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अथ विधुर कथा

इस संसार में नारी और नर के बीच पति पत्नी का रिश्ता सबसे अलग, सबसे रोचक, से रोमाचंक है। सारी कायनात इसी रिश्ते पर टिकी है। यूँ तो नारी और नर के विभिन्न रूप व रंग हैं पर जो आंनद इस रिश्ते की बात में होता है वह किसी में नहीं। तभी तो यह रिश्ता बनाने के लिये माँ-बाप बड़े-बड़े सपने बुनते हैं। लड़के-लड़कियों के सारे क्रिया-कलाप शादी के लड्डू खाने के लिये होते हैं। सुंदर दिखने के लिये क्या-क्या पापड़ नहीं बेलतीं। इसी सम्बंध से जुड़े क़िस्से भी सब भाषाओं में अपने अपने ढंग से बड़े रसीले होते हैं। जिसका स्वाद सब चटखारे लेते हुए सुनते-सुनाते हैं। अब तो कवि सम्मेलन, एसएमएस पर भी यही छाये रहते हैं। क्वारे लड़के-लड़कियों का आनंद इन चटखारों का शादी-शुदा नर-नारी से भिन्न होता है। क्वारों में मन में इन्हें सुन कर शादी के लड्डू फूटने लगते हैं तो शादी-शुदा अपनी क़िस्मत पर रश्क कर रहे होते हैं। तभी तो कहा जाता है ’शादी के लड्डू जो खाये वह भी पछताए जो न खाये वह भी पछता”। 

शादी-शुदा जोड़ों में संता-बंता के चुटकुलों से बहुत लोकप्रिय स्वादिष्ट चुटकुले पत्नी वाले होते हैं जैसे—

 

ग़ालिब से किसी ने पूछा कि आपकी बेगम कैसी हैं? ग़ालिब बोले जो बादल गरजने पर कभी लिपट जाया करती थीं अब सदा कड़कती रहती हैं। 
 

एक अर्थी जा रही थी उसके पीछे बहुत सारी माला पहने एक कुत्ता चल रहा था। उसके पीछे पुरुषों की भारी भीड़ थी। किसी ने उत्सुकतावश पूछ लिया कि मरने वाला कोई प्रसिद्ध व्यक्ति था? तब उसको ज्ञान देते हुए किसी ने कहा कि यह एक औरत की शव यात्रा है, जिसकी मृत्यु इस कुत्ते के काटने से हुई। जब पूछने वाले के बात पल्ले नहीं पड़ी तो उसने कहा, ‘नादान इन सबने इस कुत्ते की बुकिंग अपनी पत्नी के लिये कराई है।‘

 

मतलब यह कि शादी के बाद पत्नी की मौत हो जाये और नर फिर से आज़ाद हो जाये तो कितना बड़ा सुखदायक प्रसंग होता है। कल ही किसी ने एसएमएस किया कि किसी की पत्नी ३ माह के लिये मायके चली गई, वह पति कितना ख़ुश होकर नाच कर अपनी आज़ादी मना रहा था। 

ऐसे चुटकुलों की भरमार है। इनको पढ़ते, कहते, सुनते जो पतियों के चेहरे खिलते हैं वह देखते ही बनता है। सारे जहाँ का सुख जैसे मिल गया हो।

एक गुदगुदाने वाला सच यह भी है कि शादी के नाम से मन में जो लड्डू फूटते हैं, उसमें आने वाली या होने वाली रस से भरी रसभरी लगती है अथवा ऐश्वर्या राय सी मन को रिझाती रहती। चंचल सा बदन चंचल चितवन के सपने सोने भी नहीं देते। 

शादी होने पर पत्नी चन्द्रमुखी बन जीवन में दाख़िल होती है, पर कुछ ही साल बाद सूरजमुखी और फिर ज्वालामुखी लगने लगती है। विडम्बना यह है कि पत्नी गले में फाँस सी अटक जाती है। पति देवता की हालत उस साँप सी होती है जिसके गले में छुछंदर फँस जाये! 

 ज़िंदगी गले से फाँस निकालने की जद्दोजहद में शादी की सालगिरह मनाते पहले पच्चीस, फिर पचासवीं पर पहुँच जाते हैं। धीरे-धीरे शारीरिक अक्षमतायें दोनों को चिड़चिड़ा बना देती है। दोनों ही उँचा सुनने लगते हैं, नज़र कमज़ोर हो जाती है। बच्चे अपनी घर-गृहस्थी में उलझ जाते हैं। पति-पत्नी एक दूसरे पर दाँत निपोरने लगते हैं। पति पत्नी की आवाज़ को अनसुना करने लगता है। 

एक कड़ुवा सच, अकाट्य सत्य दोनों को सताने लगता है। “पहले कौन?” बच्चे उँचे पदों, भारी पगार वाले मम्मी-पापा का गौरव हो गये। पर नये ज़माने के चलन में कोई भी अशक्त होते माँ-बाप को अपने यहाँ रखने या उनके पास आ कर रहने या देखने का समय व हौसला नहीं जुटा पाता। जान से प्यारे बच्चों का व्यवहार वृद्ध मम्मी-पापा के विश्वास को अंदर तक तोड़ जाता है। उनका सिर वक़्त के सामने झुक जाता है।

पति सोचता है कि पत्नी मेरे बाद कैसे रहेगी? कोई बच्चा उनको नहीं रखेगा? अनजाने पत्नी के सुहागिन मरने की दुआ करने लगता है। पत्नी सोचती है मेरे बग़ैर यह कैसे रह पायेंगे? इनके खाने, कपड़ों, रहने का क्या होगा? शायद कोई बच्चा अपने पास इन्हें रख ले? बहुओं की तो सास से नहीं पटती, श्वसुर बेचारे की तो कुछ माँग होती नहीं? इसी तरह की उधेड़-बुन की चिंता में समय गुज़रने लगता है। दोनों कुछ अधिक चिड़चिड़ा होते जाते हैं! अपने-अपने भाई-बहिनों से इस बात का ज़िक्र कर उनकी थाह लेने लगते हैं कि ‘क्या वह उनके अकेले रहने पर उन्हें अपने पास रख पायेंगे?’ उनका सधा-सधाया जवाब होता है "अभी ऐसा क्यों सोचते हो जब मौक़ा आयेगा तब देख लेंगें" आदि बात बना कर असल मुद्दा टाल जाते हैं ।

काल जो देहरी पर खड़ा सब देख-सुन रहा होता है, एक दिन पत्नी को लेने आ पहुँचता है, पत्नी पति को आवाज़ देती है; वह आदतन अनसुना कर देता है। काल प्राण लेकर चला जाता है। 

नौकरानी रोती-चिल्लाती साहब के पास आती है, "मैडम को जाने क्या हो गया; आप को आवाज़ देते-देते निढाल हो गईं। पति अनमने से उठते हैं पर यह क्या! इनकी प्राण प्रिय के तो प्राण पखेरू हो चुके होते हैं! वह ज़ार-ज़ार रोने लगते हैं, कि मेरे साथ धोखा हो गया, मुझे अकेला छोड़ गई, हाय -हाय, जाते में कुछ न कहा न सुना, जाने क्या-क्या विलाप करने लगे! 

रोना सुन पड़ोसी जुटने लगे, बच्चों को ख़बर कर दी। अमेरिका से बच्चों के पहुँचने में तीन दिन लगने वाले थे, अत: पति ने पड़ोसियों की सहायता से दाह संस्कार कर दिया। 

बच्चे आये चले गये। पापा को नौकर-नौकरानी के भरोसे छोड़ गये। तुरंत ले जाना भी कहाँ संभव था? जल्द पासपोर्ट वीसा बनवा कर ले जायेंगे का आश्वासन दे गये। 

विधुर पति का जीवन जी का जंजाल हो गया। जीवन का रस ही सूख गया। पत्नी के वियोग में तिल-तिल जलने लगे। 

पत्नी से छुटकारे की काल्पनिक ख़ुशी गहरे शोक में डूब गई। धीरे-धीरे मिलने-जुलने आने वालों की संख्या नगण्य हो गई। दिन पहाड़ सा और रात अधिक लम्बी हो गई। जो फोन गाहे-बेगाहे टनटनाता था अब यदा-कदा ही सन्नाटे को चीरता सा घड़घड़ाने लगा। पहले नाश्ते से फल, फिर खाने से दही-मट्ठा, दो-तीन सब्ज़ी ग़ायब हो गईं। मठरी, लड्डू का नाश्ता आदि रास्ता भूल गये । 

पति शायद जीवन में पहली बार अपनी रुचि का जीवन जी रहे थे। अथवा मजबूरी में दिन काट रहे थे। नींबू पानी पहले की तरह बना लेते । फिर एक अंडा, एक केला तथा एक कप काफ़ी में नाश्ता सिमट गया। कोई आग्रह कर-कर के खिलाने वाला वहाँ न था। अब न ही किसी को बार-बार झिड़कना पड़ता था कि खिलाने के पीछे पड़ जाती हो। दोपहर का भोजन उड़द की दाल, एक रोटी में सिमट कर रह गया। शाम की चाय का साथी मात्र बिस्कुट हो गया। नाश्ते के डिब्बे जो कभी भरे रहते थे, सब रीत गये। डिब्बे भी पड़े-पड़े धूल से अट गये। उन्हें देखने वाला कोई न था। रात का भोजन आलू की सब्ज़ी, एक परांठा, कभी-कभी टमाटर की चटनी में समा गया। इसरार, ख़ुशामद करके खिलाना, सब अतीत की बात हो गई। 

बर्तन, बाल्टियों, ने नहाना छोड़ दिया। बिस्तर को उसके हाल पर छोड़ दिया। मकड़ियाँ छत से बिजली के बल्बों, पंखों, कभी न हटने वाली चीज़ों पर घर बना कर पसर गईं। मच्छर आज़ाद हो चहलक़दमी करने लगे। पंछियों ने भी दाने के अभाव में चहचहाना छोड़ दिया। 

घर का सामान धीरे-धीरे या तो कबाड़ी के हवाले होने लगा अथवा नौकर-नौकरानियों के घर की शोभा बढ़ाने लगा।

बरसों से जोड़ा घर चंद महीनों में उजाड़, वीरान, चुप्प सा लगने लगा। ज़मीन का फ़र्श जगह-जगह से काला हो गया। श्री केदारनाथ सिंह की कविता की कुछ पंक्तियाँ इस स्थिति का इस तरह बयान करती हैं: 

स्त्रियाँ
जब चली जाती हैं दूर
जब लौट नहीं पातीं
घर के प्रत्येक कोने में तब
चुप्पी होती है
बर्तन बाल्टियाँ बिस्तर चादर नहाते नहीं
मकड़ियाँ छतों पर लटकती ऊँघती हैं
कान में मच्छर बजबजाते हैं
देहरी हर आने वालों के क़दम सूँघती है
 
स्त्रियाँ जब चली जाती हैं
ना लौटने के लिए
रसोई टुकुर टुकुर देखती है
फ्रिज में पड़ा दूध, मक्खन, घी, फल, सब्जियाँ –
एक दूसरे से बतियाते नहीं
वाशिंग मशीन में ठूँस कर रख दिये गए कपड़े 
गर्दन निकालते हैं बाहर
और फिर ख़ुद ही दुबक-सिमट जाते हैं मशीन के भीतर
 
स्त्रियाँ जब चली जाती हैं 
कि जाना ही सत्य है
तब ही बोध होता है
कि स्त्री कौन होती है
कि ज़रूरी क्यों होता है 
घर में स्त्री का बने रहना।

सब नारी बनाम पत्नी पर बने चुटकुले रसहीन हो, मुँह चिढ़ाते लगते हैं। गूँगे के गुड़ के स्वाद की तरह पत्नी का चला जाना दिल को सालता रहता है। 

नोट: आशा करते हैं कि किसी की  ज़िंदगी ऐसी न हो। 
 

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टिप्पणियाँ

सरोजिनी पाण्डेय 2021/09/11 11:31 AM

स्त्री होकर विधुर की जिंदगी में झांक आईं। बहुत खूब!

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