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लुका छिपी पक्षियों के साथ

आज हल्की ठंडी हवा चल रही है 
धूप भी बहुत तेज़ है ,
सर्दी फिर भी काफ़ी है ,
बाहर बग़ीचे में 
धूप-छांह में बैठना मनभावन है। 
सुनो मैं पकड़मपकड़ाई ,
चोर सिपाही / लुका छिपी खेल रही हूँ ,
तुम कर हँसना मत - 
कि बचपन अभी भी नहीं गया। 
एक तरफ़ पक्षी हैं,
जो कभी इस डाल कभी उस डाल,
कभी पत्तों में - 
कभी फुनगी में छुप जाते हैं, 
मेरी नज़रें उन्हें खोजती हैं 
कभी खंजन पकड़ा जाता है 
तो कभी गौरैया. . .
कभी पीली  चोंच वाली भूरी चिड़िया, 
जो इस फुनगी से दूसरी में छिपती 
चूँ  चूं चीं चीं कर कहती है -
मुझे खोजो तो जानूँ? 
तभी सेब से लदे पेड़ पर सेब चखने ,
दो चार बचे नाशपाती का स्वाद सँजोने, 
या  ज़मीन पर कीड़े, गिरे फल खाने ,
कोई चिड़िया इधर उधर देखती,
डरती डरती सी, 
नज़र बचा कर आ जाती है।
पर दूसरे पल 
मुझसे आँख मिलते ही 
जाने कहाँ उड़ जाती है। 
बड़ा रोमाचंक है 
यह लुकाछिपी का खेल । 
है न - 
न कोई हारता है 
न कोई जीतता है
खेल चलता रहता है । 

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