प्रिय मित्रो,
एक लम्बे अंतराल के बाद साहित्य कुञ्ज की ओर लौटा हूँ। यह खेद तो है कि मेरी व्यस्तताओं के कारण आपकी रचनाओं का यथा समय प्रकाशन नहीं हो पाया, परन्तु मैं भी एक सामाजिक प्राणी हूँ और कुछ सामाजिक और पारिवारिक दायित्व ऐसे भी होते हैं जिन्हें निभाना ही होता है। एक अन्य कारण मेरी बाग़बानी में रुचि भी है। आप सभी जानते हैं कि मैं कैनेडा के ओंटेरियो प्रांत में रहता हूँ। यहाँ पर वास्तविक गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है। कहने को कैलेण्डर के अनुसार कैनेडा में ग्रीष्म ऋतु जून २० या २१ को आरम्भ हो जाती है और सितम्बर के प्रथम सप्ताह तक रहती है। वास्तविकता कुछ ओर है। जुलाई के अंतिम दो सप्ताह और अगस्त के पहले सप्ताह के दौरान ही ऋतु पूरे यौवन पर होती है। उसके पश्चात गर्मी की ऋतु सिमटने लगती है। सितम्बर के दूसरे सप्ताह के आते-आते हवा में मोड़ पर खड़े पतझड़ का आभास होने लगता है। मेरी बाग़वानी की रुचि को संतुष्ट करने के लिए मेरे पास बहुत कम समय होता है। बाग़बानी के कुछ दायित्व तो योजनाबद्ध होते हैं जैसे अप्रैल की वर्षा ऋतु के अंत के बाद, मई के पहले सप्ताह में लॉन की सफ़ाई करना। गत शीत के प्रभाव से मरी हुई घास को निकाल कर घास का बीज छिड़कना, विक्टोरिया डे (इस वर्ष मई १८, २०२६) को नर्सरी से फूलों के पौधे ख़रीदना। विशेष बात यह कि पौधे ख़रीद तो लिए जाते हैं परन्तु तुरन्त रोपने पर पाला पड़ने के भय के चलते पौधे कहीं सुरक्षित रखे जाते हैं। उसके लिए पर्याप्त प्रतीक्षा करनी पड़ती है—इत्यादि-इत्यादि। यानी फूलों और पिछले आँगन में उग रही शाक-तरकारी को एक किसान की तरह पाला-पलोसना पड़ता है। इसके अतिरिक्त इस वर्ष न जाने क्यों लॉन पर गिलहरियों का प्रकोप रहा। गिलहरी को यहाँ ’वनमाली’ कहा जाता है क्योंकि गिलहरी शीत काल के लिए चीड़ के बीजों (चिलगोज़ा) को संचित करने के लिए लॉन खोद कर दबा देती है और फिर भूल जाती है कि कहाँ बीज को छिपाया था। अपनी संचित सम्पत्ति को खोजने के लिए लॉन को जगह-जगह से खोद देती है। दूसरी ओर रैकून (बिल्ली के आकार का पशु) कीड़े खाने के लिए लॉन खोद कर लॉन की सतह को चन्द्र-सतह की तरह बना डालता है। इस बार इन दोनों प्राणियों की मेरे लॉन पर विशेष कृपा रही।
सच मानिए यह कहानी साहित्य कुञ्ज को प्रकाशित न कर पाने से सम्बन्धित है। अभी आपको कुछ पंक्तियाँ और पढ़नी पड़ेंगी।
मित्र लोग जानते हैं कि इस वर्ष मैंने ७५वें वर्ष में पदार्पण किया है। समस्या यह है कि शरीर और मन का अभी समन्वय बना नहीं है। मन कहता है कि जो काम मैं सदा से करता आया हूँ वह अब मैं क्यों नहीं कर सकता? दूसरी ओर शरीर अपनी गति से चल रहा है। लॉन की दशा को सुधारने के लिए मैंने एक घन मीटर मिट्टी का बैग मँगवा लिया ताकि गड्ढे मिट्टी से भर कर घास का बीज डाल सकूँ। ऐसे भारी काम के लिए मैंने एक पहिए का ठेला (Wheelbarrow) और बेलचे ले रखे हैं। अभी तक, इतनी मिट्टी मैं एक दो दिन में बिना थके निपटा सकता था . . . लगभग तीन वर्ष पहले तक। उसी बहाव में मिट्टी मँगवाई थी और योजना बनाई थी। मेरा भ्रम पहले दिन ही टूट गया। चार-पाँच ठेले के बाद शरीर ने आराम के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया। जो काम दो दिन में होना था—दो महीने चलता रहा। पत्नी के द्वारा बार-बार मुझे याद दिलाया जाता रहा कि अब पैसे देकर काम करवाने में ही भलाई है। मैं भी अड़ा रहा। बेचारा साहित्य कुञ्ज पिछड़ता रहा और ड्राइव-वे की बग़ल में पड़ा मिट्टी का बैग धीरे-धीरे सिकुड़ता रहा। दो सप्ताह पहले मिट्टी का काम समाप्त हो गया तब साहित्य कुञ्ज के अपराध-बोध से ग्रसित होने लगा। परिणाम यह हुआ कि किसी तरह साहित्य कुञ्ज को प्रकाशित कर रहा हूँ परन्तु लॉन में पड़ी मिट्टी घास का बीज माँग रही है। अपने-आप से वायदा कर रहा हूँ कि आज का अंक प्रकाशित करने के बाद अगले दो दिन में घास का बीज डालकर भगवान से प्रार्थना करूँगा कि इस बार शीत ऋतु को केवल एक दो सप्ताह के लिए सरका दें ताकि नव अंकुरित घास जड़ पकड़ सके। आशा कर रहा हूँ सितम्बर के द्वितीय अंक तक सब कुछ सामान्य हो जाएगा।
इस अंक के प्रकाशन के अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषांक का पहला अंश प्रकाशित कर रहा हूँ। डॉ. आरती स्मित के सम्पादन में “इक्कसवीं सदी की कहानियाँ” विशेषांक के प्रकाशन का आरम्भ हो रहा है। पाठकों से निवेदन है कि इस अंक में और आने वाले अंकों में इन कहानियों के प्रकाशन का क्रम किसी प्रकार के मूल्यांकन के अनुसार नहीं समझें। डॉ. आरती स्मित ने सम्पादित कहानियों को बहुत पहले निर्धारित समय पर मुझे दे दिया था परन्तु मैं उसके तकनीकी पक्ष को समय के अनुसार नहीं कर पाया—जिसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। यद्यपि डॉ. स्मित सलाह दी थी कि इसे हम दो अंकों में ही प्रकाशित कर दें परन्तु मैं इस वायदे को निभाने में अपने आपको असमर्थ पा रहा हूँ। इसलिए इस अंश में केवल छब्बीस कहानियाँ ही होंगी। मेरा प्रयास रहेगा कि शीघ्रातिशीघ्र इस दायित्व को निभा सकूँ।
इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ के विषय में मेरे विचार:
मित्रो इस विशेषांक में जितनी सामग्री है उसे ही पूर्ण समझ लेना सही नहीं है। अभी तो सदी के पहले पच्चीस वर्ष ही बीते हैं। यानी एक चौथाई सदी को किसी भी तरह से पूर्ण कह देना अतिश्योक्ति ही है परन्तु फिर भी इस विशेषांक का शीर्षक पूरी सदी की ओर इंगित कर रहा है। साहित्यिक दृष्टिकोण से देखें तो इस सदी के पहले पच्चीस वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। न केवल समाज, आर्थिक परिस्थितियाँ, धार्मिक दृष्टिकोण, रीति रिवाज़ यानी सबकुछ बदल रहा है। वैसे तो परिवर्तन सृष्टि का शाश्वत नियम है परन्तु परिवर्तन की गति और विस्तार और इसकी व्यापकता अतुलनीय है। हमने अमेरिका के ट्विन टॉवर पर हुए आतंकी आक्रमण द्वारा एक नए प्रकार के आतंक की विभीषका का आरम्भ देखा। पश्चिमी और मध्य एशिया में युद्धों में नर संहार देखा। कोविड की महामारी को झेला और इसके दूरगामी परिमाणों को अभी हम समझ भी नहीं पाए थे कि युक्रेन का युद्ध आरम्भ हो गया। फिर हमास ने, अकारण संगीत का प्रोग्राम से लौट रहे यहूदियों का नर संहार किया तो इज़रायल नें गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों का नरसंहार कर डाला। पहलगाम में भारतीय सैलानियों को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने धर्म पूछ कर मौत के घाट उतार दिया तो प्रत्युत्तर ने “ऑपरेशन सिंदूर” आरम्भ किया परन्तु भी इस कहानी का अंत हमने देखा नहीं है। इधर इज़रायल और ईरान पर आक्रमण कर दिया और ईरान ने अपने पड़ोसी देशों को तहस-नहस कर डाला। बंगला देश में मुस्लिम क्रान्ति हो गई और नेपाल में जेन-ज़ी ने तख़्ता पलट कर दिया और इसमें सफलता मिलने के पश्चात यू.एस. भारत में भी जेन-ज़ी आन्दोलन के सपने देखने लगा क्योंकि भारत की कुछ राजनीतिक दल पहले ही स्वार्थवश सत्ता को हथियाने के लिए कुछ भी करने के लिए उद्यत दिख रहे हैं। अभी तो तकनीकी क्रान्ति की तो बात ही नहीं की। मोबाइल की व्यापकता से ग्रामीण अंचल को किस तरह प्रभावित किया है हम सब प्रतिदिन देखते हैं। गाँव अभी इस उलझन में है कि वह अपनी लोक संस्कृति को जीवित रखे या आधुनिकता की लहर में पश्चिमी संस्कृति का वरण कर ले। ध्यातव्य है कि मैंने भारत की महानगरीय संस्कृति की तो बात ही नहीं की—वह अलग कहानी है। इन सब घटनाओं का समाज पर कोई प्रभाव न हो यह असम्भव है। यह परिवर्तन साहित्य में भी प्रतिबिम्बित होगा।
अंततः यह कहना चाह रहा हूँ कि इस सदी के पहले पच्चीस वर्षों ने पूरी सदी की पटकथा की भूमिका लिख डाली है। इस सदी की कहानी यही है। “इक्कसवीं सदी की कहानियाँ” अन्तिम दस्तावेज़ नहीं है बल्कि इस विषय पर विमर्श का आरम्भ है।
इस सम्पादकीय को समाप्त करते हुए मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा कि कौन-सा भाग वास्तविक है और कौन-सा भाग मेरे बहानों का है। आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है।
— सुमन कुमार घई
टिप्पणियाँ
अंजना वर्मा 2026/09/02 10:02 AM
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य से जुड़ा हुआ आपका संपादकीय विचारोत्तेजक है। युद्ध और आतंकवाद से उत्पन्न तबाही आज पूरे विश्व की चिंता के केंद्र में है। इसके साथ-साथ दुनिया के अनेक देशों की सामाजिक व राजनीतिक उथल-पुथल, नर-संहार, विलुप्त होती हुई लोक-संस्कृति पर जो ध्यान आकृष्ट किया गया है, वह किसी देशवासी की सुरक्षा एवं उसके सांस्कृतिक हितों की रक्षा के संदर्भ में ज़रूरी है। इन गंभीर बातों के साथ बागवानी की चर्चा भी सुखद है। अमित शुभकामनाएँ ! अंजना वर्मा, मुज़फ्फरपुर
राजनन्दन सिंह 2026/09/02 09:01 AM
सादर प्रणाम! स्वीकारोक्ति के बाद बहाने, बहाने नहीं रह जाते! बहुत ही ईमानदार पारदर्शी एवं सच बोलना सिखाती सुंदर संपादकीय । एक प्रसिद्ध गाने की पंक्ति याद आ गई, शायद इस संपादकीय से कुछ मिलती जुलती है। “मैं कहाँ जाऊँ नहीं होता ये फ़ैसला, एक तरफ़ अपना घर, एक तरफ़ मयकदा ” बागवानी भी साहित्य है , और साहित्यकुञ्ज तो बागवानी है हीं।
Dr. Anju Dua Gemini 2026/09/02 07:33 AM
आपका संपादकीय पढ़ा। यह सच है कि कुछ होता है और कुछ छूट जाता है। आपका बागवानी प्रेम और साहित्य प्रेम के बारे में भी जाना। संतुलन बनाना कई बार कठिन हो जाता है लेकिन प्रयास करने पर हो जाता है। मेरी कहानी को स्थान देने के लिए आभार।
डॉ वंदना शर्मा 2026/09/02 07:31 AM
प्रणाम आदरणीय महोदय। आपके बागबानी के शौक और साहित्य कुंज के प्रति समर्पण को देख हमें भी प्रेरणा मिली। प्रकृति से जुड़े रहना सुकून देता है। आपकी संपादकीय कहानी बहुत ही रोचक है पढ़कर आनंद आ गया। ईश्वर से प्रार्थना है आप सपरिवार स्वस्थ रहें और प्रसन्न रहें।
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सम्पादकीय (पुराने अंक)
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- उलझे से विचार
Lakhan lal pal 2026/09/03 06:22 PM
साहित्य कुञ्ज पत्रिका का संपादकीय काफी लेट प्रकाशित हुआ है। संपादक जी ने अंक देर से आने का कारण अपने पाठकों को बता दिया है। मेरे जैसे अन्य पाठकों की शिकायत दूर हो चुकी होगी। आपकी बागवानी में रुचि है, यह पढ़कर अच्छा लगा। बागवानी का हर काम आप स्वयं करते हैं। इस उम्र में भी बेलचे से मिट्टी डालना, घास के बीजों की बुवाई करना, फूल वाले पौधों की रोपाई आदि आश्चर्य से कम नहीं है। ये काम श्रमसाध्य भी है। लेकिन मन की संतुष्टि के लिए यह काम बुरा नहीं है। पौधों को सिंचित करना जिजीविषा को सिंचित करना होता है। यह सिंचन आनंद की अनुभूति को सराबोर करता है। जीवन के एक हिस्से को इन कामों में न्योछावर करना खुद के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी उपकारी है। इक्कीसवीं सदी की कहानियों पर साहित्य कुञ्ज विशेषांक निकाल रहा है, यह सुखद है। ये कहानियां एक साथ निकलेंगी या अंक बाइ अंक! उसी समय पता चलेगा जब पत्रिका का प्रकाशन होगा। इक्कीसवीं सदी के कौन-कौन साहित्यकारों को लिया गया होगा, यह भी उसी समय मालूम चल सकेगा। फिलहाल ये काम आप अच्छा कर रहे हैं। कहानियों के संपादन और चयन में संपादकीय विभाग का दृष्टिकोण भी समझ लेंगे। इसीलिए हम इस अंक का इंतजार करेंगे सर।