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प्रिय मित्रो,
  
भारत से लौटे दो सप्ताह हो चुके हैं परन्तु भारत का रस अभी भी मन पर छाया हुआ है। 31 मार्च को कैनेडा पहुँचने के पश्चात 12 अप्रैल को न्यू जर्सी (यू.एस.ए.) आना पूर्वनिर्धारित था। प्रायः हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, ड्राइव करके वेस्टफ़ील्ड (न्यू जर्सी) अपने बेटे के पास आते हैं। लगभग 743 कि.मी. की यात्रा में ड्राइव करने के लिए लगभग साढ़े सात घंटे लगते हैं। हम लोग रास्ते में दो जगह कॉफ़ी, खाने और पैट्रोल के लिए रुकते हैं। सुबह सात बजे चल कर लगभग साढ़े तीन बजे तक हम अपने गंतव्य तक पहुँच जाते हैं।

मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूँ कि यह यात्रा बहुत सुन्दर और मन को लुभाने वाले मार्ग की है। न्यू-यॉर्क, पेन्सिलवेनिया और न्यूजर्सी प्रान्तों से गुज़रते हुए राज-मार्ग एप्लेशियन पर्वत शृंखला के साथ-साथ चलता है। कई बार पहाड़ियों की ढलानों पर बिखरे हुए गाँव दिखते हैं, छोटी-बड़ी नदियाँ सड़के के समानन्तर चलती हैं और फिर पेड़ों के झुरमटों में लोप हो जाती हैं। खेतों के चोकोर टुकड़े इस बार हरे-भूरे थे। अभी मक्का बोने का समय नहीं आया है। मिट्टी अभी बहुत गीली है। छोटी-बड़ी नदियाँ कभी सड़क की बायीं ओर तो कभी दायीं ओर बहते हुए लुका-छिपी खेल रही थीं।

यू.एस. और कैनेडा की सीमा पार करने के बाद बफ़लो (यू.एस.ए.) के बाहरी छोर में से गुज़रते हुए सुरम्य ग्रामीण सड़क 20A पर पैंतीस मील (यू.एस.ए. में दूरी कि.मी. में नहीं मील में मापी जाती है) की यात्रा वेल्स, वॉरसा, माउंट मोरिस आदि छोटे -छोटे गाँवों में से ले जाती है। माउंट मोरिस के पश्चात छोटा ग्रामीण हाइवे समाप्त हो जाता है और कार मुख्य बड़े अंतरराज्यीय राजमार्ग पर पूरी गति से दौड़ने लगती है। इस समय तक अपने घर से चले लगभग दो ढ़ाई घंटे बीत चुके होते हैं। सीमा पार करने के बाद हमारा पहला पड़ाव डैन्सविल होता है और यहाँ हम हमेशा कॉफ़ी के लिए रुकते हैं। नीरा कॉफ़ी का ऑर्डर देने के लिए काउंटर पर चली गई और मैं मोबाइल पर यूट्यूब में ईरान के युद्ध के समाचार और विश्लेषण खंगालने लगा। नीरा कॉफ़ी और कुछ नाश्ता ले आई और मोबाइल बंद कर नाश्ता करने में हम दोनों व्यस्त हो गए।

अगला पड़ाव होगा ग्रैंड बेंड सास्केहुहाना। वहाँ तक पहुँचने के लिए तीन-साढ़े तीन घंटे लगेंगे। इस क़स्बे में दोपहर के भोजन के लिए रुकने के पश्चात यात्रा का अंतिम चरण तय करेंगे। सास्केहुहाना एक एप्लेशियन पर्वतों की घाटियों में बहती हुई एक लम्बी नदी है। ग्रैंड बेंड सास्केहुहाना इसी नदी के किनारे बसा हुआ है।

डैन्सविल से कुछ ही मील की दूरी पर कार की बाँयीं ओर एक विशाल घाटी है जिसमें मीलों तक खेत और गाँव फैले हुए हैं। हर बार इस पड़ाव से गुज़रते हुए मुझे घाटी की हवा नीली दिखाई देती है और हर बार नीरा से कहता हूँ कि एक दिन इस घाटी को लेकर एक कहानी लिखूँगा—नीली घाटी की नीली आँखें।

इन शांत दृश्यों में से गुज़रते हुए अचानक एक विचार कौंधा—यह देश इस समय युद्ध की स्थिति में है। मन में ईरान और मध्यपूर्व के अरब देशों में युद्ध की विभीषिका के दृश्य मन को विचलित करने लगे। पहली बार वियतनाम के युद्ध के समय—युद्ध लोगों के ड्राइंगरूम तक पहुँच गया था। हर शाम, परिवार टीवी पर समाचारों में वियतनाम में मौत के नंगे नाच को किसी बेसबाल के मैच की तरह देखता था। एक दिन सड़क के बीचों-बीच युद्ध बंदियों की आँख पर पट्टी और हाथों को पीछे बाँध कर एक-एक बंदी के सिर में गोली मार कर मृत्यु के घाट उतारते लोगों ने देखा। अचानक युद्ध रोमांचक नहीं वीभत्स होने लगा। यू.एस.ए. ने विमानों से जंगलों पर एजेंट ऑरेंज स्प्रे कर दिया ताकि वियतकांग के लड़ाकों को छिपने की जगह न मिले। पूरे के पूरे जंगल दिनों में हरे-भरे पेड़ों से ठूँठों के कंकाल बन गए। अमेरिका द्वारा गाँवों पर नापॉम बम्ब गिराये गए ताकि जलती झोंपड़ियों की आग को पानी से बुझाया न जा सके। इतने वर्षों के बाद अभी तक एक फोटो मानवीय चेतना को झकझोर जाती है। एक सात-आठ साल की बच्ची नंगी, सड़क के बीचों-बीच रोती हुई भाग रही है। शरीर के कुछ हिस्सों पर काले रंग का पदार्थ चिपका हुआ है, चमड़ी जल रही है और कपड़े जल चुके हैं वह रोती चीखती भाग रही है। इस दृश्य ने अमेरिका की मानसिकता को झिंझोड़ दिया। अमेरिका युवावर्ग सड़क पर उतर आया और यहीं से युद्ध का अंत आरम्भ हुआ।

इस बार भी युद्ध ऐसा ही है। बस मीडिया को इतना नियंत्रित कर लिया गया है कि क्या सच है, क्या झूठ—समझना कठिन है। लगता है इस प्रशासन में नए शस्त्रों के साथ-साथ मीडिया को नियंत्रित करने में भी उन्नति कर ली है। इस युद्ध के ढंग पर बदल चुके हैं। सेनाओं की बजाय इस बार विनाश मिसाइलों और ड्रोन के झुंडों द्वारा या विमानों से बंब वर्षा से किया जा रहा है। इस बार सेनाएँ अभी युद्ध के मैदान में नहीं उतरीं इसलिए युद्ध एक कंप्यूटर गेम की तरह है। विनाश करने वाले सदूर कमरों में बैठे, वीडियो गेम खेल रहे हैं। सैटेलाइट से खींचे छायाचित्रों में धू-धू करती इमारतें दिखती हैं, विशाल अट्टालिकाओं के खंडहर तो दिखते हैं परन्तु भूमि पर बिखरी लाशें नहीं दिखतीं या जान-बूझ कर दिखाई नहीं जा रहीं। संभवतः इसीलिए अभी यू.एस.ए. का आम नागरिक इस विनाश की लीला को पूरी तरह समझ नहीं पा रहा है। कई बार मन में यह विचार भी आता है कि जब तक यू.एस.ए. के सैनिकों के क्षत-विक्षत शरीर, बॉडी बैग्ज़ में वापस यू.एस. की भूमि तक नहीं पहुँचते इस युद्ध का विरोध वैसा नहीं होगा जैसा कि वियतनाम की लड़ाई के समय हुआ था।

गत कुछ दिनों से सीज़फ़ायर की बातें हो रही हैं। अभी कोई भी नहीं जानता कि यह परिस्थिति वास्तविक है या आने वाले भीषण युद्ध की तैयारी के लिए धोखा दिया जा रहा है।

विचारों की तन्द्रा टूटती है। नीरा पूछ रही है—क्या सोच रहे हो? सोचता हूँ क्या उत्तर दूँ? नीली घाटी की नीली आँखें भीग चुकी हैं। परन्तु अमेरीका इसका अभ्यस्त हो चुका है। यू.एस.ए. की एक रीत है कि प्रत्येक राष्ट्रपति कोई न कोई युद्ध आरम्भ करता है। ग्रामीण अंचल से आए युवा देशभक्ति के नारे लगाते हुए सेना में भर्ती होते हैं। राजनीतिज्ञों के बच्चे सेना से दूर रहते हैं; विलासता भरा जीवन जीते हैं। विश्व भर में यही तो होता है—सीमा पर निर्धन का बच्चा ही मरता है। 

—सुमन कुमार घई

टिप्पणियाँ

धर्मपाल महेंद्र जैन 2026/04/20 06:35 AM

'नीली घाटी की नीली आँखें' पढ़ने की प्रतीक्षा रहेगी। संपादकीय के माध्यम से आपकी भारत-अमेरिका यात्राओं के बारे में जानकारी मिल गई। आपने सही कहा- सीमा पर निर्धन का बच्चा ही मरता है। बढ़िया संपादकीय। मेरे उपन्यास इमिग्रेंट पर दिनेश कुमार माली जी की विस्तृत समीक्षा साहित्य कुञ्ञ में देख कर खुश हूँ और आभारी भी।

मधु शर्मा 2026/04/17 04:04 PM

कैनेडा से अमेरिका की ओर जाते हुए प्रकृतिमनोहर यात्रा के दौरान आदरणीय सम्पादक जी के अन्तर्द्वन्द्व विचारों की भी यात्रा अद्भुत रही। मैं कुछ घटनाओं/परिस्थितियों से अनभिज्ञ थी इसलिए यह सम्पादकीय मेरे लिए ज्ञानवर्धक है। यह सोचकर दिल दहल जाता है कि उन छोटे-बड़े मार्गों के किनारे-किनारे कलकल बहती उन नदियों का स्वच्छ व जीवनप्रदान करने वाला जल न जाने कब अचानक लाल रंग में परिवर्तित हो जाये! नीली घाटी की नीली आँखों से बहते ख़ून के आँसू तो उस समय उन्हीं रक्त-रंजित नदियों में केवल विलीन होकर रह जाएँगे।

लखनलाल पाल 2026/04/16 08:18 PM

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका साहित्य कुञ्ज का अप्रैल 2026 अंक वैसे तो संपादक जी की निजी यात्रा से संबंधित है। यह यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है वैसे-वैसे इसके गंतव्य पर ध्यान केंद्रित होने लगता है। लेकिन गंतव्य तक न पहुंचना ही इस संपादकीय को विशेष बना देता है। यदि मंजिल तक पहुंच जाते तो वही बात हो जाती जो आम आदमी की दिनचर्या में होता है। सुबह जागे, सारे काम किये और रात को सो गए। इससे ज्यादा और क्या?? पर ऐसा नहीं हुआ! संपादकीय की यात्रा अच्छी सड़कों से शुरू होती है। साथ ही चले गए मीलों की गिनती और देशों की सीमाओं से लेकर 'नीली घाटी की नीली आंखें'.. उगी एक कहानी के प्लाट तक। रास्ते में गाड़ी रोककर चाय नाश्ते तक आते-आते संपादकीय में उबाऊपन आ जाता है। लेकिन जैसे ही संपादक महोदय जी का मोबाइल खुलता है, उसमें ईरान युद्ध की झलक दिख जाती है। फिर क्या है, मोबाइल बंद करते ही मन में दबी धूमिल यादें , खुराक पाकर वियतनाम युद्ध की विभीषिका की परतें खोलने लगती हैं। वियतनाम पर अमेरिका का वहशीपन पूरी तरह से तारी हो उठता है। जंगलों को केमिकल से नंगा कर देना ताकि वियतनाम के सैनिक छुप न सकें। पानी सुखाकर गांव देहातों में आग लगा देना, जिससे जलते घरों को बुझाया न जा सके। वहां की आमजनता को जिंदा आग के हवाले कर देना। एक छोटी बच्ची जो आग में जलती सड़क पर भाग रही है वह मानव के वहशीपन की पराकाष्ठा थी। इस दृश्य को पढ़कर कलेजा मुंह को आ जाता है। यह संपादकीय का चरम बिन्दु है। और चरम पर आकर संपादकीय पूर्ण हो जाती है। यह संपादकीय कला पाठक को प्रभावित किए बिना नहीं रहती है।

योगेश ममगाईं 2026/04/16 07:11 AM

सुमन जी यूँ तो आपके सभी संपादकीय साहित्यिक धरोहरों से कम नहीं होते हैं । परन्तु आपका यात्रा वृत्तांत इतना रोचक होता है कि इसे पूरा पढ़ कर ही तृप्ति होती है । बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ !

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