निपिसिंग की साँझ
काव्य साहित्य | कविता शैलेन्द्र चौहान1 Jul 2026 (अंक: 300, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
निपिसिंग* के जल पर
साँझ जब अपना केसर घोलती है,
तो लगता है जैसे
आकाश ने झील की हथेली पर
एक लंबा स्वप्न रख दिया हो
दूर क्षितिज में डूबता सूरज
और जल में तैरती उसकी अग्नि-रेखाएँ—
मानो प्रकृति स्वयं
किसी आदिम कविता का पाठ कर रही हो।
हवा तेज़ थी
इतनी तेज़ कि तट की रेत
उड़-उड़कर आँखों में भर रही थी
बच्चे कपड़ों और बालों में
रेत के महीन कण समेटे दौड़ रहे थे
झोंकों में एक जंगली उल्लास था
मानो झील अपनी स्थिर सतह के नीचे छिपी
अशांत स्मृतियों को व्यक्त कर रही हो।
सीगलें झील के जल में
अपने भोजन की तलाश में मँडरा रही थीं
कभी लहरों के ऊपर झुकतीं,
कभी अचानक आकाश में उठ जातीं
उनकी तीखी पुकारें
हवा के शोर में घुलकर
एक अलग ही संगीत रच रही थीं
वे उड़ते हुए सैलानियों के ऊपर
क्षण भर को ठहर जातीं,
मानो इस साँझ के दृश्य में
अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती हों।
लहरें बार-बार किनारे से टकरातीं
और रेत हवा के संग मिलकर
एक क्षणिक धूल-नृत्य रच देती
हम कभी आँखों को हथेलियों से ढँकते
कभी उस दृश्य को निहारने का लोभ संवरण न कर पाते।
प्रकृति की सुंदरता वहाँ
अपने पूरे स्वभाव के साथ उपस्थित थी
थोड़ी कठोर, थोड़ी चंचल
और इसलिए अधिक सच्ची।
नॉर्थ बे की इस साँझ में
निपिसिंग झील ने सिखाया कि
सौंदर्य केवल शांत जल में नहीं होता
कभी-कभी वह उड़ती हुई रेत में भी होता है
जो आँखों में चुभते हुए भी
स्मृति में एक चमक छोड़ जाती है।
*निपिसिंग झील (Lake Nipissing), नॉर्थ बे, ओंटारियो: कैनेडा
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