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टोरोंटो और टिटहरी

 

टोरोंटो में
वसंत धीरे-धीरे खुलता है
जैसे किसी पुराने पत्र का मोड़
पेड़ों पर नई पत्तियों की हरियाली
धूप में हल्की ठंड की बची हुई परत
 
खिड़की के बाहर
एक आवाज़ सुनाई दी
लगा
टिटहरी होगी
गाँव की स्मृतियों से निकली
लंबी, चौकन्नी पुकार
जो खेतों, पोखरों और
धूल भरे रास्तों के साथ आती थी
मैं ठिठका 
 
पर यहाँ—
टोरोंटो की इमारतों
बिजली के तारों
और काँच की बालकनियों के बीच
टिटहरी कहाँ! 
शायद वह अमेरिकी रॉबिन या 
किलडियर की आवाज़ थी
या किसी अन्य पक्षी की
या स्मृति का छल
या कोई मन का भ्रम
पता नहीं 
 
फ़ुटपाथ पर 
गौरैया फुदक रही थी
वैसी ही छोटी, बेचैन
जैसे समय से बचा हुआ कोई देसी शब्द
कबूतर आमतौर पर 
अपनी पुरानी नागरिक आदत में
उड़ रहे थे
ऊँची इमारतों के आसपास 
 
सोच रहा था 
मनुष्य जहाँ भी जाता है
अपने भीतर बहुत कुछ 
जाना-बूझा
साथ ले जाता है
 
जैसे कुछ पक्षियों की आवाज़ें
कुछ अदृश्य छायाएँ
जो सचमुच वहाँ होतीं नहीं
फिर भी सुनाई देती हैं
सहसा किसी 
वासंती दोपहर में

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