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प्रिय मित्रो,

बहुत पहले संभवतः एक या दो सम्पादकीयों में मैंने ऐतिहासिक कथा साहित्य के विषय पर अपने विचार आपके साथ साझा किए थे। इस बार भी इसी विषय पर, दो कहानियों के आधार पर, आप से एक चर्चा आरम्भ करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि यह केवल एक सम्पादकीय न होकर बल्कि एक संवाद का आरम्भ हो। मेरे जो भी विचार हैं वह मैं आपके समक्ष रखने जा रहा हूँ। आपके विचार प्रतिक्रिया या आलेख के रूप में पढ़ने की प्रतीक्षा रहेगी।

मैं ऐतिहासिक-कथा कैसे परिभाषित करता हूँ—यहीं से चर्चा आरम्भ करते हैं। क्या ऐतिहासिक कथा एक साधारण कहानी हो सकती है जिसे केवल ऐतिहासिक बनाने के लिए कुछ पात्र इतिहास से उठा लें और उन्हें लेकर कहानी को उन्हीं पात्रों के जीवन काल में रच दें—कदापि नहीं। ऐतिहासिक कहानी यथार्थ के आधार पर रची जा सकती है। वास्तविक घटना, वास्तविक पात्र और काल-परिवेश को नहीं बदला जा सकता है। लेखक को संवाद से, कथा-शिल्प से रचना को निखारने की स्वतन्त्रता रहती है। इतिहास में काल्पनिक संभावनाएँ नहीं होतीं—यह मैं इसलिए बलपूर्वक कह रहा हूँ क्योंकि मैं प्रायः कहानी को परिभाषित करते हुए कहता हूँ कि ‘कहानी यथार्थ की काल्पनिक संभावनाएँ’ होती है। ऐतिहासिक कहानी में कल्पना के लिए मात्र संवाद ही रह जाते हैं। यहाँ पात्रों का आचरण, भाषा और काल के सामाजिक व्यवस्था, यहाँ तक कि वस्त्र, आभूषण इत्यादि भी नहीं बदले जा सकते।

इस अंक में दो ऐतिहासिक कहानियाँ प्रकाशित हो रही हैं। दोनों के देश, काल अलग-अलग हैं और दोनों ही कहानियाँ कथा-शिल्प की पराकाष्ठा को छू रही हैं। पहली कहानी के लेखक हैं प्रदीप श्रीवास्तव और कहानी का शीर्षक है—ख़ानुम-अमर। दूसरी कहानी डॉ. शैलजा सक्सेना ने लिखी है और इस कहानी का शीर्षक है—हम ज़िंदा हैं

पहले मैं ‘ख़ानुम-अमर’ पर अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ। ख़ानुम बादशाह अकबर की पुत्री थी और अमर सिंह महाराणा प्रताप के पुत्र और उत्तराधिकारी। प्रायः अकबर और महाराणा प्रताप का इतिहास महाराणा की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है। उससे आगे, कम से कम हमें तो पढ़ाया नहीं गया। यह नहीं बताया गया कि महाराणा के पुत्र अमर सिंह ने मुग़ल सल्तनत के विरोध की बाग-डोर वहीं से सँभाली थी जहाँ महाराणा की मृत्यु के कारण उनके हाथों से सरकी थी। अमर सिंह ने अपने जीवन काल में मुग़लों के साथ सत्रह युद्ध किए और एक भी युद्ध में पराजित नहीं हुए। यहाँ तक कि जहाँगीर इस निरन्तर संघर्ष से हताश हो गए और अंततः शांति स्थापित करने के लिए उन्होंने अपनी बहन—ख़ानुम का विवाह अमर सिंह से कर दिया। युद्ध फिर भी चलते रहे संघर्ष जीवित रहा।

अंत में जहाँगीर ने अपने सबसे लायक़ पुत्र शहज़ादा ख़ुर्रम (शाहजहाँ) को रण के मैदान में उतारा। ख़ुर्रम ने अमर सिंह को सीधी चुनौती देने की बजाय, निहत्थे ग्रामीणों को अपनी हताशा का निशाना बनाना आरम्भ कर दिया। गाँव और फ़सलें जलाई जाने लगीं। पुरुषों और बच्चों का नर-संहार किया गया, और महिलाओं, बच्चियों को बंदी बनाकर दिल्ली भेजना शुरू कर दिया। जहाँ वह बिकने लगीं और हरम का हिस्सा बनने लगीं। ग्रामवासियों को बचाने के लिए अमर सिंह के पुत्र कर्ण सिंह और ख़ुर्रम के बीच संधि हुई। इस संधि के मुख्य बिन्दु नीचे दिए गए हैं:

  • महाराणा अमर सिंह को दरबार में उपस्थित होने की बाध्यता नहीं होगी।  

  • मेवाड़ का शासन मेवाड़ के ही हाथ में रहेगा, और चित्तौड़ सहित क्षेत्र उन्हें वतन जागीर के रूप में दिया गया।

  • चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत या पुनर्निर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया, ताकि मेवाड़ पुनः शक्तिशाली न हो सके। 

  • कर्ण सिंह (अमर सिंह के पुत्र) मुग़ल दरबार में मेवाड़ का प्रतिनिधित्व करेंगे और उन्हें 5000 का मनसब दिया जाएगा। 

  • कोई वैवाहिक संधि अनिवार्य नहीं होगी, अर्थात मेवाड़ को राजपूतों की तरह शाही विवाह संबंधों में बँधने की बाध्यता नहीं थी।

मुग़लों के लिए यह अभूतपूर्व शर्तें थीं। अमर सिंह और ख़ानुम के विवाह को गौण कर दिया गया।

प्रदीप जी की कहानी का मूल यही है—इतिहास के सत्य को उजागर करना। दुर्भाग्य से अभी तक यही नियम था कि अगर इतिहास बदला नहीं जा सकता, तो उसे पढ़ाना बंद कर दो। अपने-आप समय के साथ सत्य धूमिल हो जाता है। इसी सत्य को जीवित रखने का दायित्व साहित्यकार का भी होता है। साहित्यकार उसे अपने कथानक में आमजन तक पहुँचा देता है और लोक-साहित्य रच देता है।

दूसरी चर्चित कहानी है डॉ. शैलजा सक्सेना की कहानी—हम ज़िंदा हैं। मैं चर्चा आरम्भ करने से पहले ही पाठकों से क्षमा याचना कर रहा हूँ क्योंक इस समय मेरा रोष मुझ पर हावी हो रहा है; मेरी भाषा कटु हो सकती है। इसके दो कारण हैं। पहला कारण वह इतिहास है जो कैनेडा के इतिहास का काला अध्याय है। दूसरा कारण यह है कि भारत की एक प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक ने इसे अपनी विचारधाराओं के अनुकूल न होने के कारण प्रकाशित नहीं किया। वह कहानी की आत्मा को ही मार देना चाहते थे। शैलजा ने उनके परामर्श को स्वीकार नहीं किया।

अब मैं कहानी के इतिहास की भी बात कर ही लूँ। यह कहानी मैंने उसी दिन पढ़ ली थी जिस दिन डॉ. शैलजा ने लिखने के पश्चात मुझे अपने विचार प्रकट करने के लिए भेजी थी। शायद एक या दो वर्ष पूर्व यह कहानी पढ़ी थी। उस समय कहानी को लिखने के पश्चात शैलजा बहुत भावुक थीं और पढ़ने के बाद मैं भी भावुक था। आँसुओं को रोक पाना आसान नहीं था। शैलजा ने मेरे विचार जानने चाहे तो मैंने कहा था कि इस इतिहास को वैश्विक पटल सबके सामने रखना आवश्यक है। कहानी इसके लिए उचित माध्यम है। शैलजा चाहती थीं यह कहानी भारत की प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हो। सो प्रकाशन के लिए कहानी भारत भेज दी।

सम्पादक महोदय देर तक कहानी को लेकर बैठे रहे और बाद में उन्हों ने अपनी टिप्पणियों के साथ कहानी लौटा दी। शैलजा ने मुझे फिर से कहानी भेजी और पूछा कि क्या मुझे इस कहानी में कुछ आपत्तिजनक लग रहा है या मैं इसमें कुछ संशोधन चाहता हूँ। पहली पंक्ति पढ़ते ही मुझे पूरी कहानी याद आ गयी। फिर भी मैंने इसे दूसरी बार पढ़ा और शैलजा को बताया कि यह एक सशक्त कहानी है। इसमें किसी संशोधन की आवश्यकता नहीं है। आश्वस्त होने पश्चात डॉ. शैलजा सक्सेना ने मुझे सम्पादक महोदय की टिप्पणियों के बारे में बताया। कुछ टिप्पणियाँ उनकी व्यक्तिगत राजनीति से प्रभावित थीं। उन्हें आपत्ति कथानक की अतिभावुकता पर भी थी। कुछ आपत्तियाँ उनके ऐतिहासिक अज्ञान से प्रभावित थीं। ऊपर से इतिहास को जानने के श्रम में आलसीपन से भी उनकी विचारधारा प्रभावित थी।

हम दोनों ने निर्णय लिया कि यह कहानी साहित्य कुञ्ज में प्रकाशित होगी। मुझे विश्वास है को यह कहानी चर्चित होगी और देश और काल की सीमाओं को लाँघेगी।

इतना कुछ कह देने के बाद मैं उस इतिहास की भी चर्चा करूँगा जिस पर यह आधारित है।

यद्यपि कैनेडा और यू.एस.ए. उत्तरी अमेरिका के देश हैं, पड़ोसी हैं और मूलतः सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से एक-से ही हैं। कुछ सूक्ष्म और ऐतिहासिक अंतर हैं। यू.एस.ए. में दास-प्रथा बहुत देर तक चलती रही दूसरी ओर क्योंकि कैनेडा ब्रिटेन का उपनिवेश था तो यहाँ दास प्रथा इंग्लैंड में दास-प्रथा के साथ ही समाप्त हो गई। यह एक ऐसा अंतर है जिस पर कनेडियन सदा गर्व करते हैं। यहाँ तक कि यू.एस.ए. के जो दास भगौड़े होते, वह कैनेडा में शरण लेते थे। यहाँ तक तो सब ठीक है। कहानी इस पर तो आधारित भी नहीं है।

मैं इतिहास के और भी पुराने कालखण्ड में जाना चाहता हूँ। उस समय यहाँ के आदिवासी/मूल-निवासी अलग-अलग जनजातीय समूहों बँटे हुए थे। सबके अपने-अपने रीति-रिवाज़ थे। इनमें से अधिकतर घुमंतू प्रवृत्ति के लोग थे। फिर भी इन लोगों ने महाद्वीप के भू-भागों को चिह्नित सीमाओं में बाँटा हुआ था। धार्मिक आस्था के अनुसार यह आर्य लोगों की तरह प्रकृति से जुड़े हुए थे। भूमि, जल, वायु, अग्नि और पशु-पक्षियों को पवित्र मानते थे। जल और भूमि को प्रदूषित करना पाप के समान था। इनकी अपनी अलग-अलग भाषाएँ थीं।

जब यूरोपियन लोग यहाँ आए तो वह अपने साथ यूरोप की बीमारियाँ भी लाए और धर्म-परिवर्तन की महामारी भी उनके साथ ही आई। बहुत से जन-समूह बीमारी की भेंट चढ़ गए। जब आगंतुकों ने उनकी भूमि पर अधिकार जमाना आरम्भ किया तो मूल-निवासियों ने (जिन्हें ’इंडियन’ या ’रेड इंडियन’ कहा जाता था) सशस्त्र विरोध करना आरम्भ किया। युरोपियन शस्त्रों के आगे धनुष बाण कब टिक पाते। अंततः संधियाँ होनी आरम्भ हुईं। मूल-निवासियों को बंजर, रेतीली भूमि पर सीमित कर दिया गया। श्वेतवर्णी क्रिश्चियन आक्रांताओं को फिर भी संतोष नहीं हुआ। वह सभी मूल-निवासियों की आस्था को बदल कर उन्हें क्रिश्चियन बनाना चाहते थे।

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कैनेडा में चर्च ने १८३० में मिशन स्कूल बनाने आरम्भ किए जिन्हें १८८० में केन्द्र शासन ने अपने अधिकार में ले लिया। सरकार ने कुल मिला कर १३० रेज़िडेंशियल स्कूल बनाये। इन स्कूलों में बच्चों के रहने की व्यवस्था भी थी।

स्कूल में बच्चों को बलपूर्वक माँ-बाप से छीनकर भर्ती किया गया। बच्चों को जान-बूझकर उनके जन-समूह से दूर के स्कूलों में ले जाया गया। सम्पूर्ण परिवर्तन के लिए उनका धर्म, भाषा, संस्कृति को नष्ट करना आवश्यक था। बच्चों को अपनी भाषा बोलने की अनुमति नहीं थी। खाना-पीना और पहनावा तो बदलना ही था। बच्चों के नाम तक बदल दिए गए। इस तरह कालांतर में १५०,००० बच्चे उठाए गए। अंतिम स्कूल १९९६ में बंद हुआ। इन स्कूलों का आदर्श वाक्य था “बच्चे के अंदर का इंडियन मार दो)।

इन संस्थानों में बच्चों को मानसिक, यौनिक, शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा। कुपोषण या बीमारियों से हज़ारों बच्चों की मृत्यु हो गई। क्योंकि नाम बदल दिए गए थे इसलिए मृत बच्चों की लाशों को चर्च ने ही अचिह्नित क़ब्रों में दफ़ना दिया। माता-पिता वर्षों तक अपने बच्चों के लिए तड़पते रहे। यह अमानुषिक प्रक्रिया १६० वर्षों से अधिक समय तक चलती रही। इस समय तक “अंडर ग्राउंड राडार” की सहायता से ६००० से अधिक बच्चों के नर-कंकाल मिल चुके हैं।

शैलजा की कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी घटित इस त्रासदी का बखान करती है। एक भारतीय लड़की, श्वेतवर्णी ब्रिटिश आक्रांताओं द्वारा भारत में किए गए नर-संहार और एक मूलनिवासी माँ उत्तरी अमेरिका में हुए उन्हीं आक्रांताओं के द्वारा किए नर-संहार की पीड़ा को साझा करती है और अपनी यौन-शोषित मृत बेटी को याद करती है। 

भारत के सम्पादक महोदय के अनुसार लेखिका ’अतिभावुक’ हो गई है। ‘इतिहास में ऐसा हुआ तो है परन्तु इतना अधिक भी नहीं’ इत्यादि-इत्यादि टिप्पणियों को सुनने के बाद मन की कड़ुवाहट को इस सम्पादकीय में आपके समक्ष रख दिया है।

प्रश्न यह भी है कि साहित्य में इतिहास के साथ कितनी छेड़-छाड़ अपेक्षित है?

आप निवेदन है कि आप इन दो कहानियों को पढ़ें और अपने मित्रों से भी इन्हें पढ़ने के लिए कहें। अपने विचारों, प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

— सुमन कुमार घई

टिप्पणियाँ

Lakhan lal pal 2026/05/01 04:49 PM

साहित्य कुञ्ज के इस बार के संपादकीय में इस बात पर जोर दिया गया है कि ऐतिहासिक कहानियों में कल्पना का मिश्रण कहां तक उचित है! इस संदर्भ में दो कहानियां इस विषय के केन्द्र में है। इसमें एक कहानी प्रदीप श्रीवास्तव जी की 'खा़नुम-अमर' है, जो मुगल बादशाह जहांगीर की पुत्री खा़नुम तथा महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह के विवाह से संबंधित है। दूसरी डाॅ शैलजा सक्सेना जी की कहानी 'हम ज़िंदा हैं।' चूंकि भारतीय इतिहास को हम लोग थोड़ा बहुत जानते हैं। अगर इतिहास के मुख्य नायकों की बात आ जाती है तो वे पात्र हमारे जेहन में जल्दी चढ़ जाते है। पर इसी में कुछ छिपे हुए इतिहास भी होते हैं। प्रदीप जी की कहानी इसी छिपे इतिहास को उजागर करती है। इस संबंध में संपादकीय में इसका जिक्र किया गया है। अब इसमें कितनी सच्चाई है, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है। हो सकता है लेखक ने कहानी में इसके स्रोत का जिक्र किया हो! अमेरिकी मूल निवासी रेड इंडियन वाली बात में ऐतिहासिक छुपमछुपाई वाली बात नहीं है। कहानी में जिस विषय को लिया गया है वह इतिहास में दर्ज है। डॉ शैलजा सक्सेना जी की कहानी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। लेकिन भारतीय संपादकों की प्रतिक्रिया उसकी ऐतिहासिकता पर नहीं है, अति भावुकता पर है। उन संपादकों की बात से मैं भी सहमत हूं। ऐतिहासिक कहानी अतिभावुक होकर नहीं लिखी जा सकती है। इससे पक्षपात का खतरा रहता है। लेखक का काम होता है कि कला के माध्यम से सब-कुछ पाठकों के सामने रख दिया जाता है। यहां तक कि भावुकता को भी। च्यूंटी लेकर रुलाने से बेहतर है कि वे परिस्थितियां सामने रख दी जाएं जिससे स्वाभाविक रूप से रोना आ जाए। ऐतिहासिक कहानीकारों की भूमिका वैसी होनी चाहिए जैसे जंगल में सैलानी वहां की तस्वीरें लेते हैं लेकिन शेर से हिरन की रक्षा नहीं करते हैं। ऐतिहासिक कहानियों को लिखते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि घटनाओं से छेड़छाड़ न हो। संवाद या पात्रों के मानसिक द्वंद्व लेखक की कल्पना के बिना पूरे नहीं हो सकते हैं। हम पूरे यकीन से नहीं कह सकते हैं कि ऐतिहासिक पात्रों की जो वार्ता हुई होगी लेखक ने वही दर्शाया है।उस समय ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं होती थी, इसलिए लेखक से यह आशा करना व्यर्थ है कि पात्रों ने वही बोला था जो लेखक ने लिखे हैं। वह लेखक बड़ा हो जाता है जिसके लिखे संवाद इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि लोग उन संवादों को मूल पात्र के बोले मान लेता है। पात्रों के बीच बोले गए संवादों को लेखक कल्पना के सहारे व्यक्त करेगा। कहानी को रुचिकर बनाने के लिए कुछ काल्पनिक पात्रों का भी सृजन कर सकता है। जयशंकर प्रसाद जी ने अपने नाटकों में बहुत से काल्पनिक पात्र गढ़े हैं। चूंकि इतिहास और साहित्य दोनों अलग-अलग चीजें हैं। बिना कल्पना के साहित्य रचा ही नहीं जा सकता है। अगर उसमें कल्पना नहीं है तो वह साहित्य हो ही नहीं सकता है। वह विशुद्ध इतिहास होगा। अगर साहित्य में इतिहास नहीं होगा तो वह ऐतिहासिक साहित्य हो ही नहीं सकता है। वह रिपोर्टिंग होगी। कई बार देखने को मिलता है कि कुछ साहित्यकार समाज की सच्ची घटनाओं पर इतने केंद्रित हो जाते हैं कि कल्पना को बिलकुल जगह नहीं दे पाते हैं। इस कारण वह रचना खाली रिपोर्टिंग रह जाती है।

Anima Das 2026/05/01 11:03 AM

सादर धन्यवाद सर.... इस संपादकीय के लिए ????.... शैलजा जी की भावनाएँ... विश्व साहित्य को उनका यह अवदान... भारतीय जन समूह तथा युवा पीढ़ी को उनके द्वारा दी गई सत्य - जानकारी तथा हमारे पूर्व योद्धाओं के बलिदान की सत्य -कथा.... ये सबकुछ यहाँ की पत्रिकाओं के लिए निरर्थक हैं.... क्योंकि हमारे देश की युवा पीढ़ी और यहाँ का साहित्य सबके सब अतीत को और भारत के इतिहास को केवल एक झूठी कहानी मानते हैं और अंग्रेजो के बाद एक विशेष दल के लोगों के बलिदान पर विश्वास रखते हैं.... उनके लिए वही इतिहास है... जाति भेद... बाल विवाह.. विधवा रोग.... बेरोजगारी, किसानों का उत्पीड़न.... सनातन विरोधी संग्राम.....आदि ही आगे बढ़ते जाएँगे.... साहित्य का सौंदर्य बढ़ाएँगे..... पूरे संपादकीय पढ़ते हुए बहुत दुःख हुआ..... कि हमारी पीढ़ी को भी आजतक कुछ समझमें नहीं आया..... साधुवाद ????

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