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प्रिय मित्रो

समय-समय पर अपने सम्पादकीय इत्यादि में मैं सम्पादन के महत्व के बारे में उल्लेख करता रहता हूँ। जब मैं सम्पादन के महत्व की बात करता हूँ तो यह केवल पत्रिका या समाचार पत्र तक सीमित नहीं है बल्कि मैं कहानी या कविता संकलनों और उपन्यासों इत्यादि को भी उसमें गिनता हूँ। भारत के साहित्य जगत को यह प्रक्रिया कितनी स्वीकृत है या नहीं है इसका मुझे कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। अभी तक मैंने कभी किसी लेखक से नहीं सुना कि किसी प्रकाशक ने उसके लिए कोई सम्पादक नियुक्त किया है।

प्रकाशक के लिए सम्पादन लेखक का दायित्व है और लेखक सम्पादन को केवल प्रकाशन के लिए बर्दाश्त करता है। अगर उसकी रचना बिना सम्पादन के प्रकाशित हो जाए तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता। यहाँ यह भी विचारणीय हो जाता है कि सम्पादन की परिभाषा क्या है? 

जहाँ तक मैं समझता हूँ और जिस तरह की मेरी सम्पादन की शैली है वह एक तरफ़ा नहीं है। यह एक साझा प्रयास है, यह एक लेखक और सम्पादक के बीच का संवाद है। यह संवाद ईमानदार, लेखक के हित में और पाठक की रुचि को देखते हुए स्थापित होता है।

कुछ दिन पहले एक अंग्रेज़ी फ़िल्म देखी जो इसी विषय पर आधारित थी। इस फ़िल्म का नाम है “जीनियस”। यह कहानी अंग्रेज़ी के लेखक टॉमस वुल्फ़ (ज्यूड लॉ) के जीवन पर आधारित है। परन्तु कहानी का मुख्य पात्र मैक्सवेल पर्किन्स (कोलिन फ़र्थ) है। मैक्सवेल पर्किन्स ने 1910 में न्यू यॉर्क के एक प्रकाशक “चार्ल्स स्क्रिबनर’स सन्ज़” में काम करना शुरू किया था। अर्नेस्ट हेमिंगवे, स्कॉट फ़िट्जेर्ल्ड और टॉमस वुल्फ़ को खोजने का श्रेय कोलिन फ़र्थ को जाता है। जब “खोजना” कहते हैं, उसका अर्थ है कि कोलिन पर्किन्स ने इन लेखकों की पहली पुस्तक की पाण्डुलिपि को पढ़ कर समझा कि यह लेखक तराशने के बाद अंग्रेज़ी के साहित्य जगत में चमकेंगे और इनकी पुस्तकें बिकेंगी। यह पूरी कहानी टॉमस वुल्फ़ को तराशने की प्रक्रिया है। इसलिए कहानी का नायक टॉमस वुल्फ़ न होकर कोलिन पर्किन्स है। अर्नेस्ट हैमिंग्वे और स्कॉट फ़िट्जेर्ल्ड टॉमस वुल्फ़ से पहले स्थापित हो चुके थे। फ़िल्म में इन दोनों महान लेखकों को भी छोटी भूमिका में दिखाया गया है। 

इस फ़िल्म को देखना लेखकों और संपादकों के लिए अनिवार्य होना चाहिए। इस फ़िल्म में वही दिखाया गया है जिससे मैं प्रतिदिन संघर्ष करता हूँ। नए लेखक सोचते हैं कि साहित्य कुञ्ज में भी अन्य वेबसाइट्स की तरह जो भी भेजो प्रकाशित हो जाता है। दूसरी ओर स्थापित लेखक सोचते हैं कि मेरी रचना को संपादित करने का अधिकार किसी को नहीं। यहाँ पर स्थापित लेखक किसे कहते हैं, यह विचारणीय है। स्थापित लेखक वह है जिसकी पुस्तकों को वरिष्ठ या प्रसिद्ध प्रकाशक प्रकाशित करने के लिए तैयार हो जाते हैं। उनकी साहित्यिक गुणवत्ता का इससे कोई संबंध नहीं है। स्थापित लेखक बनने के लिए भी एक-दो नुस्ख़े हैं। कुछ में पैसा लगता है और कुछ में किन्हीं व्यक्ति-विशेषों की चाटुकारिता का निवेश है। मैंने कई ऐसे अच्छे साहित्यकार देखे हैं जिनका प्रसिद्धि से कोई नाता नहीं है और कुछ ऐसे स्थापित लेखक देखें हैं जिनका साहित्य से कुछ लेना-देना नहीं है। 

संपादकीय के मुख्य विषय पर लौटता हूँ – संपादक लेखक और पाठक के बीच की कड़ी है। उसे मालूम होता है कि क्या पाठक को पसन्द आएगा और क्या नहीं। ऐसा करते हुए वह साहित्यिक गुणवत्ता से समझौता नहीं करता  है – बस लेखक को परामर्श देता है। लेखक को अपना लिखा हुआ एक-एक शब्द प्रिय होता है।  यह शब्द कई बार केवल लेखक की शब्दावली की समृद्धता को दर्शाने के लिए बिना मतलब के रचना में भरे जाते हैं। कई बार लेखक कहानी के भाव में इतना बह जाता है कि वह भूल जाता है कि पाठक के लिए यह अनावश्यक विस्तार उबाऊ हो सकता है। और दूसरी ओर लेखक कई बार कहानी का ढांचा लिख कर ही प्रकाशन के लिए भेज देता है। जिसमें न तो घटनाक्रम में कोई जुड़ाव होता है और न ही कहानी में बहाव। कविताओं का भी यही हाल होता है। तुकान्त कविताओं में तुक मिलाने के लिए शब्दों का अन्वेषण भी देखने को मिलता है और उनका विकृत रूप भी। अगर रचना अतुकान्त है तो गद्य के एक वाक्य के शब्दों को आगे-पीछे करके कविता रच दी जाती है। 

मुख्यतः सम्पादक भी दो प्रकार के होते हैं। पहली श्रेणी उनकी होती है जिनको वहम हो जाता है कि वह सर्वशक्तिमान हैं और लेखक उनके आगे हाथ बाँधे खड़ा है। जब संपादक के कार्टून में रद्दी की टोकरी दिखाई जाती है, वह इन सम्पादकों की ही होती है। दुर्भाग्यवश अधिकतर सम्पादक इसी श्रेणी में आते हैं। दूसरी श्रेणी में वह सम्पादक हैं जो लेखक के साथ संवाद स्थापित करते हैं। लेखक को परामर्श देते हैं; रचना में संशोधन लेखक करता है। इस श्रेणी के सम्पादक बहुत कम है। “जीनियस” फ़िल्म में आप देखेंगे कि मैक्सवेल पर्किन्स दूसरी श्रेणी के सम्पादक थे। इसीलिए उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य को ऐसे लेखक दिए जिनका साहित्य आज भी पढ़ा जा रहा है और पाठ्यक्रम का हिस्सा आठ-नौ दशकों के बाद भी बना हुआ है। फ़िल्म में जीनियस सम्पादक है लेखक नहीं। इंटरनेट पर यह फ़िल्म कहीं न कहीं अवश्य मिल जाएगी। मैंने इसे tubi पर देखा है। यह नेटफ़्लिक्स की तरह है पर निःशुल्क है।

– सुमन कुमार घई
 

टिप्पणियाँ

Hari Lakhera 2021/01/18 06:37 AM

मैं कह नही सकता ठीक से पर एक संपादक के बारे में प्रचलित था वे जो संपादित कर देते लेखक भी बाग बाग हो जाता।

वेदित कुमार धीरज 2021/01/16 07:52 AM

विगत कुछ वर्षो से मैं आपके संपादकीय से परिचित हूँ आपने मेरे शब्दकोष के साथ - साथ शैली के अलंकरण में महत्वपूर्ण सहयोग किया है एक वरिष्ठ लेखक एवं सार्थक संपादक के रूप में आप निरंतर दायित्वों का पूर्ण निर्वहन कर रहे है भगवान आपको स्वस्थ एवं दीर्घायु रखे। डॉ वेदित

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