ वायलिन केस रखे हुए
 
लोग गुज़रते हैं
कॉफ़ी के काग़ज़ी मग लिए
मोबाइल पर झुके 
जल्दी में
चलते-चलते कोई 
कुछ सिक्के गिरा देता है
जैसे अपनी संवेदना का
छोटा-सा टैक्स भर रहा हो
 
अमेरिका हो 
कैनेडा हो 
यूरोप हो 
चमकदार इमारतों
और काँच की दीवारों के बीच
जहाँ पूँजी
रात-दिन दौड़ती रहती है
और मनुष्य
धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता है
 
यहाँ भूख
तीसरी दुनिया के ग़रीब देशों की 
गलियों जैसी नहीं दिखती-
नंगे पाँव
फटे कटोरे वाली क़तई नहीं
यहाँ वह
एक पुराने ओवरकोट में छिपी होती है
एक थके हुए गिटार में
या किसी कार्डबोर्ड पर लिखे
“नीड हेल्प” में
 
ये सिर्फ़ ग़रीब नहीं
वे लोग हैं 
जो कारख़ानों से निकाले गए
जो मानसिक अवसाद में डूब गए
जो युद्धों से लौटे
और फिर समाज में कहीं फ़िट नहीं हो सके
 
कलाकार, 
पूर्व सैनिक, 
प्रवासी 
और वे बूढ़े भी
जिन्हें कल्याणकारी राज्य
पूरी तरह बचा नहीं पाया
 
विकसित देशों में
भिखारी
सभ्यता की विफलता का
सबसे शांत विज्ञापन हैं
 
वे बताते हैं
कि समृद्धि
समानता नहीं होती
और चमकते बाज़ारों के भीतर भी
अकेलापन
भूख
और पराजय
अपनी जगह बनाए रखते हैं

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

'जो काल्पनिक कहानी नहीं है' की कथा
|

किंतु यह किसी काल्पनिक कहानी की कथा नहीं…

14 नवंबर बाल दिवस 
|

14 नवंबर आज के दिन। बाल दिवस की स्नेहिल…

16 का अंक
|

16 संस्कार बन्द हो कर रह गये वेद-पुराणों…

16 शृंगार
|

हम मित्रों ने मुफ़्त का ब्यूटी-पार्लर खोलने…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

साहित्यिक आलेख

ललित निबन्ध

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

ऐतिहासिक

पुस्तक समीक्षा

स्मृति लेख

यात्रा-संस्मरण

सिनेमा और साहित्य

सामाजिक आलेख

पुस्तक चर्चा

आप-बीती

कहानी

काम की बात

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं

लेखक की पुस्तकें

  1. भारत का स्वाधीनता संग्राम और क्रांतिकारी
  2. धरती-21