अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रिय मित्रो,

मई की द्वितीय अंक आपके समक्ष है। आशा है कि आपको अच्छा लगेगा। वैश्विक संकट के इन  दिनों में साहित्य मन को बहलाने का साधन एक सुखद सिद्ध हो सकता है। सोशल मीडिया के जिन साधनों पर मेरी उपस्थिति है, वहाँ देख रहा हूँ कि नित नई अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठियाँ हो रही हैं। एक वैश्विक साहित्यिक परिवार का जन्म होते देख मन को सन्तोष मिलता है। जो कल्पना मैंने साहित्य कुञ्ज को आरम्भ करने से पहले की थी वह साकार हो रही है परन्तु जिन ऐतिहासिक परिस्थितियों में यह सपना पूरा हो रहा है - वह कल्पना से परे है।

इन विचारों और  इस साहित्यिक आदान-प्रदान के साधन पहले से ही उपलब्ध थे, परन्तु बहुत से लोग या तो अनभिज्ञ थे  या फिर नई तकनीकी को अपनाने से झिझक रहे थे। मैं इन साधनों की उपयोगिता पर वर्षों से बल देता आ रहा हूँ। नई पीढ़ी तो इन संचार-सम्पर्क के माध्यमों से परिचित भी थी, उपयोगकर्ता भी थी और इनकी उपभोक्ता भी। परन्तु स्थापित साहित्यकार अभी भी क़लम और काग़ज़ के रोमांस से उबर ही नहीं पा रहे थे। किसी को किताबों की ख़ुशबू भली लगती थी तो कोई उँगली पर थूक लगा कर पन्ने पलटने में आनन्द प्राप्त कर रहा था। यह आनन्द एकान्त के आनन्द हैं। लेखक की एक और भूख होती है जिसको ख्यातिप्राप्त लेखक स्वीकार नहीं करते। यह भूख लोकप्रियता की है। आपको प्रायः लेखकों की गोष्ठियों में सुनने के लिए मिलेगा - “भाई हम तो स्वांतः सुखाय सृजन करते हैं।” हास्यास्पद लगता है गोष्ठी में या मंच पर माईक से लिपट कर रचना सुनाने से पहले उनका यह जुमला सुनना! यह मेरा अपना अनुभव है कि लेखक लिखने के बाद अपनी रचना को छिपा कर नहीं रखता। वह उसे अपने पाठकों या श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करना चाहता है। फिर यह वक्रोक्ति या मुकरी वाली बात क्यों! अगर स्वांतः सुखाय साहित्य सृजन है तो इन वैश्विक गोष्ठियों के लिए रातों को जागना क्यों? घड़ी पर अलार्म लगा कर रखना क्यों? मित्रो हम लोग साहित्य सृजन कर रहे हैं - जो करना हमें पसन्द है। यह हमें आनन्द देता है। आत्मा को तुष्ट करता है। अगर सोच कर देखें तो यह आध्यात्मिक साधना के समान है; तो हम यह स्वीकार करने से क्यों मुकरते हैं कि हम भूखे हैं। हम जब तक अपनी रचना को सार्वजनिक नहीं करते तब तक एक बिलबिलाहट हमें सताती है। यह बिलबिलाहट और यह सुनाने और सुनने की भूख केवल बौद्धिक क्षुधा की पूर्ति ही नहीं करती बल्कि नव-सृजन के लिए उर्वरा और ऊर्जा भी है।

यह वैश्विक गोष्ठियाँ हिन्दी साहित्य के आभासी (आजकल यह शब्द बहुत प्रचलित हो रहा है) विभाजनों को समाप्त करने में सहायक हो रही हैं। क्योंकि इन गोष्ठियों के संचालक अभी तक कभी यह कहते नहीं सुने, “अब काव्य-पाठ करेंगी/करेंगे कैनेडा से …. जो प्रवासी कवि/कवयित्री हैं!” यह लेबल, यह प्रवासी लेखक का मुखौटा जो बलपूर्वक मुख्यधारा विदेशों में सृजन करते साहित्यकारों पर थोपती रही है, वह या तो इन गोष्ठियों से नदारद है या किसी के मुँह पर यह कहने का साहस नहीं रखती कि “तुम मुझसे इसलिए घटिया हो क्योंकि विदेश में प्रतिकूल परिस्थितियों में जीते हुए, मुख्यधारा से विलग अवस्था में हिन्दी में साहित्य सृजन कर रहे हो।” 

सभी जानते हैं कि साहित्य कुञ्ज कितने वर्षों से वैश्विक साहित्यिक मंच पर उपस्थित है। इसीलिए समय-समय पर भारत के शोधार्थी मुझसे प्रवासी साहित्यकारों की सूची माँगते हैं क्योंकि वह “प्रवासी साहित्य” पर शोध करना चाहते हैं। उनकी सहायता करने में मैं हमेशा असमर्थ रहता हूँ, क्योंकि मैं यह शब्द कभी समझ ही नहीं पाया। दुनिया में हर लेखक चाहे वह किसी भी देश से हो, किसी भी भाषा में लिख रहा हो यह सोच कर नहीं लिखता कि वह कौन है और कहाँ पैदा हुआ है और कहाँ रह रहा है। परिवेश, परिस्थितियाँ और जीवन के अनुभव स्वतः लेखन में आ जाते हैं। अगर यह सब सोच कर लिखा जाए तो वह कृत्रिम, ठूँसे हुए लगते हैं - जो रचना को नीरस और भारी बना देते हैं।

इस अंक में आप देखेंगे कि जो कोरोना संबंधित रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं, वह किस तरह आरम्भिक रचनाओं से भिन्न हैं। इस विषय पर पुरानी रचनाओं में परिस्थिति का अनुभव अभी गहराया नहीं था। इसलिए उन रचनाओं में उपरोक्त कमियाँ थीं। साहित्य कुञ्ज में वह भी प्रकाशित हुईं क्योंकि साहित्य सामाजिक इतिहास भी होता है। इसे इतिहास कहा नहीं जाता परन्तु इतिहास साहित्य में हमेशा उपस्थित रहता है। पुरातत्ववेत्ता साहित्य में पुरातन सभ्यताओं का प्रतिबिम्ब देखते हैं। सामाजिक रीतियों का दस्तावेज़ साहित्य ही होता। इसे केवल मनोरंजन का साधन मत मानें। आजकल जो साहित्य सामने आ रहा है वह इस काल, इस महामारी का मानवीय पक्ष पन्नों पर या इलैक्ट्रॉनिक माध्यम पर अंकित कर रहा है। यह मानव के इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है। लेखकों ने सहस्राब्दियों से साहित्य में अपने काल का इतिहास, राजनीति, समाज और परिवार पिरोया है। इस काल का लेखक भी यही कर अपना दायित्व निभा रहा है।

– सुमन कुमार घई

टिप्पणियाँ

डा.पी.पद्ममावती 2020/05/18 11:21 AM

बहुत खूब सर ! बिल्कुल सही कहा!

कृपया टिप्पणी दें

सम्पादकीय (पुराने अंक)

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015