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साहित्य कुञ्ज के सभी पाठकों, लेखकों व सहयोगियों को हिन्दी दिवस की बधाई!

जब तक भारत में पाठक साहित्य कुञ्ज के नए अंक को देखेंगे, पढ़ेंगे हिन्दी दिवस–२०२१ बीत चुका होगा। वैसे देखा जाए तो हिन्दी साहित्य के प्रेमियों के लिए तो प्रतिदिन हिन्दी दिवस है; फिर भी, कोई भी उत्सव मनाना सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और यही उत्सवों का महत्व होता है। प्रायः ऐसे अवसरों पर संस्थाएँ और हिन्दी प्रेमी व्यक्तिगत स्तर पर कई बार संकल्प लेते हैं कि आने वाले वर्ष में वह हिन्दी को किस तरह आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। यह भी सराहनीय है। 

विश्व के इस कोने में बैठे हम हिन्दी-प्रेमी भी अपनी तरह से इस दिवस को मनाने का प्रयास करते हैं। हालाँकि हम लोगों के उद्देश्य कुछ और होते हैं और इसका महत्व भी हम लोगों के लिए भारतवासियों से थोड़ा हट कर होता है। यही इस सम्पादकीय का मुख्य विचार है।

मैंने १९७३ के मई महीने में कैनेडा की भूमि पर अपना क़दम रखा था। बहुत से भारतीय उससे पहले से ही यहाँ बसे हुए थे। उनमें से बहुत से हिन्दी प्रेमी लोग भी थे और सभी अपने स्तर पर किसी तरह से हिन्दी से जुड़े रहना चाहते थे। यह उन्हीं लोगों के प्रयास हैं कि आज कैनेडा में हिन्दी साहित्य फल-फूल रहा है। मैं यहाँ यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कैनेडा के हिन्दी भाषियों और यू.एस. के हिन्दी भाषियों कि अलग-अलग चुनौतियाँ रही हैं। इसका कारण दोनों देशों के शासन की आप्रवास नीतियाँ हैं। इसलिए भारतवासियों को दोनों देशों के हिन्दी भाषियों और लेखकों को अलग-अलग दृष्टि से देखना और समझना चाहिए।

मूल रूप से कहा जाए तो यू.एस. नीति "मेल्टिंग पॉट" की है। यानी शासन चाहता है और उनकी नीतियाँ आप्रवासियों को प्रोत्साहित करती हैं कि वह यू.एस. की मुख्यधारा की संस्कृति में घुल-मिल जाएँ। यह बात अलग है कि क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है? माता-पिता, जिस संस्कृति को अपने दिल में बसा कर यू.एस. लाए थे क्या वह नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी उसी संस्कृति को अपनाएँ? इस तरह से यू.एस. के बच्चे दो संस्कृतियों में जीते हैं। यह अन्तर कैनेडा में रहने वाले आप्रवासी अनुभव करते हैं।

दूसरी ओर कैनेडा की नीति "विभिन्न समाजों का एक समाज" है। सरकारी नीतियाँ प्रत्येक आप्रवासी वर्ग को अपनी मूल संस्कृति से जुड़े रहने की सुविधाएँ प्रदान करती हैं। यू.एस. के भारतीय समाज के बच्चों की अगर तुलना कैनेडा के भारतीय समाज के बच्चों से की जाए तो एक सूक्ष्म अंतर दिखाई देता है। नीतियों के अतिरिक्त एक अन्य कारण भी है जो भारतीय मूल के बच्चों की संस्कृति को प्रभावित करता है वह है एक-सी संस्कृति की जनसंख्या की सघनता। 

यू.एस. में किसी भी बड़े शहर के कई उप-नगर होते हैं। समृद्ध परिवार अधिकतर इन उपनगरों में रहना पसंद करते हैं। इसके कई मुख्य कारण हैं। भूमि की उपलब्धता, घरों के प्लॉट बड़े होते हैं। छोटे शहरों का सामाजिक गठन अधिक सघन होता है। अपराध दर की कमी इत्यादि कुछ अन्य कारण हैं।  इन उपनगरों सीधा प्रभाव आप्रवासियों पर यह होता है कि वह बिखर जाते हैं। संस्कृति समाज में पनपती है। जहाँ पर समाज छितर जाता है संस्कृति भी छितरने लगती है।

कैनेडा की जनसंख्या यू.एस. की जनसंख्या का आठवां भाग है। इसलिए कैनेडा में महानगर एक हाथ कि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। अगर इनके उपनगर हैं भी तो वह भी महानगर से जुड़े हुए ही हैं। इसलिए भारतीय मूल का समाज बिखरता नहीं है। उदाहरण के तौर पर टोरोंटो के कुछ हिस्से हैं जहाँ पर आपको वर्ग विशेष की बहुलता मिलेगी। चाहे वह गुजराती हों, श्रीलंका के लोग हों, चीनी हों या इटालियन हों। टोरोंटो का उपनगर ब्रैमप्टन लघु पंजाब है। आप पूरा दिन बाहर, बिना अंग्रेज़ी बोले बिता सकते हैं। पंजाबी, हिन्दी से ही काम चल जाता है। इसका सीधा असर आप्रवासियों की दूसरी पीढ़ी की संस्कृति पर पड़ता है। प्रायः मेरी पीढ़ी के लोग जब मिलकर बात करते हैं तो एक रोचक स्मृति पर चर्चा होती है। जब लोग हम लोग, यानी जो सत्तर के दशक में यहाँ आए, वह पार्टियों में अंग्रेज़ी गानों पर डांस करते थे। आज के समय में जब हमारे बच्चों की पार्टियाँ होती हैं तो वह भारतीय संगीत, मुख्यतः पंजाबी संगीत पर भांगड़ा करते हैं, गुजराती का गरबा, डांडिया होता है। हाँ, एक दो अंग्रेज़ी की धुनें भी चल जाती हैं।

इसमें कोई दो मत नहीं हो सकते कि संस्कृति और भाषा का चोली-दामन का साथ है। भारतीय इस बात को समझते हैं और इसलिए अपने बच्चों को हिन्दी या अपनी मातृभाषा सिखाने का प्रयास दोनों देशों यानी कैनेडा और यू.एस. में करते हैं। इस प्रयास में मंदिरों, गुरुद्वारों की मुख्य भूमिका है। स्वैच्छिक कार्यकर्ता बच्चों को हिन्दी सिखाते हैं। बच्चों के हिन्दी में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। यह बात अलग है कि बड़े होने पर बच्चे हिन्दी से टूट जाते हैं, परन्तु हिन्दी समझते भी हैं और अगर कहीं आवश्यकता पड़े तो टूटी-फूटी हिन्दी बोल कर काम चला लेते हैं। समय-समय पर हम लोग फिजी या मॉरीशियस की उदाहरण की चर्चा करते हैं। शायद जिस समय उन्होंने हिन्दी को सँभाला उनकी परिस्थितियाँ अलग रही होंगी। 

विदेशों में भारतीय आप्रवासी समाज की एक समस्या यह भी है कि भारत के महानगरों से आने वाले नए आप्रवासी हिन्दी बोलते तो हैं परन्तु पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त नहीं हैं। जो अंग्रेज़ी माध्यम में  पढ़े हैं वो तो पढ़-लिख भी नहीं पाते। यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि हिन्दी भाषी आप्रवासी समाज अगली पीढ़ी में हिन्दी पहुँचाए तो कैसे? जो बच्चे यहाँ पले-बढ़े हैं वह इस समीकरण का भाग नहीं हैं।

आज हम हिन्दी दिवस मना रहे हैं। विश्व के अलग-अलग कोनों में मना रहे हैं परन्तु मूलतः एक ही चिन्ता से ग्रस्त हैं। भारत में संचार क्रान्ति से हिन्दी के संदर्भ में आशा की किरण गाँवों, क़स्बों से दिखाई देती है। साहित्य कुञ्ज के अधिकतर नए लेखक महानगरों से नहीं बल्कि गाँवों और क़स्बों से आ रहे हैं। महानगरों से नई पीढ़ी का पदार्पण न के बराबर है। आज हिन्दी में नई ऊर्जा की आवश्यकता है। इसमें मैं एक समस्या देख पा रहा हूँ वह यह है कि हिन्दी को प्रोत्साहन करने वाले संकाय, प्रतिष्ठान, सरकारी संस्थाएँ महानगरों में स्थापित हैं, जहाँ हिन्दी का नया लेखन न के बराबर है। अब गाँवों, क़स्बों के लेखक और साहित्यकार इन प्रतिष्ठानों तक पहुँचें तो कैसे? प्रवासी हिन्दी लेखक के लिए यह समस्या नहीं है, क्योंकि आजकल प्रवासी साहित्य फ़ैशन में है। नित नए कार्यक्रम प्रवासी लेखकों के लिए आयोजित हो रहे हैं। ऐसे में चिन्ता है तो कि भारत की साहित्यिक कोंपल प्रस्फुटित, पुष्पित और पल्लवित हो तो कैसे?

— सुमन कुमार घई
 

टिप्पणियाँ

सरोजिनी पाण्डेय 2021/09/16 10:41 AM

आदरणीय संपादकीय हृदय को छू गया आप वहां इतनी दूर बैठे इस पीड़ा का अनुभव रहे हैं परंतु अपने देश में भाषा की किसी को चिंता नहीं है। यदि भाषा का बिंदु कभी उठता भी है तो राजनैतिक विखंडन के भय से तुरंत दबा दिया जाता है। हिंदी फिल्म को देखिए ,केवल मूर्ख विदूषक या भृत्य वर्ग ही हिंदी भाषा का प्रयोग करता हुआ दिखाया जाता है ।हंसने के लिए शुद्ध हिंदी भाषा के शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।यह सब देख कर बहुत पीड़ा होती है परंतु इसका समाधान कैसे हो यह समझ में नहीं आता! मार्मिक संपादकीय के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन

महेश रौतेला 2021/09/16 09:53 AM

स्थिति बहुत निराशाजनक भी नहीं है। बोलचाल में तो हिन्दी के बिना काम भी नहीं चलेगा,भारत में। बोलचाल वाली भाषा उतनी ही सशक्त होती है जितनी लेखन वाली। मैं यूरोप घूमने गया था, म्युनिख( जर्मनी) में लौटते समय हवाई जहाज में तकनीकी खराबी आ गयी थी। काउंटर पर बंगाल से आये लोग हिन्दी में काउंटर पर बैठी महिला से बोले जा रहे थे। लेकिन काउंटर पर बैठी महिला जर्मन और अंग्रेजी ही जानती थी। दूसरी घटना बड़ौदा की है। मेरा फोन खो गया था। मैं बड़ौदा पुलिस स्टेशन( सियाजी) गया। पुलिस वाले ने कहा एफआईआर आप गुजराती या हिन्दी में दे सकते हैं। अंग्रेजी में नहीं दीजिएगा। अंग्रेजी भारत में हम वर्ग विशेष के स्वार्थों को आरक्षित करती है।

मधु शर्मा 2021/09/16 12:37 AM

हिन्दी-भाषा प्रेमियों को हिन्दी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ। मैं स्वयं अपनी मातृ-भाषा की अपराधिनी हूँ। दोनों बेटियाँ यहाँ इंग्लैंड में जन्मी व बड़ी हुईं परन्तु स्कूल आरम्भ करने के दो-चार साल वर्ष उपरान्त ही उन्होंने अंग्रेज़ी को अपनी मुख्य भाषा अपनाते हुए जाने कब व कैसे हिन्दी को भुला दिया। कुछ परेशानियों को सुलझाने हेतु जब छ: माह के लिए दोनों बेटियों को साथ ले जाकर भारत रहना पड़ गया तो दोनों ही फिर से हिन्दी बोलने (व कुछ-कुछ पढ़ने) लग गईं। बीस वर्ष बाद भी अभी तक भगवद् कृपा बनी हुई है। लेकिन क्या केवल यही समाधान है जिससे हम प्रवासियों के बच्चे हिन्दी से जुड़े रहें?

राजनन्दन सिंह 2021/09/15 06:14 PM

भारत में हिन्दी की दशा अब यह है कि शहर हो या गाँव पच्चीस वर्ष आयु तक के कान्वेंट शिक्षित बच्चे हिन्दी में गिनती सिर्फ तीस तक ही जानते हैं। अगर किसी को किसी ने सैंतीस कह दिया तो वे थर्टी सेवेन बोलकर दुबारा यह जाँच करते हैं कि वे सही समझ रहे हैं या गलत। हिन्दी सभाओं का आयोजन तथा सरकारी प्रोत्साहन प्रभावशाली एवं स्थापित लोगों तक सिमटकर रह गया है। टीवी पर एक हजार चैनलों में हिन्दी साहित्य को समर्पित एक भी चैनल नहीं है। कोई चैनल साहस जुटाकर कवि सम्मेलन जैसा कोई कार्यक्रम बनाता भी है तो वह कार्यक्रम दक्षिण अफ्रीकी गरीब बच्चों की तरह कुपोषण का शिकार होकर साल भर के भीतर ही चल बसता है। छोटी-मोटी नौकरी के लिए भी अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है। हिन्दी पढने लिखने वाले यदि भाग्यशाली नहीं है उन्हें सरकारी नौकरी यदि नहीं मिली तो वे फिर कहीं के नहीं है। ऐसा लगता है जैसे हिन्दी को सिर्फ इसलिए जीवित रखा गया है ताकि आम लोग नेताओं के भाषण एवं कपनियों के विज्ञापन समझ सके। वरना हिन्दी की हिन्दुस्तान में वह दशा है जो पहले हमारे देश की बसों में लिखा होता था। "यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें" मैं भारत में हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह हिन्दी पखवाड़े का अकेले बहिष्कार करता हूँ। विशेषकर जबसे मुझे पता चला कि हिन्दी दिवस मनाया क्यों जाता है। राजभाषा का दर्जा हिन्दी का अपमान है। जैसे बिना किसी अधिकार या सम्मान का मंत्री। मिनिस्टर विदाउट प्रोफाइल। भारत में हिन्दी भाषी राज्यों सहित अलग अलग राज्यों के अलग अलग बाइस क्षेत्रीय राजभाषाएँ है। तो हिन्दी कहाँ की राजभाषा है? और यदि यह केन्द्रीय राजभाषा है तो भारत सरकार के कितने विभागों में राजकाज की भाषा के रूप में प्रयोग होती है? भारत की राजभाषाएँ तो बाइस है। राष्ट्रभाषा क्या है? अंग्रेजी का मैं विरोध नहीं करता मगर अंग्रेजी किस हैसियत से भारत की सरकारी एवं अन्य कार्यों की भाषा बनी हुई है? ऐसे बहुत सारे प्रश्न है जो मन में आते हैं जिनका कोई ठोस या अधिकारिक जबाब नहीं मिलता। ऐसे में हिन्दी के लिए संपादक जी की चिंता उचित हीं है कि "भारत की साहित्यिक कोंपल प्रस्फुटित, पुष्पित और पल्लवित हो तो कैसे हो?

पाण्डेय सरिता 2021/09/15 02:13 PM

हमेशा की तरह एक अलग विषय की संवेदनशीलता से भरी हुई सारगर्भित लेख

प्रीति अग्रवाल 2021/09/15 03:18 AM

सुंदर विश्लेषण, हमेशा की तरह आपका सम्पादकीय नई सोच लेकर आता है। नए अंक के सफल प्रकाशन हेतु बधाई आदरणीय। मेरी रचना को पत्रिका में स्थान देने के लिए हार्दिक आभार!

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