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प्रिय मित्रो,

३१ मार्च दोपहर के समय भारत से कैनेडा लौट आया। यह लम्बी यात्रा थी—६ फरवरी से ३१ मार्च तक। मूलतः यात्रा सुखद रही। बहुत से ऐसे मित्रों से साक्षात्‌ मिलना अच्छा लगा जिनसे अभी तक केवल ई-मेल या व्हाट्स ऐप के माध्यम से ही सम्पर्क में था। अनुभवों की एक ऐसी अमूल्य सम्पदा के साथ लौटा हूँ, जिसके सम्पूर्ण प्रभाव को समझने और आत्मसात करने में समय लगेगा। भारत में हिन्दी के प्रति अनुराग और सकारात्मक ऊर्जस्विता ने मनोबल को बढ़ाया। इन अनुभवों के विषय में कभी बाद में लिखूँगा अभी तो धरातल की सच्चाई को ही जीना होगा और अपने स्वर्जित दायित्व को वहन करने के शक्ति स्रोत से पुनः जुड़ने की आवश्यकता है।

मैं आप सभी का हृदय से आभारी हूँ कि भारत-यात्रा के दौरान मेरे मन में उपजे संशय की रात्रि और फिर नए सूर्योदय के साथ आशा की किरण और आप सभी के साहित्य कुञ्ज के प्रति अनुराग ने मुझे नई राह खोजने के लिए प्रेरित किया। आज साहित्य कुञ्ज के भविष्य की सफलता के प्रति न केवल मैं आश्वस्त हूँ अपितु मुझे कुछ नई संभावनाएँ भी दिख रही हैं। समय-समय पर मैं इन सम्भावनाओं को वास्तविकता बनाने के लिए आपके सहयोग और सम्बल की ओर आशावान दृष्टि से देखता रहूँगा।

अब इस लघुतम सम्पादकीय को अभी विराम देता हूँ। पहले ही साहित्य कुञ्ज का अंक प्रकाशित करने में बहुत विलम्ब हो चुका है। कहने को तो बहुत कुछ है आपसे साझा करने के लिए यात्रा के अनुभवों की एक भीड़ जमा हो चुकी है—वह सब फिर कभी

अन्त में यही कहूँगा कि आपकी मित्रता ही मेरी ऊर्जा है और आपका साहित्य-अनुराग मेरी प्रेरणा।

—सुमन कुमार घई

टिप्पणियाँ

Mahendra Tiwari 2026/04/03 11:18 AM

सर, आप उस जौहरी की तरह हैं, जो मार्केट आने से पहले सोने को निखारता है। आपके वट वृक्ष तले कई रचनाकार अंकुरित हुए। आपका सानिध्य हम हमेशा महसूस करते हैं। यह जरूरी नहीं कि हम आपसे बाते करते हैं या नहीं। कुछ बातें तो दिलों से होती हैं। आप कुशल रहें स्वस्थ रहें। ताकि आपके आशीर्वाद हम तक पहुंचता रहे। और यह आपका कुंज यूं ही फलता फूलता रहे। महेन्द्र तिवारी दिल्ली

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