प्रिय मित्रो,
सम्पादकीय के विषय पर आने से पहले मैं एक शोक समाचार आपको देना चाहता हूँ। कैनेडा से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’ के संस्थापक, प्रकाशक और सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी जी नहीं रहे। यद्यपि वह अँग्रेज़ी के अध्यापक रहे परन्तु हिन्दी के प्रति उनका प्रेम और प्रतिबद्धता का साक्षात प्रमाण ‘हिन्दी चेतना’ का निरन्तर प्रकाशन है। मेरा त्रिपाठी से परिचय ‘हिन्दी साहित्य सभा’ के एक वार्षिक कार्यक्रम के अवसर पर हुआ और उसके दो-तीन सप्ताह के बाद ही मैं ’हिन्दी चेतना’ के प्रकाशन में उनका सहायक और सह-सम्पादक का कार्यभार सम्भालने लगा। लगभग पाँच वर्ष तक मैं हिन्दी चेतना में सक्रिय रहा। इस दौरान मैं साहित्य कुञ्ज भी आरम्भ कर चुका था। हिन्दी चेतना छोड़ने के बाद भी यदा-कदा जब भी त्रिपाठी जी को कोई तकनीकी समस्या आती तो वह मुझे ही फोन करते। धीरे-धीरे हम दोनों की उम्र भी बढ़ती गई और दूरियाँ भी। वैसी दूरी नहीं जैसी आप समझ रहे हैं—पहले मैं उनसे २० मिनट की दूरी पर रहता था और अब एक घंटे की दूरी पर रहता हूँ। जब कभी भी मिलते तो पुराने दिन अवश्य याद करते, गले मिलते और बिना बात के हँसते। त्रिपाठी जी एक दृढ़ निश्चय और कर्मठ व्यक्ति थे। मुझे गर्व है कि हम दोनों ने मिलकर हिन्दी चेतना को एक स्थानीय पत्रिका से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया। परमात्मा उनकी आत्मा को शांति दे। कल उनके अंतिम संस्कार के लिए जा रहा हूँ। एक बार फिर से पुरानी स्मृतियाँ उफन आएँगी।
आप सभी लोग जानते हैं कि मेरा पिछला सम्पादकीय इतिहास की पृष्ठभूमि वाली कहानियों पर था। यह दोनों कहानियाँ साहित्य कुञ्ज के मई प्रथम अंक में प्रकाशित हुई थीं। एक कहानी भारत में प्रदीप श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गई थी जो भारतीय इतिहास के एक कालांश पर आधारित थी और दूसरी कहानी कैनेडा के इतिहास पर आधारित थी जिसे डॉ. शैलजा सक्सेना ने लिखा था। मेरे सम्पादकीय में मेरे उत्तेजित भाव थे और मैंने आपकी प्रतिक्रिया को आमन्त्रित किया था इसलिए मैं आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा भी कर रहा था। रोचक प्रतिक्रिया मिली। यह प्रतिक्रिया कहानी पर की गई टिप्पणियों और साहित्य कुञ्ज के व्हाट्स ऐप ग्रुप के वार्तालाप में देखने को मिली। मैं सबकुछ पढ़ता रहा; आपके विचारों को और आपके भावों को आत्मसात करता रहा।
जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ कि यह सत्य है कि प्रवासी साहित्य भारतीय साहित्य जैसा तो है पर भारतीय साहित्य से अलग है। कहना तो नहीं चाहता परन्तु एक तरह से हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा में प्रवासी साहित्य की एक अलग जगह है। यह भारतीय नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे इंग्लैंड में लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ब्रिटिश साहित्य है, यू.एस.ए. लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ‘अमेरिकाना’ साहित्य है, कैनेडा में लिखा गया अँग्रेज़ी साहित्य ‘कैनेडियाना’ साहित्य है और न्यूज़ीलैंड के साहित्य को ‘कीवी’ साहित्य कहा जाता है। इन देशों के साहित्य की चाहे भाषा एक ही है परन्तु साहित्य पर सामाजिक, ऐतिहासिक भगौलिक अनुभव और प्रभाव भिन्न-भिन्न हैं जो इन्हें अलग-अलग करते हैं। इसलिए इंग्लैंड के रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को, कैनेडा में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को और यू.एस.ए. में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को केवल प्रवासी साहित्य की संज्ञा दे देना न्याय संगत नहीं है।
मई प्रथम अंक में मेरे सम्पादकीय में मेरा आक्रोश उस सम्पादक के प्रति था जिसने डॉ. शैलजा की कहानी को इसलिए प्रकाशित करने से मना कर दिया था क्योंकि वह कैनेडा में घटित ऐतिहासिक घटनाक्रम को पूर्णतः समझ नहीं पाया था या उससे अनभिज्ञ था।
अब आक्रोश की अवस्था बीत चुकी है तो अपने आप से प्रश्न कर रहा हूँ कि एक भारतीय सम्पादक से—जिसने कभी कैनेडा के इतिहास को जान ही नहीं है, कनेडियन जीवन जीया ही नहीं है—मैं अपेक्षा कर रहा हूँ कि वह एक प्रवासी कनेडियन हिन्दी कहानीकार की सम्वेदना को समझ पाये।
अब इससे आगे बढ़ता हूँ और एक प्रश्न करता हूँ कि एक प्रवासी लेखक की (वह किसी भी भू-भाग का हो सकता है) हिन्दी साहित्य की मुख्यधारा से क्या अपेक्षाएँ हैं? क्या वह मुख्यधारा का लेखक बनना चाहता है या वह मुख्यधारा से पृथक अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है? इंटरनेट के आरम्भिक दिनों में जब प्रवासी साहित्य वैश्विक पटल पर उदय होने लगा तो भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं ने प्रवासी विशेषांक प्रकाशित करने आरम्भ कर दिए। आरम्भिक दिनों में तो विदेशों लेखक हर्षित थे कि उनकी रचनाएँ भारत में प्रकाशित होने लगी हैं। शीघ्र ही वास्तविकता ने भी दस्तक देनी आरम्भ कर दी। आलोचकों ने प्रवासी साहित्य पर अपने व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान के आधार पर अलग अलग चिपकियाँ चिपकानी आरम्भ कर दीं। इसे प्रवासी लेखक कड़वा घूँट समझ कर पीता रहा। अपने मन को किसी तरह समझा लेता कि कम-से-कम रचना भारत में प्रकाशित तो रही है। कैनेडा में कुछ लोगों ने इस समस्या को समझा—हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा की स्थापना भी इसी समझ का परिणाम था। यहाँ पर मैं अपना एक संस्मरण बताकर सम्पादकीय को समाप्त करूँगा।
हिन्दी राइटर्स गिल्ड (अब हिन्दी राइटर्स गिल्ड कैनेडा) की स्थापना, श्री विजय विक्रान्त, डॉ. शैलजा सक्सेना और मैंने की तो इसके उद्घाटन के लिए हमने डॉ. महीप सिंह जी को आमन्त्रित किया। उन दिनों वह अपने सुपुत्र के पास ओटवा/ओटावा के पास आए हुए थे। सुबह की फ़्लाइट से वह टोरोंटो आए, एयरपोर्ट से विक्रान्त जी उन्हें अपने घर ले आए। कार्यक्रम के पश्चात मैं उन्हें विक्रान्त जी के घर फिर से मिला क्योंकि वापस एयरपोर्ट मैं उन्हे ले जाने वाला था। चाय के पश्चात मेरी उनके साथ कहानी को लेकर गंभीर चर्चा होने लगी। इस वार्तालाप में उन्होंने कहा कि अगर हम चाहें तो कैनेडा की रचनाओं को समीक्षा के लिए भारत में महीप जी के पास भेज सकते हैं और वह आगे रचनाओं को समीक्षित करवा सकते हैं। मैंने कहा, “डॉ. साहब, आप तो लगभग हर वर्ष कैनेडा में आते हैं। आप यहाँ दैनिक जीवन से परिचित हो चुके हैं इसलिए आप भारत के साथ-साथ यहाँ के भारतीय और कनेडियन समाज को जानने, समझने लगे हैं; क्या कोई समीक्षक जो कभी कैनेडा में आया ही नहीं, यहाँ रहा ही नहीं वह दैनिक जीवन की सूक्ष्मताओं को समझ पाएगा? और कहानी क्या है? एक समाज का प्रतिबिंब ही तो है।”
डॉ. महीप सिंह जी हौले से मुस्कुराए और उन्होंने कहा, “सुमन जी आपने ठीक कहा, परन्तु हम कहानी के कलापक्ष की समीक्षा तो कर ही सकते हैं।” हम दोनों वास्तविकता समझ रहे थे। प्रवासी साहित्य और मुख्यधारा के साहित्य की सीमाओं को समझ रहे थे।
उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने के बाद अपने घर लौटते हुए सोच रहा था कि एक दिन हम सोच रहे होंगे कि कनेडियन हिन्दी साहित्य की समीक्षा भी कैनेडा में ही हो। इस दिशा में हमने प्रयास भी किया। हिन्दी राइटर्स गिल्ड की गोष्ठियों में समीक्षाएँ पढ़ी गईं। शीघ्र ही लेखकों समझ में आने लगा कि किसी रचना की समीक्षा लिखना एक कठिन विधा है और एक ईमानदार समीक्षक होना और भी कठिन है।
— सुमन कुमार घई
टिप्पणियाँ
महेश रौतेला 2026/05/15 11:28 AM
सुन्दर। समीक्षा बहुत कठिन काम है और व्यक्ति की अपनी पसंद भी इसे प्रभावित करती है। "राग दरबारी" -श्रीलाल शुक्ल ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है- किसी समीक्षक ने लिखा था कि इस उपन्यास को न पढ़ा जाय तो अच्छा है। बाद में इसे ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। इसी प्रकार स्व. विजय कुमार शुक्ल के लेखन पर किसी ने लिखा( लेखक और समीक्षक) उनका लेखन अपठनीय है और हाल में उनको ज्ञानपीठ मिला।
कृपया टिप्पणी दें
सम्पादकीय (पुराने अंक)
2026
2025
- जय जवान, जय (बेचारा) किसान
- पूर्वाग्रहों को त्याग उद्योन्मुख होना
- परिवर्तन ही जीवन है!
- फिर भी . . .
- जब जागो तब सवेरा!
- हमारे त्योहार—जीवन का उत्सव
- मानवीय तत्त्व गुम है
- हिन्दी दिवस पर एक आकलन
- भारत के 79वें स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर
- कृत्रिम मेधा (एआई) वरदान या अभिशाप
- अंक प्रकाशन में देरी के कारण
- निर्पक्ष और निरपेक्ष को समझने की जिज्ञासा
- हम कैसे पिता हैं? मूल प्रश्न यही है . . .
- उचित समय है कर्म फलीभूत होने का
- गधी लौट कर फिर बड़ के पेड़ के नीचे
- ट्रंप की देन: राष्ट्रवादी उपभोक्तावाद
- भारतीय संस्कृति तो अब केवल दक्षिण भारतीय सिनेमा में…
- खेद है!
- यू.एस.ए. और इसका चरित्र
- समय की गति और सापेक्षता का सिद्धांत
- धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का
- और अंतिम संकल्प . . .
- मनन का एक विषय
2024
- अपने ही बनाए नियम का उल्लंघन
- सबके अपने-अपने ‘सोप बॉक्स’
- आप तो पाठक के मुँह से केवल एक सच्ची आह या वाह सुनने…
- आंचलिक सिनेमा में जीवित लोक साहित्य, संस्कृति और भाषा
- अंग्रेज़ी में अनूदित हिन्दी साहित्य का महत्त्व
- कृपया मुझे कुछ ज्ञान दें!
- मैंने कंग फ़ू पांडा फ़िल्म सिरीज़ देखी
- मित्रो, अपना तो हर दिवस—हिन्दी दिवस होता है!
- गोल-गप्पे, पापड़ी-भल्ला चाट और यू.एस.ए. का चुनाव
- जिहदी कोठी दाणे, ओहदे कमले बी सयाणे
- बुद्धिजीवियों का असमंजस और पूर्वाग्रह
- आरोपित विदेशी अवधारणाओं का खण्डन करना होगा
- भाषा में बोली का हस्तक्षेप
- पुस्तक चर्चा, नस्लीय भेदभाव और विचार शृंखला
- हींग लगे न फिटकिरी . . .
- दृष्टिकोणों में मैत्रीपूर्ण व्यवस्था की अपेक्षा
- आधुनिक समाज और तकनीकी को समझना ही हिन्दी साहित्य के…
- स्मृतियाँ तो स्मृतियाँ हैं—नॉस्टेलजिया क्या, वास्तविकता…
- दंतुल मुस्कान और नाचती आँखें
- इधर-उधर की
- सनातन संस्कृति की जागृति एवम् हिन्दी भाषा और साहित्य…
- त्योहारों को मनाने में समझौते होते हैं क्या?
- आओ जीवन गीत लिखें
- श्रीराम इस भू-भाग की आत्मा हैं
2023
- टीवी सीरियलों में गाली-गलौज सामान्य क्यों?
- समीप का इतिहास भी भुला दिया जाए तो दोषी कौन?
- क्या युद्ध मात्र दर्शन और आध्यात्मिक विचारों का है?
- क्या आदर्शवाद मूर्खता का पर्याय है?
- दर्पण में मेरा अपना चेहरा
- मुर्गी पहले कि अंडा
- विदेशों में हिन्दी साहित्य सृजन की आशा की एक संभावित…
- जीवन जीने के मूल्य, सिद्धांत नहीं बदलने चाहिएँ
- संभावना में ही भविष्य निहित है
- ध्वजारोहण की प्रथा चलती रही
- प्रवासी लेखक और असमंजस के बादल
- वास्तविक सावन के गीत जो अनुमानित नहीं होंगे!
- कृत्रिम मेधा आपको लेखक नहीं बना सकती
- मानव अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता के दंभ में जीता है
- मैं, मेरी पत्नी और पंजाबी सिनेमा
- पेड़ की मृत्यु का तर्पण
- कुछ यहाँ की, कुछ वहाँ की
- कवि सम्मेलनों की यह तथाकथित ‘साहित्यिक’ मजमेबाज़ी
- गोधूलि की महक को अँग्रेज़ी में कैसे लिखूँ?
- मेरे पाँच पड़ोसी
- हिन्दी भाषा की भ्रान्तियाँ
- गुनगुनी धूप और भावों की उष्णता
- आने वाले वर्ष में हमारी छाया हमारे पीछे रहे, सामने…
- अरुण बर्मन नहीं रहे
2022
- अजनबी से ‘हैव ए मैरी क्रिसमस’ कह देने में बुरा ही…
- आने वाले वर्ष से बहुत आशाएँ हैं!
- हमारी शब्दावली इतनी संकीर्ण नहीं है कि हमें अशिष्ट…
- देशभक्ति साहित्य और पत्रकारिता
- भारत में प्रकाशन अभी पाषाण युग में
- बहस: एक स्वस्थ मानसिकता, विचार-शीलता और लेखकीय धर्म
- हिन्दी साहित्य का अँग्रेज़ी में अनुवाद का महत्त्व
- आपके सपनों की भाषा ही जीवित रहती है
- पेड़ कटने का संताप
- सम्मानित भारत में ही हम सबका सम्मान
- अगर विषय मिल जाता तो न जाने . . .!
- बात शायद दृष्टिकोण की है
- साहित्य और भाषा सुरिक्षित हाथों में है!
- राजनीति और साहित्य
- कितने समान हैं हम!
- ऐतिहासिक गद्य लेखन और कल्पना के घोडे़
- भारत में एक ईमानदार फ़िल्म क्या बनी . . .!
- कितना मासूम होता है बचपन, कितनी ख़ुशी बाँटता है बचपन
- बसंत अब लौट भी आओ
- अजीब था आज का दिन!
- कैनेडा में सर्दी की एक सुबह
- इंटरनेट पर हिन्दी और आधुनिक प्रवासी साहित्य सहयात्री
- नव वर्ष के लिए कुछ संकल्प
- क्या सभी व्यक्ति लेखक नहीं हैं?
2021
- आवश्यकता है आपकी त्रुटिपूर्ण रचनाओं की
- नींव नहीं बदली जाती
- सांस्कृतिक आलेखों का हिन्दी साहित्य में महत्व
- क्या इसकी आवश्यकता है?
- धैर्य की कसौटी
- दशहरे और दीवाली की यादें
- हिन्दी दिवस पर मेरी चिंताएँ
- विमर्शों की उलझी राहें
- रचना प्रकाशन के लिए वेबसाइट या सोशल मीडिया के मंच?
- सामान्य के बदलते स्वरूप
- लेखक की स्वतन्त्रता
- साहित्य कुञ्ज और कैनेडा के साहित्य जगत में एक ख़ालीपन
- मानवीय मूल्यों का निकष आपदा ही होती है
- शब्दों और भाव-सम्प्रेषण की सीमा
- साहित्य कुञ्ज की कुछ योजनाएँ
- कोरोना काल में बन्द दरवाज़ों के पीछे जन्मता साहित्य
- समीक्षक और सम्पादक
- आवश्यकता है नई सोच की, आत्मविश्वास की और संगठित होने…
- अगर जीवन संघर्ष है तो उसका अंत सदा त्रासदी में ही…
- राजनीति और साहित्य का दायित्व
- फिर वही प्रश्न – हिन्दी साहित्य की पुस्तकें क्यों…
- स्मृतियों की बाढ़ – महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश जी
- सम्पादक, लेखक और ’जीनियस’ फ़िल्म
2020
- यह वर्ष कभी भी विस्मृत नहीं हो सकता
- क्षितिज का बिन्दु नहीं प्रातःकाल का सूर्य
- शोषित कौन और शोषक कौन?
- पाठक की रुचि ही महत्वपूर्ण
- साहित्य कुञ्ज का व्हाट्सएप समूह आरम्भ
- साहित्य का यक्ष प्रश्न – आदर्श का आदर्श क्या है?
- साहित्य का राजनैतिक दायित्व
- केवल अच्छा विचार और अच्छी अभिव्यक्ति पर्याप्त नहीं
- यह माध्यम असीमित भी और शाश्वत भी!
- हिन्दी साहित्य को भविष्य में ले जाने वाले सक्षम कंधे
- अपनी बात, अपनी भाषा और अपनी शब्दावलि - 2
- पहले मुर्गी या अण्डा?
- कोरोना का आतंक और स्टॉकहोम सिंड्रम
- अपनी बात, अपनी भाषा और अपनी शब्दावलि - 1
- लेखक : भाषा का संवाहक, कड़ी और संरक्षक
- यह बिलबिलाहट और सुनने सुनाने की भूख का सकारात्मक पक्ष
- एक विषम साहित्यिक समस्या की चर्चा
- अजीब परिस्थितियों में जी रहे हैं हम लोग
- आप सभी शिव हैं, सभी ब्रह्मा हैं
- हिन्दी साहित्य के शोषित लेखक
- लम्बेअंतराल के बाद मेरा भारत लौटना
- वर्तमान का राजनैतिक घटनाक्रम और गुरु अर्जुन देव जी…
- सकारात्मक ऊर्जा का आह्वान
- काठ की हाँड़ी केवल एक बार ही चढ़ती है
2019
- नए लेखकों का मार्गदर्शन : सम्पादक का धर्म
- मेरी जीवन यात्रा : तब से अब तक
- फ़ेसबुक : एक सशक्त माध्यम या ’छुट्टा साँड़’
- पतझड़ में वर्षा इतनी निर्मम क्यों
- हिन्दी साहित्य की दशा इतनी भी बुरी नहीं है!
- बेताल फिर पेड़ पर जा लटका
- भाषण देने वालों को भाषण देने दें
- कितना मीठा है यह अहसास
- स्वतंत्रता दिवस की बधाई!
- साहित्य कुञ्ज में ’किशोर साहित्य’ और ’अपनी बात’ आरम्भ
- कैनेडा में हिन्दी साहित्य के प्रति आशा की फूटती किरण
- भारतेत्तर साहित्य सृजन की चुनौतियाँ - दूध का जला...
- भारतेत्तर साहित्य सृजन की चुनौतियाँ - उत्तरी अमेरिका के संदर्भ में
- हिन्दी भाषा और विदेशी शब्द
- साहित्य को विमर्शों में उलझाती साहित्य सत्ता
- एक शब्द – किसी अँचल में प्यार की अभिव्यक्ति तो किसी में गाली
- विश्वग्राम और प्रवासी हिन्दी साहित्य
- साहित्य कुञ्ज एक बार फिर से पाक्षिक
- साहित्य कुञ्ज का आधुनिकीकरण
- हिन्दी वर्तनी मानकीकरण और हिन्दी व्याकरण
- चिंता का विषय - सम्मान और उपाधियाँ
2018
2017
2016
- सपना पूरा हुआ, पुस्तक बाज़ार.कॉम तैयार है
- हिन्दी साहित्य, बाज़ारवाद और पुस्तक बाज़ार.कॉम
- पुस्तकबाज़ार.कॉम आपके लिए
- साहित्य प्रकाशन/प्रसारण के विभिन्न माध्यम
- लघुकथा की त्रासदी
- हिन्दी साहित्य सार्वभौमिक?
- मेरी प्राथमिकतायें
- हिन्दी व्याकरण और विराम चिह्न
- हिन्दी लेखन का स्तर सुधारने का दायित्व
- अंक प्रकाशन में विलम्ब क्यों होता है?
- भाषा में शिष्टता
- साहित्य का व्यवसाय
- उलझे से विचार
Lakhan lal pal 2026/05/15 11:36 PM
साहित्य कुञ्ज पत्रिका के इस बार के संपादकीय का विषय- *एक ईमानदार समीक्षक होना* है। संपादकीय की शुरुआत संपादक महोदय के अभिन्न मित्र के निधन की दुखद सूचना से हुई है। उन्हें मेरा नमन। प्रवासी साहित्यकार और उनके साहित्य पर आए दिन इस पर बहस होती रहती है कि प्रवासी साहित्य को भारत के मुख्य धारा के साहित्य से अलग क्यों देखा जा रहा है? जबकि मुख्यधारा का साहित्य हो या प्रवासी साहित्य दोनों हिन्दी में ही लिखे जा रहे हैं। प्रवासी साहित्यकारों में यह छटपटाहट जब-तब दिख जाती है। प्रश्न उठता है कि प्रवासी साहित्यकार आखिर चाहते क्या हैं? मुख्य धारा में शामिल होना चाहते हैं या अलग अपना साहित्य संसार चाहते हैं। वाद हो, काल हो या स्थान हो, आपके साहित्य में जैसा दिखेगा , उसका नामकरण वैसा ही होगा। साहित्य की प्रवृत्तियां ही नामकरण की कारक होती हैं। शुरुआत में हर प्रवासी साहित्यकार की रचनाओं में अपने छूटे हुए देश की यादें होती है। वह उन्हीं यादों में खोया हुआ दिखाई देता है। वहां ठीक से एडजस्ट होने के बाद ही उसकी रचनाओं में वह देश दिखने लगता है। पर देर हो चुकी होती है। क्योंकि प्रवासी साहित्यकार का टैग उस पर लग चुका होता है। एक बार टैग चिपक गया तो फिर मुश्किल से छूटता है। प्रवासी साहित्य का मूल्यांकन भारतीय हिन्दी पट्टी अपने स्तर से करती है। आप खूब लिखो, जी भरकर लिखो लेकिन भारत के बिना उसका मूल्य क्या है? प्रवासी साहित्य एक बाजार की तरह है। माल खूब बना लो, यदि खरीदार नहीं है तो फायदा क्या है! मेरे कहने का तात्पर्य यह कि भारत के लोग पढ़ते हैं और वही उसका मूल्यांकन करते है। विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाए जा रहे होंगे। इस संपादकीय के माध्यम से एक प्रश्न उठाया गया है कि अलग-अलग देशों में रहने वाले प्रवासियों के साहित्य को उसी देश का हिन्दी साहित्य माना जाए। पर कैसे? भाषाई दृष्टि से, शिल्प की दृष्टि से अथवा कला की दृष्टि से! वहां के खान-पान या भौगोलिक दृष्टि से तो अन्य देशों के साहित्य से विलग नहीं किया जा सकता है। क्योंकि इन चीज़ों को साहित्य की काया कह सकते हैं, आत्मा नहीं। इसकी समीक्षा में ये प्रश्न सामने आएंगे। 'एक ईमानदार समीक्षक के लिए उसका बहुपठित होना आवश्यक है। उसे सारे दर्शनों की जानकारी होनी चाहिए। वर्तमान साहित्य की दशा-दिशा क्या है। साहित्य के प्रति निःस्वार्थ समर्पण जरूरी है। क्योंकि इसमें किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं है। लेखक/कवि बनना आसान है पर समीक्षक होना कठिन है। हर कोई अपनी रचना लिए घूम रहा है कि इस पर कुछ लिख दीजिए। सभी ऐसे घूमेंगे तो समीक्षा कौन करेगा! आपकी इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि प्रवासी साहित्य को प्रवासी समीक्षक ही मूल्यांकन कर सकता है। इसके लिए आप लोगों को समीक्षक पैदा करने होंगे। अगर नहीं कर सके तो भारतीय समीक्षक जो मूल्यांकन करेगा उसे ही स्वीकार करना होगा।